शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

मुसाफ़िर हूँ यारों (dedicated to Ausaf Uamani)

२४ जुलाई २०२०
हमारे ग्रूप को अतरंगी इस लिए कहा जाता है क्यूँकि इसने दुनिया भर के नमूने भरे हैं ।क्या आपने कभी सुना है के किसी को शैतान कहा जाता हो और वो ख़ुश होता हो ।उसके सामने आने पर लोग लाहौल पढ़ते हो और वो कहकहे लगाता हो ।lockdown के दरमियान लोग घरों में दुबक के बैठते है ,इनकी activities दोगुना होगायी है ।हाँ जनाब ऐसी अजीब व  ग़रीब शख़्सियत को लोग औसफ उसमनी के नाम से जानते है ।इत्तफ़ाक़न आज उनकी सालगिरह भी है ।इस ख़ूबसूरत मौक़े पर हम सब  की जानिब से दिल की गहराइयों से मुबारकबाद ।
२२ साल के लम्बे अरसे से में उन्हें जानता हूँ ।उनकी उम्र में अज़ाफ़ा तो हुआ है , अलहमदोलिलह हज  के बाद चहरें पर नूरानी दाढ़ी भी  निकल आयी है ।सर के बाल खिचड़ी होगाए है ,बालों में  चाँदी उतार आयी है ।उनके बचें जवान होगाए है ।लेकिन मिज़ाज दिन ब दिन बचपन की तरफ़ लौट रहा है ।
  मियाना क़द आँखों पर हमेशा क़ीमती चश्मा लगाये रखते हैं ।मोबाइल सालों से एक ही use  में है ,स्क्रीन पर खराशें पड़ चुकी है ,शायद तोहफ़े में भाभी या girl friend से मिला हो इसलिए इतना उनह अज़ीज़ है ।कपड़े मशल्लाह हमेशा branded पहनते है ।उर्दू दान ख़ानदान में जन्मे है ,उनके वॉलीद ,उर्दू दान पेशे से उस्ताद (teacher) थे ।शायद इसी मनासेबत से नाम  औसफ रखा गया हो।गाँव में उर्दू स्कूल से education की शुरुआत  की मुंबई आकर graduation तक मुकम्मिल  किया।
मंज़िल की है तलाश तो दामन जुनूँ का थाम
अपने career की शुरुआत FAB TECH से की ,कम्पनी को अपने ख़ूने जिगर से सींचा ।अब उनकी organisation छःतनावर दरखत बन चुकी है ।अब भी इसी मुस्तदी से कम्पनी की ज़ुल्फ़ें सवारने में मसरूफ है ।पहले बस ,train से सफ़र किया करते थे ,कभी कभी  नेरुल में नज़र आजाते थे ।अब माशल्लाह flght से सफ़र करने लगे है ।कभी दिल्ली तो कभी चंडीगढ़,कलकत्ता ,अहमदाबाद ,नेपाल ,भोपाल ,पूना सारा India जनाब के लिए घर आँगन हो गया है  ।सफ़र से लौट्ते ही head office या उमर गाम फ़ैक्टरी की दौड़ लगा आते है ।पता नहीं किस तरह इन मसरूफ़ियात के बावजूद भी दोस्तों के साथ मटर गश्ती का वक़्त  निकाल पाते है ।
हमें पता है हवा का मिज़ाज रखते हो 
उन की ज़िंदगी में एक चौकोर भाभी ,आमान ,अजमांन और अलीना जो उनकी ज़िंदगी का  मरकज़ है ।सभी से उन्हें बे पनाह 
मोहब्बत है लेकिन बकोल इश्तियाक़ खान “ पतेले में लगी खुरचन बहुत लज़ीज़ होती है “ की मिसाल अपनी अखरी औलाद अजमांन से ख़ास उंसियत है ।इसके अलावा भी उनोहने ज़िंदगी को कई खानोंमे बाँट रखा है ।बकायदगी से ahmed bhai होटेल के बहेर कुर्सियाँ बिछा कर दोस्तों की महफ़िलें सजाना ,यारों की बारात को कभी मोहम्मद अली रोड ,कभी भिवंडी ढाबा ,कभी माथेरान तो कभी डोंबिवली ढाबा लेजाकर चट पटे ख़ाने खिलाना ।social media पर video clips,शायरी ,jokes share करना ।सोशल कामों में शामिल होना ।बकोल Mansoor भाईं महाशय घरेलू अति क्रमण के लिए भी जाने जाते है ।सबसे छेड़ छाद करते रहते है ।लेकिन इश्तियाक़ भाई से पंगा नहीं लेते ।मान्सूर जेथाम ईंट का जवाब पथर से देते है।हामिद भाई थोड़े दब जाते है क्यूँकि उनकी जवानी बाँकपन में गुज़री है ।हरीश क़ुर्बानी का बकरा लेकिन वो भी अब चिकना घड़ा होगाया है ।एक बार अफ़सर इमाम ने घर नाश्ते की दावत पर बुला कर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली ।अब तो आलम ये है जिस रास्ते से औसफ गुज़रते है उनकी परछाइbhi नहीं दिखयी देती।
एक चेहरे पे कई चहरे लगा लेते हैं लोग 
औसफ मैं तुम्हें बहुरूपिया तो नहीं कहूँगा ।आज के दौर में दोस्ती ,वफ़ा ,प्यार मोहब्बत लोंग इलायची की तरह नायाब होते जारहे हैं ।हँसी और मुस्कुराहट लोगों के होंटों से ग़ायब होती जारही है ।बिलावजह हर जगह टेन्शन का माहोल है ।आप अपनी मसरूफ़ियत के बावजूद लोगों के दुःख दर्द कम करके दोस्तों की जिंदगियों में इंद्र धनुष के रंग बिखेरने की कोशिश में लगे हो ।में तुम्हारी इन कोशिशों क़द्र करता हूँ सलाम करता हूँ ।
दुआ करता हूँ रब आपको सलामत रखे ।आख़िर में एक शेर नज़र है ।
जहाँ रहेंगा वहाँ रोशनी लुटाएँगा
किसी चिराग़ का अपना मकाँ नहीं होता 


मंगलवार, 21 जुलाई 2020

ज़िंदगी धूप तुम घना साया

२२ जुलाई २०२० 
सालगिरह के हसीन ख़ूबसूरत अवसर पर दिल की गहराइयों से मुबारकबाद । मोहतरमा शगूफता में जनता हूँ के औरत से उसकी उम्र और आदमी से उसकी salary कभी नहीं पूछनी चाहिए ।अल्लाह की मेहरबानी है हम दोनो maturity की age से आगे बढ़ चुके हैं लेकिन अब भी दिमाग़ जवानो की तरह active है ।
   तुम मेरे पास होते हो गोया 
   जब कोयी दूसरा नहीं होता 
   उर्दू के माशहूर poet (शायर) मोमिन खान मोमिन ने १५० साल पहले ये बात कही थी ।lock down के इस period में ये बात कितनी सच साबित होती है ।चार महीनो से हम एक दूसरे की शक्लें देखते रहे है लेकिन अलहमदोलिलह bore (बेज़ार) नहीं हुवे ।४ महीनो से तुम होटेल से भी जियादा लज़ीज़ खाने मुझे खिला रही हो ।काम वाली की ग़ैर हाजरी बड़ा बोझ  था ,बर्तन घर की सफ़ायी हम दोनो ने बाँट कर करली । hall का A/C परेशान कर रहा था ,fan की speed काम होगायी थी , में ने जुगाड़ कर ठीक कर लिया ,लेकिन घर में किसी को enter होने नहीं दिया।हमारी पूरी बिल्डिंग COVID Patient की वजह से रमज़ान के आख़री १५ रोज़ lock रही , यहाँ तक के सीढ़ियों और lift को भी municipal ने बामबू बाँध कर बंद कर दिया था ,ना सीड़ियों  से कोयी उतर सकता था न लिफ़्ट से , एक वहशत हू का आलम था , लेकिन अलहमदोलिलह हम घबरायें नहीं ।अब तो हमारे पड़ोस में  COVID का मरीज़ पाया गया है ।अल्लाह का क़दम क़दम पर साथ रहा , और ये भी सच है कि ,इंसान की सोच मज़बूत तो किसी भी तूफ़ान का सामना किया जा सकता है ।सोच कमज़ोर तो ,इंसान एक पुरानी बोसीदा (खंडर) इमारत की तरह ताश के पत्तों की तरह टूट कर बिखर जाता है ।   
ये कहके ज़िंदगी ने मेरे हौसले बढ़ाये हैं
ग़मों की धूप के आगे ख़ुशी के साये है 
  ये दौर बहुत सख़्त है ।कहा जाता है ये महामारी १०० साल में एक बार आती है और अल्लाह दुनिया के लोगों का इम्तिहान लेता है ।lock down की बिना पर लोगों की कमायी ख़त्म होगायी है ।छोटे छोटे घरों में लोग बड़े बड़े ख़ानदान के साथ रहते हुवे लोग साँस लेने के लिए तरस गए है ।बचों का शोर ,उनकी पढ़ायीं ,बुज़र्गों की परेशनियाँ, बीमार होने पर ना available है न hospital, COVID ने तहलका मचाया है ,मौत की हैबतनाक ख़बरें, मंदिर ,मस्जिद ,गुरदवारें बंद ,mall और theatres पर lock, stadium में खेलों पर पाबंदी ।
जिस तरफ़ जाएएँ ज़ख़्मों के लगे है अंबार 
  ऐसे में रिश्तों में तल्खियाँ बढ़ रही है ,महोबतों के बीच दाराडे पद रही है ।उम्र रसीदाँ लोगों को torture किया जा रहा है ।wife husband के बीच कड़वाहट बढ़ रही है ।इस बीच ,help line पर लोगों के ज़ख़्मों पर मरहम लगाने की कोशिश सराही जानी चाहिये ।COVID के इस तूफ़ान से निकलने के पश्चात् बिगड़ी दुनिया को सवारने के लिए हम सब को तय्यार सतर्क रहने की ज़रूरत है ।

रविवार, 12 जुलाई 2020

ज़िन्दगी क्या है किताबों से निकल कर देखो

आज फिर दर्द के सेहरा (रेगिस्तान) से गुज़रना होंगा 
तारीख़ पे तारीख़ किसी ज़माने में कोर्ट की ज़बान हुवाँ करती थी ।आज जिसे देखो lock down की शिकायत कर रहा है ।कल क्या होंगा किसे ख़बर नहीं ।lockdown ७ के पश्चात क्या ,एक सवालिया निशान (question mark) है ।घर में बैठ कर हर कोयी बेज़ार , दिल शिकंन  ,उकता गया है ।
    क्या कभी हमने अपने अत्राफ (आस पास ) की चीज़ों ,माहोल पर ग़ौर व फ़िक्र किया ।कभी नहीं ज़िंदगी की भाग दौड़ ,मसरूफ़ियत ने इन बातों का मौक़ा हि कब दिया था।
सुबह होती थी शाम होती थी 
उम्र यू ही तमाम होती थी 
   Lockdown में पता चला सुबह (morning) की सुरूवात कोयल की कूक ,पपीहे की हुक से होती है ।फिर चिड़िया चहचहाना शुरू करती है ।फिर सोसाययटी में  कूछः लोग अपनी खिड़कियों से आनज के दाने ज़मीन पर बिखेर देते है ।कहाँ से एक कबूतरों का झुंड आकर इन पर टूट पड़ता है और मिनटों में सफ़ा चट कर जाते है ।फिर शुरू होती है कवों की काँय काँय ,बीच बीच में मीना की सुरीली आवाज़ ,wood picker की  तेज़ चींखें और कभी कभी तोतों का झुंड अपनी मौजूदगी का अहसास दिलाते है ।सोसाययटी के काम्पाउंड में लगे जंगली फली के पेड़ पर उलटा लटक ,ख़ूबसूरती ,नफ़ासत से फली के दाने अलग करके अपनी भूँक मिटा कर रफ़ू चक्कर होजाते हैं ।आज तक मसरूफ शब व रोज़ ने ये मौक़ा ही नहीं फ़राहम किया ।चौधवीं का चाँद आसमान हर महीने आता था lock down में खिड़की से नज़ारा किया तो लगा इस ख़ामोशी इस चाँदनी को रूह में उतार लू।इसमें शराबोर हो कर इसे अपनी नस नस में उतार कर जज़्ब कर लू ।अंग्रेज़ों को sun bath करते देख ,हँसते थे तंज करते थे ।बेचारे सर्दी ,बर्फ़बारी से इतने बेज़ार होजाते है के मौक़ा मिलते ही सूरज की रोशनी को अपने जिस्म में जज़्ब करने के लिए बेताब हो उठते है ।lock down में अरसे बाद सूरज की रोशनी में नहाया तो महसूस हुवाँ की हम किन किन नेमतों को नज़र अन्दाज़ करते रहे है ।
धूप में निकलों घटावों में नहा कर देखों
ज़िंदगी क्या है किताबों से निकल कर देखों

रविवार, 5 जुलाई 2020

विल्लीयन के अड्डे

aaj un फ़िल्मों की यादें ताज़ा कर दी जिम में  ख़तरनाक शक्ल वाले Villians अपने ख़ूबसूरत den बनाकर ऐश में रहा करते थे ।शराब से सजी अलमरियाँ ,उमदाँ क़िस्म की शराब पिलाने के लिए ख़ूबसूरत लड़कियाँ जो साक़ी के फ़रायज अंजाम देती थी ।ताली बजाते ही रक़्स व सरूर की महफ़िल शुरू होजाती । automatic दरवाज़े जो remote से ऑपरेट हूवॉ करते ।फाँसी के फंदे ,बड़े बड़े cranes ।लपकते शोले ,आग से भरे दहकते अलाव ।फ़िल्म के आख़िर में सिर्फ़ एक बार इस den का use किया जाता ।फ़िल्म के हीरो की बहन ,heroin और माँ को अगवा (kidnap) करके villian के den पर , रस्सियों से खम्बों पर  बाँधा जाता ।हीरो को den पर बुलाया जाता ।शोलों आग से भरे गढ़े में उसे लटकाया जाता ।किसी तरह हीरो अपने आप को बचाता ,माँ ,बहन heroin को आज़ाद करवा कर इस den की मटी पलीद ,धज्जियाँ उड़ादी जाती ।
      बचपन में आलीबाबा चालीस चोर ,हातम ताई और अल्लाउद्दीन के जादुई चिराग़ पर बेशुमार फ़िल्मे देखी ।इन फ़िल्मों में heroin को den कि बजाय जादुई महेल में  जिन के द्वारा क़ैद  किया जाता था ।फ़िल्म का हीरो जान पर खेल कर heroin को आज़ाद करता था और तोता जिसमें जिन की जान क़ैद होती थी मार कर जिन का ख़ात्मा करता और audience की तालियाँ बटोरता ।
     फिर डाकुओं की फ़िल्मों का दौर (time) आया ।उजाड़ खंडरो , सुनसान रेगिस्तान, चट्टान के बीचोंबीच ,सुनसान इमारतों में डाकुओं के अड्डे होते ।मुझे जीने दो ,जिस देश में गंगा बहती है ,मेरा गाँव मेरा देश जैसी कई फ़िल्मे हमारी यादों में अब तक बसी हैं ।डाकू की ख़ौफ़नाक मूँछ होती ,दमदार आवाज़ लेकिन दिल मोम से ज़ियादाँ नर्म ।अमीरों की दौलत लूट कर ग़रीबों बाँट देना जिस की hobby होती ।खोटा सिक्का ,शोले के जैसे ज़ालिम गब्बर सिंग ख़ून के प्यासे डाकू जिन का बुरा अंजाम हीरो के हाथ होता ।बहुत बड़ा ड्रामा होता heroin को डाकुओं के सामने नाचना पड़ता ,बंदूके चलती , लाशें गिरती ,डाकू की लाश ख़ून में तर ब तर होती ,पोलिस भी वहाँ पहुँचती लेकिन डाकू के मरने के प्रति ।
   James Bond की फ़िल्मों ने हॉलीवुड में हंगामा बरपा कर दिया ।ख़ूबसूरत औरतों से घिरा villian अपने high tech den में बैठ कर दुनिया की तबाही के नक़्शे बनाता है ।उन फ़िल्मों को देख  कर अक़्ल हैरान परेशान होजाती थी ।ख़ूबसूरत beach ,swimming pool, helicopter chase, उड़ती कारें ।आख़िर में hero, villion के den को ढूँढ कर परखच्चे उड़ा देता है उसके ख़तरनाक मंसूबों को ख़ाक में मिल देता है ।Bollywood भी Hollywood से पीछे तो नहीं रह सकता था ।फ़र्ज़ फ़िल्म का वो ख़तरनाक villain जिस के फ़ौलादी हाथों से चिनगारियाँ निकलती थी ।जितेंद्र के हाथों उसिके den में मारा जाता ।शाकाल,Mogambo,dr Dang और उनके ख़ौफ़नाक इरादे , उनके latest gadgets से सजे den हीरो के हाथ से तबाही बर्बादी सरंजाम पाते हैं ।Mr India ,शान , शालिमार फ़िल्मे उनके लाजवाब villain के किरदारों के सबब उन्मित नकूश दिल पर छोड़ गए हैं ।

  

शुक्रवार, 12 जून 2020

किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते है

                                              
     आज फिर याद का तूफ़ान उठा है दिल में
     आज फिर दर्द के सेहरा से गुज़रना होंगा
  १२ डिसेम्बर १९१३ जूमेरात  मगरिब  नमाज़ के बाद ,उस दिन  भाभी  जूबेदा  दादा भाई  के साथ अकेली थी ।उजमा जिसने ददाभाई की ख़िदमत में दिन रात एक कर दिया ,था दुबई में थी ।उसी रोज़ अल्लाह ने मलकुल मौत को ददाभाई की रूह क़ब्ज़ करने का हुक्म दिया । शगूफता ,हिना और मैं ख़ुशक़िस्मत थे उनके इनतेकाल के चंद लमहों के बाद उन तक पहुँच सके।आख़िर के दो साल दादाभाई ने बड़ी करब  व बला में गुज़ारे थे और भाभी जान उनसे साये कि तरह चिमटी रही, बेलूस ख़िदमत अंजाम दी ।दादाभाई उस समय तमाम जज़्बात से परे पहुँच चुके थे।टिकटिकि बांधे पड़े रहते ।
कुछ दिन यूँ भी रंग रहा इंतज़ार का 
आँख उठ गयी जिधर को उधर देखते रहे 
१० नोवेम्बर-२०१३ को जो रिश्ता क़ायम हूवाँ था ४० साल पूरे होने से पहले एक झटके में टूट गया 
मौत से किस को रस्तगारी है 
आज वो कल हमारी बारी है 
ज़ुबैदा के कई मतलब होते है ।ऐक मतलब होता है अच्छे संस्कार या अख़लाक़ वाली ।आप डॉक्टर क़ादरी की नूरे नज़र थी ।
M.A करने के पश्चात नंदुरबार में हिंदी उस्तानी के फ़रायज अंजाम दे रही थी ।
इनिह पथरो पे चल कर अगर हो सके तो आओ
मेरे घर के रास्ते में कोयी कहकाशान नहीं हैं
शादी के बाद ददाभाई भाभिजान को तिलक नगर चेंबुर वाले घर में ले आए ।में  B.Sc कर रहा था ।छोटा सा घर एक कमरा, छोटा सा किचन। bathroomऔर toilet common था । नंदुरबार के बंगलानुमा घर के सामने क्या हैसियत रखता था । दादाभाई के लिए adjust कर  लिया ।शायद दादाभाई की सलाहियतों (talent)पे यक़ीन कॉमील था । दादाभाई का struggling period था ।Metal Box company में maitenanace engineer थे ।भाभीजान को मराठी पर ऊबूर (command) था ।आस पास पड़ोसियों से पहचान करली।लगता नहीं था इतने बड़े घर से आयी है ।
तुम याद आये और तुम्हारे साथ गुज़रे ज़माने याद आये
डॉक्टर क़ादरी भाभी जान के अब्बू नंदुरबार की मशहूर शख़्सियत थे ।कभी कभी मुंबई आजाते ।बड़े ज़िंदा दिल, सादगी पसंद थे।hurryup slowly उनका तकयाए कलाम था ।मुझे एक joke सुनाते थे ।रागिब पता है कलकत्ता शहर का नाम कैसे पड़ा ।मैं कहता जी मुझे पता नहीं । कहते “एक अंग्रेज़  officer अपने साथियों के साथ जंगल से गुज़र रहा था ।एक आदमी लकड़ियाँ काट रहा था उस अंग्रेज़ ने उस आदमी से पूछा। “ well what is the name of this place “वो आदमी समझा लकड़ियों के मुताबिक़ पूछ रहा है ।उस आदमी ने जवाब दिया “कल काटा “।    अंग्रेज़ कहता “ok this place is culcutta “।  और डॉक्टर साहेब ज़ोर से कहकहा लगाते। भाभी जान  की अम्मा भी बहुत मोहब्बत करने वाली खातूँन थी ।मुझे हमेशा rocket कह कर पुकारती ,एक अपनेपन का अहसास होता था ।
मुझे सहल होगायीं मंज़िलें वो हवा के रूख भी बदल गए 
तेरा हाथ हाथ में आगया के चिराग़ राह में जल गयें 
ये शेर दादाभायी ने मुझे पहली बार सुनाया था ।भाभीजान दादाभाई पर सादिक़ आता था ।शादी के एक साल के अंदर अंदर lubnaa की पैदायिश हुवि ,दादाभाई को कुवैत में job मिल गया।ददाभाई कुवैत shift होगये भाभी जान और lubna को अपने पास कुवैत बुला लिया।समीरा ,नाएला,उजमा  की पैदायिश कुवैत में हुयी ।
हयात नाम हैं यादों का तल्ख़ और शीरिन 
२५ ,३० साल लम्बी मुद्दत भाभी जान ,दादा भाई ने बच्चों के साथ कुवैत में गुज़ारी ।दरमियान में वकफ़े वकफ़े से India के चक्कर लगते थे ।अब्बआ और जावेद भी मुंबई शिफ़्ट होगाए थे ।डॉक्टर वासिफ M.B.B.S. करने के बाद गुजरात में medical officer का job कर रहे थे ।जावेद और में ने भी graduationकिया ।हमारे education पर दादा भाई ,भाभी जान ने बहुत दिलचस्पी ली ,वाशी में row house उसी ज़माने की यादगार है ,ताके हमें किसी क़िस्म की परेशानी न हो ।उन यादगार लमहात,उन दिनों कि ,खट्टी मिट्टी यादों की महक जब दादा भाई family छुट्टियाँ  गुज़रने इंडिया आकर हमारे साथ वक़्त गुज़रते थे ,मिटाने से नहीं मिटते, भुलायें से नहीं भूलती।carrem , ludo ,ताश की बाज़ियाँ, बम्बई की चौपटी,marine drive, hanging garden, fish emporium ,  जहु, की वो मटर गशतियाँ, metro theatre में छोटा चेतन ३D में देखना ,बदलापुर नदी में ली गयी डुबकियाँ, तस्वीरें जो उस duration में खीचीं जाती कुवैत से develope होकर न आजाती बेचैनी से इंतज़ार रहता ।Lubna,समीरा ईद कॉर्ड कुवैत से  रवाना करते, अपनी प्यारी प्यारी तस्वीरें पोस्ट से भेजते हम सब को शिद्दत से इंतेज़ार रहता (आज भी वो पुरानीतस्वीरें शगूफताऔर मेंने ख़ज़ाने  की तरह संभाल कर रखीहैं) ।डॉक्टर  साहेब,मेरी और जावेद की शादियों में दादा भाई,भाभी जान बचों ने जश्न का माहौल पैदा किया , बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया ।ज़िंदगी का बहतरींन सरमाया है ।यूँ तस्सवर पे बरसती हैं पुरानी यादें, दिल भर आता है, आँख नम होजती है ।
मुझे याद है दादा भाई  ने ABBA को कुवैत बुला कर हज करवाया था इंडिया वापिस लौट कर अरसे तक ABBA भाभी जान की ख़िदमात का ऐतराफ करते रहे । कहा करते वो लोग नवाब के जैसे ज़िंदगी गुज़ारते हैं ।भाभी जान के शाही दस्तरख़ान का हमेशा ज़िक्र करते ।lubna की परवरिश जो भाभी जान के जेरे साया होरही थी ,ख़ुशी इत्मिनान का इजहार करते ।lubna,नवेद और सना के रौशन मुस्तकबिल की हमेशा पेशांगोयी करते ।तीनो  अपने अपने  घर की पहली औलाद थे ,और उनके साथ abba ने बहुत वक़्त गुज़ारा था ।
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं 
बच्चियों की higher education के लिये भाभीजान को India लौटना पड़ा ।दादाभाई भाभी जान में अजीब जहनी हम आहँगी(tuning) थी ।लड़कियों को ऊँची तालीम दिलवाना उस ज़माने में खसुसन मुस्लिम घरानो में ना के बराबर था ।वजे शायद ,शादी के लिए पढ़े लिखे लड़कों का मिलना मुश्किल मरहला था ।अब भी यही हाल है लेकिन  उस दौर में पढ़े लिखे मुस्लिम बचें आटे में नमक के बराबर हवा करते थे ।दोनो ने  बच्चियों को बेहतरीन education दिलवाकर ,अख़लाक़ से सवार कर , मारूफ ख़ानदान में रिश्ते करवाके ,खानदान क्या मुस्लिम समाज में मिसाल क़ायम कर दी ।ये मिसाल हम तीनो भाईयों के लिए भी मशआले राह साबित हुवि ।
हिकायते  ग़म ए दुनिया तवील थी कह दी 
हिकायते ग़म ए दिल मुख़्तसर है क्या कहिए 
ख़ुशी के लम्हे पलक झपकते गुज़र जाते हैं ।इम्तिहान का वक़्त जान लेवा होता है ।पल सदियों की मनिंद महसूस होते हैं ।
India वापसी के बाद महरूम ददाभाई के कूछः फ़ैसले ,अंदाज़े  की ग़लती, शायद वो हिन्दुस्तान के माहोल से पूरी तरह वाक़िफ़ नहीं थे ,कूछः लोगों के ग़लत मशवरों पर आँख बंद करके यक़ीन कर लिया ।आख़िर  ,क़िस्मत का लिखा ही कह सकते है। ददाभाई  का उरज के बाद जवाल का  वो करब आमेज दौर भुलाए नहीं भूलता ।भाभीजान ने उस जाफ़िशान दौर में क़दम क़दम पर ददाभाईका साथ  दिया ।उनके ज़ख़्मों पर मसीहा  बन फ़ाहे रखती रही ।तमाम मुसीबतों में सीसा पिलायी दीवार की तरह सीना सपर होती रही ।लेकिन सैलाब था के रुकने  का नाम नहीं लेता था ।तमाम नेक नामी, इज़्ज़त ,दौलत तीनको की तरह बिखर गयी ।दादाभाई हालात के सामने बेबस होगाए ।में उसवक्त उनकी आँखों  की बेबसी को ताहयात नहीं भूल सकता ।हालाँकि मौत  से पहले उनोहने सब जिम्मेदारियाँ पूरी की तमाम क़र्ज़ अदा किये ।लेकिन हिस्सास शख़्स ऐसे हालात को बर्दाश्त नहीं कर सकता ।
दुआ देती हैं राहें आज तक मुझ आबला पाँ को
मेरे पैरों की गलकारी बियाँबान से चमन तक है
ददाभाई से बिछड़ने के बाद भाभी जान ने अपने आप को समेटा और ख़ूब समेटा ।उजड़ी इमारत को तीनका तीनका जोड़ कर अज सरे नौ तामीर किया ।फिर चारों बच्चियों  ने भी जिस तरह उनकी दिलजोयी  की  अमेरिका, दुबई ,लंदन अपने पास बुला कर रखा,आज के दौर में ख़्वाब की बातें मालूम होती हैं ।अल्लाह ऐसी नेक औलाद सब को अतः करें ,अल्लाह इस फ़ेल के बदले उन सबको जजाए ख़ैर अतः करें ।
 पिछले ६ महीने से भाभी जान lock down में है ।पहले उनका हाथ fracture हुवाँ फिर करोंना का कहेर ।लेकिन उनकी ख़ुश मिज़ाजी में कोयी फ़र्क़ नहीं आया ।जो शख़्स तूफ़ान का मुक़ाबला कर चुका है उसे छोटे मोटे हादसत से डर नहीं लगता ।अल्लाह रबूल इज़्ज़त उनह इसी तरह ख़ुश ख़ुर्राम रखे । शायर ने शायद उनिह के लिए कहा है ।
चला जाता हूँ हँसता खेलता मौजे हवादिस से
अगर आसानियाँ हो ज़िंदगी दुशवार होजाए






सोमवार, 8 जून 2020

Diamond jubilee की ओर एक क़दम

                                                       Diamond jubilee की ओर एक क़दम
भला किसीने कभी रंग व बू को पकड़ा है 
शफ़क को क़ैद मे रखा 
हवा को बंद किया
Covid १९ ने दस्तक दी तो अहसास हूवॉ की “न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम होजाए “ सोचा  कुछ भुली बिसरी यादों को ,दिल से क़रीब लोगों के हालात लिखे जाए ,काग़ज़ पे उतार कर लोगों तक पहुँचाया जाए ।वरना आजकल पढ़ने वालों से जियादा लिखने वाले होगयें हैं ।whatsup पर दूसरों से मिले messages को बग़ैर पड़े ,दूसरों तक भेजने की होड़ लगी है ।किस के पास पढ़ने और समझने का समय है ।
Dr वासिफ अहमद , वासिफ  अहमद का मतलब होता है अल्लाह के रसूल जिन का नाम अहमेद भी था ,की तारीफ़ बयान करने वाला ।हमारे बीच एक कड़ी ,वाक़िफ़ अहमद भी था जो टूट गयी है ।हमारे अबआ ने  हमारे नाम बड़ी सोच कर रखे थे। और सब की birth date का record भी रखा था । वरना हमारे स्कूल में  mere साथ वाले सब students की  birth date १ जून  थी ।वालीद साहेब का पुराना क़ुरान था जिस में आख़िरी page पर अपनी तमाम औलाद की ,place of birth ,time of birth, date of birth लिख रखा था ।बदक़िस्मती से वो गुम होगाया है ।
Dr वासिफ मुझे ७० साल से जानते है और में भी उनसे ६६ साल से वाक़िफ़ हुँ ।में इतने confidence से इस लिए कह सकता हूँ की  वो मेरे बड़े भाई है और वो मुझसे ४ साल बड़े है ।बड़ा इत्तिफ़ाक़ है  की हम चारों भाइयों के दरमियान ४ साल का फ़र्क़ है ।
कूछः इस तरह से मुझे हादसाते मुहिम मिलते हैं ।
  १९६७ में dr वासिफ ऐंग्लो उर्दू हाई स्कूल जलगाँव में पढ़ते थे । ९th standard में थे एक दिन स्कूल से लौटते हुवे नटराज cinema के पास बिजली के pole से टकरा कर गिर पड़े थे ।कई घंटों की बेहोशी के बाद जागे थे । अब्बू हम
सब परेशान थे। 
बचपन से  dr साहब ज़हीन तो थे ही ,इस हादसे के  बाद ज़हानत में और चार चाँद लग गए ।एस॰एस॰सी॰ exam top rankingमें पास किया ,J,J, college जलगाँव से intermediate। sewagram medical college में admission मिला ।आज भी जलगांव की आंग्लो उर्दू स्कूल की top ranking students के लगे बोर्ड पर उनका नाम लिखा है ।
जब तक jalgaon में रहे हम सब राशिद,जाहिद, जावेद और मुझ नाचीज़ पर बेताज बादशाह की तरह हुकूमत करते रहे ।जब जी में आता हम को पीट कर रख देते ।उन की वजह से घर में discipline क़ायम था । चार आने में सुकालल मामा से हमारे बाल कटवाते और ख़ुद सलून में जा कर stylish cutting बनवाते ।धोबन से कही सालों तक एक ही rate में कपड़े धुलाते रहे । छोटी आपा ने भी उन का बड़ा ख़याल रखा ।Dr साहेब  की उस ज़माने में  दोस्तों की मंडली थी ।मुनाफ़ ,ज़फ़र ,रहीम ,anees सभी बेहद शरीर ,खेल और पढ़ायी में तेज़ ।महल्ले के मिया चाचा से उनकी कभी नहीं बनी ।
    M.B.B.S. करने के बाद गुजरात में मेडिकल ऑफ़िसर के अहदे पर join किया । बालपुर,व्यरा, मियागाम कर्ज़न अपनी duty की ।DHO की पोस्ट तक तरक़्क़ी की अब retire हो कर ज़्यादा वक़्त दुबई में नवेद और अपने पोतों के साथ बिताते है ।
   डॉक्टर वासिफ को हम सब की शादियों की बड़ी फ़िक्र थी । अपनी ख़ुद की शादी की तफ़सील में तो नहीं जानता क्यूँकि इसे चालीस साल का लम्बा अरसा होगाया है ।  ददाभाई की शादी के लिए बहुत कोशिश की लेकिन बात कुछ जमी नहीं ।मेरी और जावेद की शादी में बड़ी मुस्तैदी दिखायी ।नवेद और इरम की शादियाँ करवायी ।अलहमदोलीलाह हम सब ख़ुशहाल ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं ।मुझे यक़ीन है वो marriage bureau की ऑफ़िस खोल सकते है ।
जसतजु जिस की थी उस को पाया हम ने 
इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हम ने 
डॉक्टर साहेब हज कर चुके है ।अमेरिका का हाल चाल भी जान आये है ।दुबई की ख़ाक छानते रहते है ।नवेद और इरम अपनी जिंदगियों में ख़ुश है ।रावी चैन लिखता है ।कहा जाता है बनिए ,मारवाड़ी अपने नक़द से ज़्यादा सूद की amount से ख़ुश रहते हैं ।dr वासिफ अहमेद भी निवासियों और पोतों को देख कर निहाल होते रहते है ।
    आज ८ जून डॉक्टर साहेब ने ७१ वे बरस में क़दम रखा है । diamon jubilee सिर्फ़ चार क़दम पर है ।”फ़ासला चंद क़दम का है मनाले  चल कर “
कहीं रहे वो ख़ैरियत के साथ रहे 
उठाए हाथ तो दुआ एक याद आयी 
तुम्हारी ज़िंदगी मे इस क़दर भीड़ रहे ख़ुशियों की
के ग़म गुज़रना भी चाहे तो रास्ता न मिले 
आज इस ख़ुशी के मौक़े पर शगूफता मेरी जानिब से dr वासिफ साहेब को ढेर सारी दुआएँ और नेक खवाहिशात ।आमीन

रविवार, 31 मई 2020

हामिद खाँज़ादा उर्फ़ हमारा शाहरुख़

बहुत लगता है जी सोहबत में उनकी
वो अपनी ज़ात में एक अंज़ूमन है
जैसे जैसे हम अपनी तारीख़ें पैदाईश से दूर और तारीख़ मौत से क़रीब होते ज़ारहे है ,अजीब अजीब ख़्वाहिशें दिल में जन्म लेने लगी है ।सोचते थे किसी ख़ानदानी शहज़ादे से जान पहचान होनी चाहिए ।लो साहब बग़ल में छुरी गाँव में ढँढोरा।हामिद खानजाँदाँ से मुलाक़ात हुयी ,मुलाक़ातें बढ़ी, उनके ख़ानदानी पसे मंज़र का पता चला तो मालूम हुवाँ साहेब नवाब ज़ंजीरा के ख़ानदान से निस्बत रखते है ।
  हामिद भाई की शख़्सियत में नफ़ासत है ,हमेशा बेहतरीन कपड़े पहने होते है।कुर्ता पजामा ,अरबी झबा,पैंट पर अक्सर t shirt बसा औक़ात shirt भी पहने होते है ।चेहरे पर french cut दाढ़ी जो हमेशा ख़ूबसूरती से तराशी होती है। ख़ुशबू का शौक़ है ,दोस्तों को भी अपनी तरफ़ से gift करते रहते है। उनकी एक ख़ासियत जो उन्हें सब से मुमताज़ करती है ,उनकी मेहमान नवाजी ।दोस्तों की दावते करना और सब को शौक़ से खिलाना पिलाना, और इस बात से जो मुस्सरत का एहसास  उन्हें होता है उनके चेहरे से झलक पड़ता है।बहुत ही ख़ुश खूराक है लेकिन उनका खाना चंद लुक्मों  से जियादा नहीं होता ।इसीलिए लोग दावतों मैं उनके साथ बैठ कर खाना पसंद करते है ।सिगरेट के शौक़ीन हैं और सिगरेट पीने का अपना अन्दाज़ है ।
सुना है उसको सुख़न के उसूल आते हैं 
करे कलाम तो बातों से फूल आते हैं 
हामिद भाई अच्छे शायर तो है ही वरना भुसावल के all India मुशायरा जो सारी दुनिया में मशहूर है , उनको सदारत (president) के फ़रायज अंजाम देने की दावत क्यों दी जाती ।उनकी लिखी तहरीरे  (articles) भी दिलचस्प (interesting)होती है ।
कहानी मेरी रुदादे जहाँ मालूम होती है
हामिद भाई ने ज़िंदगी में कामयाब leather articles का कारोबार किया ।अपनी औलाद को बहरीन education दिलाया ।सब अपनी ज़िंदगी मैं ख़ुश हैं ।बड़े बेटे के पास अक्सर saudi जाते हैं ।कई बार उम्रें और हज करने का मौक़ा भी मिला ।
ज़िंदगी का ज़्यादा समय Bombay में belasis road के पुराने मकान पर गुज़रा।मुम्बई की गली गली से वाक़िफ़ है ।जवानी  में नारायण भकिया, हाजी मस्तान जैसे नामी लोगों से साथ उठते बैठते थे ।इसलिए आप के कुछ ऐसे शौक भी है जो रंगीन मिज़ाजी की दहलीज़ को छू लेते हैं। देहली में भी हामिद भाई की पहचान नामी लोगों से है ।पुरानी देहली में उनके साथ घुमने का मौक़ा मिला था ।कई लोगों से मिलाया जमिया मिलिया की सैर करायी ।दिल्ली की कुछ ऐसी मालूमत दी जो बहुत कम लोग जानते हैं ।दिल्ली के लिए हामिद भाई हमारे लिए बहरत्रीन  guide साबित हुए ।हामिद भाई के साथ ज़ंजीरा का सफ़र भी  किया ।उनका आबायी (ancestral) मकान देखने को मिला ।उनके भाई और रिश्तेदारों से मुलाक़ात की ।वहाँ नर्गिस फ़ार्म पे शाहाना दावत भी उड़ायी ।साथ साथ ज़ंजीरा की history से भी जानकारी हुयी ।
हामिद भाई नेरुल मे अरसे से मुक़ीम है ।social work खुलूस से करते रहते हैं ।सियासी हल्क़ों मे उनका रसूख़ है ।विभाग कमेटी के मेंबेर रह चुके हैं ।नेरुल के चप्पे चप्पे को हाथ की लकीरों की तरह वाक़िफ़ है ।दोस्तों जानने वालों का हलका लम्बा चौड़ा है ।
दोस्तों में अक्सर ये बात discuss होती है की शाहरुख़ खान बुढ़ापे मे हमारे हामिद भाई के जैसा दिखायी देंगा ।मशाल्लह हामिद भाई अब भी बग़ैर makeup के शाह रुख़ से ज़ियादाँ हसीन व ख़ूबसूरत दिखयी देते हैं ।
अल्लाह से दुआगो हुँ हामिद भाई इसी तरह लोगों की ख़िदमत मे लगे रहे ।दोस्तों की दावतों का ज़रिया बने ,ख़ुश्बू बाँटते रहे ।
कहीं रहे वो ख़ैरियत के साथ रहे 
उठाए हाथ तो याद एक दुआ आयी