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वरना सूरज की कहाँ सालगिरह होती है
आज हम सब होटल कॉर्पोरेट बेलापुर में अहम् शख्सियत जनाब सज्जाद तारिक़ मुंशी की 75 th सालगिरह मानाने जमा हुए है। उन की खिदमत में दो शेर पेश करता हूँ।
रौनक़े महफ़िल नहीं था कोई तुझ से पहले
रौनक़े बज़्म नहीं है कोई तेरे बाद
आप आये तो बहारों ने लुटाई खुशबु
फूल तो फूल हैं ,काँटों से भी आयी खुशबु
आज के रौनक़े बज़्म जनाब हाजी तारिक़ मुंशी अपनी ज़िन्दगी की डायमंड जुबली मुक़्क़मिल कर रहे हैं। तारिक़ का मतलब होता है रात में दिखने वाला सितारा और सज्जाद यानि बहुत सजदा करने वाला। माशाल्लाह पिछले साल हमने इनकी शादी की 50 th (गोल्डन जुबली ) सालगिरह मनाई थी। ख़ूबरू (handsome )शख्सियत के मालिक ,निकलता क़द ,नरम गुफ़्तार (soft spoken ),बहुत ज़माने से हमें मुत्तासिर करते रहे है। जनाब शत्रुघन सिन्हा से मुशबीहाट (similarity ) रखते हैं। एक ज़माना था उनेह देख कर शत्रुघन सिन्हा के मशहूर डॉयलग्स ज़हन में गूंजने लगते थे। " खामोश " लगी को आग कहते हैं बुझी को राख कहते कहते है और इस बुझी राख से बनी बारूद को विश्वनाथ कहते हैं " ५० साल पहले जब हम ने उनेह पहली बार देखा था वह शत्रुघन सिन्हा से ज़ियादा ख़ूबरू थे और आज भी उम्र के इस दौर में हमारी नज़रों में शत्रुघ्न सिन्हा से कई ज़ियादा स्मार्ट हैं।looks से ज़ियादा इंसान का अख़लाक़ ,किरदादर अहमियत रखता है। भाई जान के लिए जिस तरह लोगों ने इस महफ़िल में अपने ख्यालात का इज़हार किया मेरी नज़रों में उनकी अहमियत /इज़्ज़त और बढ़ गयी। अपनी औलाद बहने शरीके हयात पोते पोतियां ,नवासे नवासियां ,दामाद सब के दिलों में उनके लिए बे हद एहतेराम हैं।
कुछ यादें अँधेरी रातों में चमकते जुगनुओं की तरह होती है। १९७१ साल में पहली बार जलगाव से मुंबई आया था। सादिक़ भाई मुझे सोमैया कॉलेज में दाखला दिला कर नौकरी के लिए कुवैत रवाना हो गए थे। कभी कभी अकेले पन तन्हाई का एहसास होता। दो खानदान मुंशी और अख़लाक़ भाई के घर चला जाता फिर लगता किसी ने दलदल में डूबने से बचा लिया हो। तारिक़ भाई जान ज़ाकिरा भाभी ने भी हमेशा मुशफेक़ना रवैया रखा। मैं ने भी उनेह हमेशा बड़े भाई की तरह इज़्ज़त दी। शादी के बाद हमारी रज़िया खाला और शगफ्ता (अहलिया ) की फूफी ने हम दोनों को अपनी मोहबतों ,इनायतों ,मेहरबानी और करम से शराबोर कर दिया। तारिक़ भाई जान से कुछ अरसा मुलक़ातें कम कम हो गयी थी। जब १९ साल में ,लगातार मुल्क से बाहेर रहा। फिर इत्तेफ़ाक़न से ये हुवा के वह हमारे पड़ोस नेरुल में वाइट हाउस में शिफ्ट हो गए। फिर से मुलाक़ातों का सिलसिला जारी होगया। अल्लाह से दुआ हैं
जहाँ रहे वह खैरियत के साथ रहे
उठाये हाथ तो ये दुआ याद आयी