मंगलवार, 8 नवंबर 2022

UQABI RUH JAB BEDAR HOTI HAI JAWANO ME

उक़ाबि रूह जब बेदार होती है जवानों में 
नज़र आती है उनको अपनी मंज़िल आसमानों में 
रिश्तेदारों के बच्चे हमें चीख चीख कर बता रहे हैं। हमें  तालीम की राहें आसान कर दे। हम फ़रसूदा रसूम के के इन हलकों से आज़ादी चाहते हैं। कल्याण के कामयाब प्राइज डिस्ट्रीब्यूशन फंक्शन के बाद एक बात रोज़े रोशन की तरह साबित होगयी है के ,रिश्तेदारों में तालीम के ताल्लुक़ से जो बेदारी पैदा हुयी है इंशाल्लाह ये एक इन्किलाब का पेश ख़ैमा साबित होंगी है। 
हम जनाब इरफ़ान मुंशी और मुजाहिद सर के भी शुक्र गुज़र हैं जिनो ने रिश्तेदारों  के संजीदा ,बावक़ार लोगों का ग्रुप तश्कील किया। फ़ुज़ूल डिस्कशन बहस मुबाहसे से गुरेज़ किया जाये सब के लिए बेहतर हैं। माशाल्लाह शादी के फ़रसूदा रुसुम को ख़त्म करने के लिए हाजी साल्हुद्दीन नूरी साहेब ने पहल की और नौजवानो ने इस आवाज़ पर लब्बैक कहा खुश आयंद मुस्तक़बिल के इशारे हैं। मज़हर जनाब के शुक्र गुज़र है दीनी सवालात का सिलसिला शुरू किया। 
ग्रुप में किसी के इंतेक़ाल पर हर मेंबर की ख्वाहिश होती है के दुआ शेयर करे। क्या ये नहीं हो सकता हम दिल में दुआ पढ़ ले और एक दरूद शरीफ मुर्दे को बख़श दे ?इंतेक़ाल करने वाले के अल्लाह इंशाल्लाह दरजात ज़रूर बुलंद करदेंगा 
मैं कुछ न कहु और ये चाहूँ के मेरी बात 
खुशबु की तरह उड़ के तेरे दिल में उत्तर जाये 
उमरे के लिए रवानगी है इंशाल्लाह तमाम उम्मत ,रिश्तेदारी ,इक़रा खानदेश फाउंडेशन के लिए खास दुआ करने का अज़्म रखता हूँ। आप सब से दरख्वास्त है नाचीज़ को अपनी दवाओं में शरीक करे। 

सोमवार, 7 नवंबर 2022

Qamar ahmed

                                                                  ای سعادت بزورے بازو نیست 

ढूंढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती 

१९६८ से १९७१ वालिद मरहूम हाजी क़मरुद्दीन कटियाफाईल मोहल्ले में ट्यूशन लिया करते थे। में भी एंग्लो उर्दू  स्कूल में तालीम हासिल कर रहा था। कडु मियां दादाभाई को हमारे वालिद से इन्तेहाई अक़ीदत थी। जब भी जलगाव  एसटी पर ड्यूटी लगती अब्बा से मिलने ज़रूर घर आते। अब्बा घर के वरांडे में बैठ कर बच्चों को ट्यूशन दिया करते। कभी कभी थोड़े वक़्फ़े के लिए कहीं जाना होता ट्यूशन के बच्चों को  मेरे हवाले कर जाते। इस दौरान कडु मियां दादाभाई आ जाते मुझे बच्चों को पढ़ते देख कर बहुत खुश होते मेरी बहुत तारीफ करते कहते "भैया तुम बहुत तरक़्क़ी करोंगे   "  मुझे बहुत खुशी मिलती ,और encouragement भी मिलता।

ये भी इत्तेफ़ाक़ है ,शहदा में भी कडु मिया दादाभाई का ट्रांसफर रहा। उनकी फॅमिली और हमारे ससुर ज़ैनुल आबेदन की फॅमिली में काफी कुर्बत रही।  

तुम्हारे लहजे में जो गर्मी व हलावत है 

उसे भल सा कोई नाम दो वफ़ा  की जगह 

ग़नीमें नूर का हमला कहो अंधेरों में 

दयारे दर्द में आमद कहो कहो बहारों की 

वही लहजा ,वही सादगी ,वही खुलूस आपकी तीनो औलादों  कमर अहमद ,नियाज़ा अहमद और नूर अहमद में पाया जाता हैं। 

कमर अहमद से नज़दीकी ताल्लुक़ात ३ सालों में काफी बढे हैं। जब से उनेह इक़रा खानदेश फाउंडेशन का  स्पोक पर्सन तानियत किया गया है। इतनी कम उमरी में अपना ADEVERTISING का कारोबार Establish किया है बड़ा ताज्जुब होता है। रोटरी क्लब धुले डिस्ट्रक्ट का डिप्टी गवर्नर के उहदे तक पहुचना मानी रखता है। कमर अहमद को रिश्तेदारों की निस्बत बड़ा करब है । तालीम ,ग़ुरबत और शादी के मसायल किस तरह हल किये जाये हमेशा फिक्रमंद रहते है। धुले शहर में रिश्तेदारों की हर संस्था से आप जुड़े हुए है और अपना तआवुन देते रहते हैं। 

इक़रा खानदेश फाउंडेशन के लिए वो मज़बूत सतून की हैसियत रखते हैं। 

हम दोनों मिया बीवी से बहुत क़रीबी रिश्ता रखते हैं। मुझे अंकल कहते है और शगुफ्ता को बाजी। 

दुआ है वो इसी तरह  खिदमते ख़ल्क़ में लगे रहे। अल्लाह उनेह बेइंतेहा तर्रकी आता करे आमीन। 

जहा रहे वो खैरियत के साथ रहे 

उठाये हाथ तो एक दुआ याद आयी। 

शुक्रवार, 4 नवंबर 2022

KALYAN PRIZE DISTRBUTION PROGAMME

 

मुझे आज भी अब्बा से गले मिलना याद है। भाइयों रिश्तेदारों से मुसाफा करना । नानी मुमानी खाला का सर पर हाथ रखना याद है। (अम्मा का बचपन में इंतेक़ाल हो गया था ) अजीब क़िस्म का सकूंन मिलता था इन बातों में।  दो साल लॉक डाउन (COVID ) में ऑनलाइन कॉन्टेक्ट्स ने वो लम्स वो अपनापन वह मोहबत्तें हम से दूर कर दी थी। कहा जाता है "Man is social animal " COVID की पाबंदिया ख़त्म होते ही लोग तेज़ी से हंगामो की तरफ लौटे। शादिया ,तेहवार ,मेले ठेले ,उर्स इस ज़ोर शोर जश्न के माहौल में मनाये जा रहे हैं लगता हे लोग दो साल के वक़्फ़े को अपनी ज़िन्दगी से अपनी यादों  से खुरछ देना चाहते हैं। बिजली की चमक थी जो आनन् फानन पल में गुज़र गयी। हर दम रवां है ज़िन्दगी। मानों  ब्रकिंग  न्यूज़ है जो २ मिनट में बासी होगयी 

३० अक्टूबर २०२२ का Prize distribution function जो इक़रा खानदेश फाउंडेशन कल्याण यूनिट द्वारा आयोजित  किया गया था संग मील की हैसियत रखता है। ३५० कुर्सियां भी लोगों  के लिए कम पड़ रही थी। मर्द और औरतें बराबर  तादाद में थे। और सब ने बच्चों की कामयाबी का जश्न दिल से मनाया। में समझता हु  पैसे थोड़े  खर्च करके हमारे अपने बच्चों के चेहरों पर मस्सरतें बिखेर देते है तो ये बड़ी कामयाबी है। हमारे बुज़र्ग शाफियोद्दीन जनाब,रशीद जनाब ,महेर अली जनाब ,विजियोद्दीन जनाब मेहफूज़ अली ,मोहतरम बशाश तवील उमरी और जिस्मानी परेशानियों के बावजूद नौजवानो के शाना ब शाना प्रोग्रॅम में अवल से आखिर तक अपनी मौजूदगी का अहसास दिलाते रहें। 

बच्चों  को दिए गए इनामात और उनकी कामयाबी पर लगता है हम एक रौशन मुस्तकबिल की जानिब गामज़न है। कल्याण इक़रा खानदेश फोडेशन यूनिट को  कामयाब प्रोग्राम मुनअक़िद करने पर दिली मुबारकबाद। इक़रा खानदेश फाउंडेशन के हौसले बुलुंद होगये और मुस्तक़बिल में काम की रफ़्तार बढ़ाने के लिए इशारा मिला। 

सोमवार, 31 अक्टूबर 2022

Kalyan Prize Distribution Programme

जो बात दिल से निकलती है असर रखती है 

जिस तरह इक़रा खानदेश फाउंडेशन हमारे रिश्तेदारों ने बनायीं है ,रिश्तेदार चला रहे हैं और रिश्तेदार फायदा उठा रहे हैं। अल्हम्दोलीलाह इतवार ३० नवंबर २०२२ को आयोजित किया कल्याण में प्राइज डिस्ट्रीब्यूशन प्रोग्राम हमारे रिश्तेदारों के ज़रिये सजाया गया था, हमारे अपने लोगो ने तन मन धन से शिरकत की। रिश्तेदारों की दो ज़हीन बा पर्दा (रुखसार ,शऊरआ ) ने कंडक्ट किया। ज़बान की शिरीनी उर्दू का सही तलफ़्फ़ुज़ और उर्दू शेरों का वक़्त बवक़्त इस्तेमाल  मीर ने शायद इसी ज़बान के लिए कहा था 

हम हुए तुम हुए के मीर हुए 

इसकी ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए 

 ज़ेहन में सवाल था क्या कोई इस ज़बान को को ख़त्म कर सकता है? 

अमर ट्रांसपोर्ट वालों का बुकिंग काउंटर ०३३० बजे तक खुला रहा। लोगों ने आना  शुरू किया बिज़नेस बंद कर दिया गया। अमर ट्रांसपोर्ट की वह जगह भी कुशादा है ,मौसम भी खुशगवार था और  सोने पे सुहागा ,नूरुद्दीन अज़ीमुद्दीन शैख़ ,नाज़िम साहेब और पुरे अमर ट्रांसपोर्ट  ख़ानदान के अफ़राद ने होस्ट (मेज़बानी ) के फ़रायज़ अंजाम देना शुरू कर दिए "उन से ज़रूर मिला क़रीने के लोग हैं " . 

मखदूम अली , यास्मीन भाभी ,हिसामुद्दीन , हसीन  ,अनीस सर की भाग दौड़  लगे थे ,सोहेल शैख़ की मेहनत,  मुफ्फसीरे क़ुरान जनाब हाजी सलाहुद्दीन मालिक नफ़्स ब नफीस हर काम की निगरानी कर रहे थे ,इमरान  मखदूम अली का ५ घंटे मुसलसल खड़े रह कर प्रोग्राम रिकॉर्ड करना live Utube पर relay करना । ये बातें एक बेहतरीन प्रोग्रम की कामयाबी की ज़मानत हैं। प्रोग्राम में दूर दूर से आये मेहमानों की शिरकत ने प्रोग्राम को चार चाँद लगा दिए। जनाब एडवोकेट रज़ीउद्दीन नवसारी से रात भर सफर करके तशरीफ़ लाये। हाजी नूरुद्दीन नूरी धुले से ,नियाज़ अहमद ,डॉ रागिब ,रिज़वान जहागिरदार ,जावेद अहमद शैख़ ,बशश शैख़ नवी मुंबई से ,मैं खुद और मेरे हर क़दम की  साथी, मेरे हर सफर की मंज़िल शगुफ्ता रागिब नेरुल से सफर करके जलसे में शरीक हुए। 

प्रोग्राम के लिए ३५० कुर्सियों का इंतेज़ाम किया गया था वो भी कम  पड़ रही थी , बच्चों की कामयाबी पर ज़ोर शोर से तालियां बजा कर इस्तक़बाल किया जा रहा था। एक अजीब जोश वलवला था। 

 हमारे IKF ट्रस्ट की कामयाबी में रिश्तेदारों की दिलो जान की शिरकत ने राह आसान कर दी। कल प्रोग्राम में ४ साल के छोटे बचे ने लाइफ मेम्बरशिप रजिस्टर करवाई ,एक बच्ची ने अपने इनाम की मिली रक़म इक़रा खानदेश फाउंडेशन को डोनेट कर दी ,नियाज़  अहमद कडु मियां ने धुले प्रोग्राम में उनेह निज़ामत के लिए मिली रक़म हमारे ट्रस्ट के नाम वक़्फ़ कर दी।  अल्लाह ये जज़्बे सलामत रखे। माशाल्लाह साडे पांच घंटे के प्रोग्राम में औरतें ,बुज़र्ग और बच्चे इन्तेहाई मुंहमिक हो कर प्रोग्राम की करवाई को दीलचस्पी से देखते रहे। 

कू बी कू फ़ैल गयी बात शनासाई की 

उसने खुशबु की तरह मेरी पज़ीराई की 

ख़ुशी का मुक़ाम है कल प्रोग्राम में १५० लाइफ मेंबर्स  हमारे इदारे से जुड़ गए। अल्हम्दोलीलाह मुझे यक़ीन है फॅमिली ट्री में दर्ज ९००० मेंबर्स ,२००० ख़ानदान इक़रा खानदेश फाउंडेशन के लाइफ मेंबर्स बनेगें और ट्रस्ट की माली मदद करेंगे। इंशाल्लाह हमें किसी के आगे दस्त दराज़ करने की ज़रूरत नहीं रहेंगी। आज तक हम स्टार्ट उप किताबों में पढ़ते थे ,हम जलगाव ,एरंडोल ,बहादरपुर ,नसीराबाद ,नवापुर ,धुले वाले खानदेशी ये कर दिखाएंगे। 

४५ बच्चों को प्राइज दिया गया माशाल्लाह डायटीशियन का कोर्स भी कर रहे है ,इंजीनियर ,मास मिडिया ,पोस्ट ग्रेजुएशन ये अगर हमारा मुस्तकबिल है इंशाल्लाह  तो इस नयी जनरेशन के हाथों में मेहफ़ूज़ है। 

हाजी वाजिहुद्दीन जनाब को मिसालि सरपरस्त अवार्ड से नवाज़ा गया इस बात का सुबूत है हम अपने बुबुज़र्गों को नहीं भूले। 

ढूंढ उजड़े हुए लोगो में वफ़ा के मोती 

ये खज़ाने तुझे शायद  के खराबों  में मिले 




सोमवार, 3 अक्टूबर 2022

NAZIM BLOG UPDATED

 


                                              
नाज़िमोद्दीन अयाजोद्दीन शैख़ 
कभी कभी ये होता है इंसान का नाम उसकी शख्सियत से बिलकुल मेल नहीं खाता । नाम है हसीना इतनी खौफनाक के बच्चे  डर जाये। 
नाज़िम मेरा भांजा ,उसके नाम के लफ़्ज़ी मानि होते है organizer, आपा और दुलेह भाई ने क्या सोच कर नाम रखा था।  दाद देनी पड़ती है। नाज़िम के नाम से उस की शख्सियत मेल खाति है।मेहनती ,ईमानदार ,जिस महफ़िल में बैठ जाये गुल व गुलज़ार होजाती है। मज़ाक भी ऐसा के तहज़ीब के दायरे से बाहर नहीं होता। मेरी बेटी हिना ने अपनी शादी का दावत नाम Whatsup  पे रवाना किया "nazim & fly "पढ़ कर अपनी अहलिया से मज़ाकन कहने लगा "जल्दी तैयार होजाओ मॉमू ने फ्लाइट  का टिकेट भेजा है। वोह हमारे बहनवायी यानि अपने वालिद  अयाजोद्दीन से मिलता जुलता है। निकलता कद , दूध की तरह शफाफ रंग, नीली ऑंखें। अल्लाह नज़र बाद से बचाये।
   ये फूल मुझे कोई विरवसत में मिले हैं
   तुम ने मेरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा
  वालिद की सैलरी कम थी तीन भाइयों और एक बहन का साथ था। उन दिनों नाज़िम अपनी अम्मा अदीबुन्निसा  का हाथ बटाता दोनों मिलकर पापड़ अचार बनाते । स्कूल के बाहेर बैठ कर पेरू भी इनकम बढ़ने के लिए बेचे नाज़िम ने साइकिल पंक्चर की दुकान भी खोली ,,कार्टन फैक्ट्री ,छोटी वर्कशॉप में काम भी किया साथ साथ मोलेदिना स्कूल से पढ़ाई भी जारी रखी। साबु सिद्दिक् कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग से सिविल इंजीनियरिंग की तालीम मुक़म्मिल की। 
          तालीम पूरी करने के बाद उस की ज़िन्दगी का रुख बदल गया। १९९५ में  नाज़िम को दुबई  में जॉब मिल गया और पिछले २८ सालों से वो अपनी फॅमिली के साथ दुबई ही में मुक़ीम है।  २ साल पहले बच्चों के higher education के लिए उसे फॅमिली को पुणे भेजना पड़ा। नीचे बैठना उस ने सीखा ही नहीं। 
           बचपन में वह सीरत तुन नब्बी के  जलसों में जोश ख़रोश से हिस्सा लेता और बड़ी बड़ी ट्राफियां जीत कर लाता।  में पूना छुट्टियों में आपा से मिलने आया था। नाज़िम ऐसे ही किसी जलसे में शिरकत के लिए गया था।  हमारी बड़ी आपा (अद्दिबुन्निसा ) हयात थी।  रात २ बजे के क़रीब  आँख खटके से खुल गयी ,आपा को बेचैनी से टहलते देखा। पूछने पर पता चला  नाज़िम सीरत के जलसे से अभी तक नहीं  लौटा।हम दोनों नाज़िम का इंतज़ार करते रहे।  नाज़िम के लोटने पर में ने उसे बहुत डांट पिलाई वह चुप चाप सुनता रहा। मुझे क्या पता था उनिह महफ़िलों की बरकत और मौलाना यूनुस (पूना  वाले ) मरहूम की  सोहबत ,तरबियत और दुवाओं और रहबरी उस के रोशन मुस्तकबिल के लिए मश अले रह बन जाएगी।
     अलाह ने उसे निकहत के रूप में एक ख़ूबसूरत हमसफ़र और ३ प्यारे प्यारे बच्चों से नवाज़ दिया। अल्लाह के रसूल का क़ौल है जिसे खूबसूरत घर ,अच्छी सवारी और बेहतर बीवी नसीब होगयी उस की दुनयावी ज़िन्दगी कामयाब होगयी। 
नाज़िम की औलादों में  सिद्ऱाह ,साराह डॉक्टर  बन रही हैं और अफ्फान भी डॉक्टर बनना चाहता है। अल्लाह उनके ख्वाब पुरे करे। आमीन 
     शगुफ्ता के साथ में ने दो मर्तबा दुबई का सफर किया और नाज़िम की मेहमान नवाज़ी का लुत्फ़ उठाया। मेहमान की राह में पलकें बिछा देना इस मुहावरें को उस ने सच कर दिखया। उसकी कार से UAE की सैर ,महफ़िलें,दावतें खूब लुत्फ़ उठाया । दुबई में वह मिक़नातीस की मिसाल है के रिश्तेदार दोस्त व अहबाब उस के खलूस से फ़ैज़याब होते रहतें हैं।
    
    
     अल्लाह से दुआगो हूँ ,नाज़िम का  हर ख्वाब पूरा हो आमीन।
ख़ानदान  ,रिश्तेदारी के बच्चों के लिए उसकी ज़िन्दगी एक मश अले राह साबित हो। 

रविवार, 25 सितंबर 2022

IQRA KHANDESH FOUNDATION DHULIA PROGARAMME

इक़रा खानदेश फाउंडेशन धूलया तक़सीम इनामात प्रोग्राम (तास्सुरात )

क़ौमों की की हयात उनके तख़य्युल पे है मौक़ूफ़ (डॉ इक़बाल )

25th सितम्बर 2022 बरोज़ इतवार हाजी हाकम हाल धूलिया में  IKF  द्वारा आयोजित prize distribution program ने  एक बेहतरीन  मिसाल क़ायम की। ये प्रोग्राम  रिश्तेदारों के  लिए था ,रिश्तेदारों द्वारा आयोजित किया गया था और रिश्तेदारों के बुज़ुर्ग ,स्टूडेंट्स ,टीचर्स और हाजी साहबान के इस्तक़बाल के लिए था। 

उनसे ज़रूर मिलना सलीक़े के लोग हैं 

 प्रोग्राम में रोटरी क्लब के Deputy Governor जनाब कमर शेख़ कडुमिया का discipline  हर जगह नज़र आया ,जनाब नियाज़ अहमद का निज़ामत का बरसों के तजर्बे का निचोड़ दिखाई दिया। मुख्लिस ज़मीनी सतह पर काम करने वाले साथियों का जलवा हर क़दम पर उजागर हुवा। 

 साबित हुवा हमारे दरमियान रागिब जहागिरदार ,अस्सिटेंट प्रोफेसर डॉ वकील ,डॉ प्रोफेसर साजिदा 

बुधवार, 21 सितंबर 2022

Hafiz Qari Mauzzin Javid Hanif Shaikh

                         Dr Bu Abdulla and Hafiz Javid Hanif Shaikh    Hafiz Javid Hanif Shaikh


 Hafiz Mohammed Javid Shaikh


हाफिज मोहम्मद जावीद हनीफ शेख नवसारी

पैदाइश : १५ जनवरी १९८५ (नवसारी)


ज़िंदगी से यहीं गिला है मुझे,

तू बहुत देर से मिला है मुझे।


  हाफिज मोहम्मद जावीद रिश्ते में हमारे पोते है। हमारे फुफीज़ाद हबीब मियां दादाभाई के, बड़े फरजंद हनीफ मियां के, सबसे छोटे फरजंद है। 

इत्तेफाक से मैंने २० साल का लंबा अरसा शाम और सूडान में गुजारा और हाफिज जावीद भी १२ साल ७मार्च २००८ से १५ नवम्बर २०१९ दुबई में रहे।


हम दोनो ही वतन से दूर रहे तो हमारी मुलाकात कैसे होती ?

हमारी पहचान भी हूवी तो व्हाट्स एप ग्रुप पर, तब पता चला हम दोनो में कितनी कुर्बत हैं।

फिर अल्हमदुलिल्लाह अक्सर फ़ोन पर हमारी बातचीत हो जाती हैं।


एक हाफिज अपने खानदान के ७० लोगों की लोगों की शिफाअत कर सकेगा और अल्लाह की जात से उम्मीद है हाफिज जावीद अपने दादाजान यानी मेरी शिफाअत का हकदार जरूर बनेंगे इंशा अल्लाह ।


कोशिश भी कर, उम्मीद भी रख, रास्ता भी चुन,

फिर उसके बाद थोड़ा मुकद्दर तलाश कर।


जावीद मियां ने मदरसा ए तहफीजुल कुरान फैजे सुलेमानी नवसारी से २००५ में हिफ्ज़ ए कुरान मुकम्मल कर लिया साथ साथ गुजराती माध्यम  से १२ का इम्तिहान भी पास किया, B Com. करना चाहते थे मगर मदरसे से इजाजत नहीं मिली।

अपनी नाकामियों को कामयाबी में बदलने के फन से हाफिज जावीद बखूबी वाकीफ है।

हाफिज जावेद ने अपनी कोशिशें जारी रखी। कंप्यूटर ऑपरेटर एंड प्रोग्रामिंग में आई टी आई किया, अपनी काबिलियत बढ़ाने के लिए कंप्यूटर अकाउंटिंग एंड ऑफिस ऑटोमेशन में डिप्लोमा भी हासिल किया।

कहा जाता हैं हाफिज ए कुरान के लिए अल्लाह हर चीज आसान कर देता है।


 उनके वालिद साहब (हमारे भतीजे हनीफ मियां) का १२ मई २००८ को इंतकाल हुवा था, तब हाफिज जावीद को दुबई जा कर सिर्फ २ महीने हुवे थे। अल्लाह ने उसी रोज उनके हिंदुस्तान आने का इंतजाम कर दिया था तो उन्हें वालिद साहब का चेहरा आखरी बार देखना नसीब भी हुवा ।


२२ मई २००८ को वालिद साहब के इंतकाल के सिर्फ १० दिनों के बाद ,हाफिज जावीद अपने दिल पर पत्थर रख कर अपनी जिंदगी को आगे बढ़ाने फिर से दुबई रवाना हो गए।


२००८ से २०१९ दुबई में वेयरहाउस ऑपरेशन मैनेजर के फराईज अंजाम दिए। दुबई की मारूफ शख्शियत Dr. Bu Abdullah से हाफिज जावीद के करीबी ताल्लुकात रहे हैं।

दुबई में गोल्ड सूक की मस्जिद में हर जुम्मा अज़ान भी दी , मस्जिद में इमामत(वालींटियर) भी की, तरावीह की नमाज भी दो साल पढ़ाई।


कहा बच कर चली ए फसल गुल मुझ आबला पा से ,

मेरे कदमों की गुलकारी बियाबान से चमन तक हैं।


हिंदुस्तान लौट कर हाफिज जावीद की जद्दो जहद का सिलसिला रुका नहीं, पूना में २ साल फजलानी ग्रुप में और १ साल अक्कलकुवा मदरसे में अपने वेयरहाउस के तजुर्बे से फायदा उठा कर दोनो जगहों पर कामयाबी से वेयरहाउस की बुनियाद रखने में मदद की ।


 अल्हमदुलिल्लाह नवसारी में अपने माज़ी के तजुर्बात का फायदा उठा कर (Amazon Easy Store) एमेजॉन इजी स्टोर की शाख और (Super Market) सुपर मार्केट का अपना ज़ाति बिज़नेस भी कामयाबी से चलाया ।


हाफिज जावीद अरबी एहले ज़बान की तरह बोलते हैं, इंग्लिश भी ब्रिटिशर्स के लहजे में बोलते हैं, गुजराती में तो तालीम हासिल की ही है, उर्दू की भी शुदबुद हैं।

और क्रिकेट में तो कमाल हासिल है.

हाफिज साहिब जानते हैं कंपीटीशन के इस दौर में किस तरह अपने आपको काबिल बनाना चाहिए।

नवसारी में अपनी वालिदा मुमताज बेगम, अहलिया नाजनीन और अपनी दो नन्ही मुन्नी बेटियां नाफिआ और फातिमा के साथ मुकीम है।


मुझ को जाना है बहुत आगे हदे परवाज से।


इतनी कम उम्र में इतनी काम्याबिया हाफिज जावीद जैसी काबिल सख्शियत को मिली काबिल ए सताईश हैं।

रिश्तेदारों के बच्चों के लिए हाफिज जावीद की सवाने हयात यानी (life History) एक बेहतरीन सबक है।

किस तरह जिंदगी में मुश्किलात का सामना किया जाता हैं, और कामयाब जिंदगी गुजारी जाती हैं.

     माशाल्लाह फिर से वह अपनी जद्दोजहद में मसरूफ है। दुबई साउथ अफ्रीका में कारोबार के लिए आना जाना लगा रहता है। 

                 मुस्तक़बिल की कामयाबी के लिए  हाफिज जावेद को नेक ख्वाहिशात और ढेर सारी दुवायें