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| Late Murakoboddin |
एक शख्स सारे शहर को वीरान कर गया
जलगांव शहर की आबादी /सरहदें चारो और बढ़ती जा रही है। लेकिन मेरे लिए जलगांव सिमटा जा रहा है अजनबी मक़ाम लगने लगा है। शहर ईंट ,पत्थरों और इमारतों से नहीं बनता। शहर बनता हैं वहां रहने वाले लोगों से । पिछले साल मुबा मुमानी हम से जुदा हुयी लगा आधा शहर सुना होगया हो। पिछले महीने मामू मुरकोबोद्दीन दुनिया से रुखसत हुए लगा जलगांव शहर सन्नाटे में डूब गयाहो । लेकिन अपनी औलादों कफील और नाज़िरुद्दीन अपनी विरासत में छोड़ गए, मखदूम अली भी जो उनकी सरपरस्ती में परवान चढ़ा मामू की याद दिलाते रहेंगे। मेहरून तालाब ,बेर ,जाम और पोलन पेठ जलगाव का मामू मुमानी का मकान शायद कभी भूल पाए ।
1930 से 1945 के दरमियान पैदा होने वालो को silent generation कहा जाता है। मुरकोबद्दीन मामू भी १९३३ में पैदा हुए। आप की शख्सियत में भी एक ठहराव था। फिर baby boomer ,generation x ,Mellenials ,Generation Z ,Generation Alpha ,Beta को मामू ने अपनी आँखों से देखा। सेकंड वर्ल्ड वॉर ,जंगे आज़ादी ,पाकिस्तान और बांग्ला देश का बनना ,पाकिस्तान के साथ दो wars, china से war ,जलगांव के दंगे कितने हादसों को रु ब रु देखा। कुछ लोग छोटी छोटी बातों से डिस्टर्ब होजाते हैं। लेकिन ये बंदा slow & steady अपनी मंज़िल की जानिब बढ़ता ही रहे।
आप बड़े well known ख़ानदान से बिलोंग करते थे । हाकिम रियासोद्दीन इनके वालिद इस ज़माने में मशहूर हाकिम तो थे ही। medical officer पोस्ट से रिटायर हुए और आखिर उम्र तक हिकमत करते रहे।
जिस दिन से चला हूँ मेरी मंज़िल पे नज़र है
मामू मुराकोबोद्दीन ने जलगांव ,उर्दू से मीट्रिक किया। co -operative dept maharashtra में peon की पोस्ट जॉइन की ,sub -auditor और फिर ऑडिटर हो कर पेंशन पायी। १९४८ से १९८७ तक govt service की। फिर १५ साल govt co -op panel पर भीअपनी सर्विसेज देते रहे ।
दिल को दर्द पुराने अच्छे लगते हैं
२६ अक्टूबर २०२५ को जलगाओं visit के दौरान उनसे मुलाक़ात की। मुझे देख कर चेहरे पर शनासाई की मुस्कराहट दिखाई पड़ी शायद ज़हन के किसी कोने में मेरा नाम तलाश करने की कोशिश करते रहे। कफील ने पूछा अब्बा पहचाना "मखदूम "कहा शायद कहना चाहते थे मखदूम का दोस्त। कफील ने कहा राग़िब दादा। उन का चेहरा खिल उठा।
90+ age में कपिल की लुब्रीकेंट की दुकान dedication से सँभालते रहे। कभी कुर्सी पर बैठ कर नमाज़ अदा नहीं की । हाफ़िज़ा भी आखिर उमर तक तकदुरस्त रहा ,माशाल्लाह। एक साल पहले मुमानी के इंतेक़ाल के बाद कुछ बुझ गए थे। दोनों में बहुत मोहब्बत थी।
जी चाहता है नक़्शे क़दम चूमते चले
कुछ शख्सियतें उनमिटी नक़ूश छोड़ जाती है। मामू खामोश तबियत थे लेकिन strong pesonality के मालिक थे। उनकी कमी हमेश महसूस होती रहेंगी।
अल्लाह से दुआ है उनकी मग़फ़िरत करे आमीन।
खुदा बख्शे बहुत सी खूबियां थी मरने वाले में