शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2025

qudrat ka nizam me mudakhlat

                                      

                                                                 قدرت کے نظام میں مداخلت 

مکرمی 

انقلاب میں مورخہ ١٢ فروری کو خبر نظروں سے گزری چین میں  پچھلے سال ٢٠ فی صد کم شادیاں ہویی اور اب تک کی سب سے کم شادیاں ہویی اب چین میں  لوگ بچے پیدا کرنے سے گریز کر رہے ہیں جس کی وجہ سے  نوجوانوں کی آبادی گھٹ رہی ہیں اور عمر رسیدہ لوگوں کی آبادی میں اضافہ ہو رہا ہے ایک زمانہ تھا چین میں ایک سے زیادہ بچہ پیدا کرنے پر سخت سزا حکومت کی طرف سے دی جاتی تھی کہا جا رہا ہے تائیوان میں اتنی کم تعداد میں بچے پیدا ہورہے ہیں کچھ سالوں بعد ملک آبادی سے خالی ہو جائے گا جاپان جرمنی ممالک میں آبادی کم ہو رہی ہے کام کرنے کے لئے دوسرے ممالک سے لوگوں کو بلایا جا رہا  ہندوستان میں بھی کیرالہ اور جموں کشمیر میں آبادی گھٹ رہی ہے راجستان مدھیہ پردیش گجرات میں عورتوں کی تعداد کم ہے -مثنوی طور سے آبادی کو کنٹرو ل کرنا قدرت کے نظام میں مداخلت ہے جسکے  مضر  اثرات دنیا دیکھ رہی لیکن انسان کی فطرت ہے وہ الله کے نظام میں بیجا مداخلت کرنے کا عادی ہے الله دنیا کو شیطان کے شر سے محفوظ رکھے جو انسان کے زہن کو پراگندہ رکھتا ہے جس کی بنا پر دنیا میں بے اعتدالی شر پھیل رہا ہے 

راغب احمد 

نیرول نوی ممبئی 

सोमवार, 10 फ़रवरी 2025

is bahaane se magar dekh lee duniya ham ne

With shahid Aslam,Mobinuddin Malik Hamidoddin

                                               

                                                    Shazeb waleema at salman hall
With Mobinuddin Malik and Hamidoddin at Waleema 


                                              इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हम ने  

भागती दौड़ती दुनिया में ,रूटीन से हट कर कुछ लम्हे अपने नाम भी करना ज़रूरी होजाता है। ५ दिन औरंगाबाद में गुज़ार कर यु लगा जैसे किसी रेगिस्तान से गुज़रते कुछ लम्हे कुछ पल नखलिस्तान (oasis ) में गुज़ार कर ताज़ा दम होगया हूँ।  मौक़ा था इरफ़ान मुंशी के घर उनके फ़रज़न्द अबुज़र और अक़्सा ज़मानी का वलीमा उनकी दुख्तर ज़ारा और शाजेब का निकाह और रिसेप्शन। हमें (शगुफ्ता और मुझे) बड़े इसरार से बुलाया गया था।  अब्दुल रहीम साहेब  (शाजेब के वालेदैन ) ने एक साल क़ब्ल नासिक की शादी में हमें न्योता दे दिया था। अबुज़र का निकाह नंदुरबार में होचुका था। और ५ फेब्रुअरी २०२५ को वलीमा था। ५ फेब्रुअरी २०२५ को ज़ारा का निकाह शाजेब के हमराह आयेशा मस्जिद हिमायत नगर /चाउश कॉलोनी में  बाद नमाज़े असर हुवा। 

                                                ख़ुशी है सब को रोज़ ईद की यां 

                                                हुए हैं मिल के बाहम आशना खुश   

            रात बाद मग़रिब बाद कोहेनूर लॉन  (आज़ाद कॉलेज के नज़्द )  असराना  ( रिसेप्शन ) में , दोनों नए शादी शुदा जोड़ों की ख़ुशी में हम सब शरीक थे। धुले ,नंदुरबार ,कल्याण ,मुंबई, नासिक ,नवसारी से मेहमान तशरीफ़ लाये थे। मौसम भी खुशगवार था। खाना भी मज़ेदार था सब ने लुत्फ़ उठाया। औरतों के लिए परदे का इंतेज़ाम था। बड़ी ख़ुशी हुयी ,न म्यूजिक न डांस बड़ी सादगी से वलीमे की रस्म अदा हो रही थी। आज कल जो नुमाईश और चकाचौंद शादियों में हो रही है कही न कही अल्लाह की नाराज़गी का सबब बन रही है। 

            ऐसे मौके पर लोगों से मिलने मिलाने का सिलसिला दिलचस्पी की वजह बन जाता है। हमिद शैख़ मेरा भतीजा होता है लेकिन हम हमेशा दोस्तों की तरह रहे हैं। मिलते हैं तो लगता है दुनिया जहां की नेमतें मिल गयी बातों का सिलसिला ख़त्म नहीं होता। सलीम सय्यद (नवसारी ) ,परवेज़ और इक़रा खानदेश की पूरी टीम मौजूद थी फर्दन फर्दन सब से मुलाक़ात और गप शप हुयी , रागिब अहमद (Motivator ) साहब से सैर अमेज़ गुफ़्तत्गु हुयी बहुत कुछ नया जानने का मौक़ा मिला। मुबीनुद्दीन मालिक से गड़बड़ी में शायरी नहीं सुन पाए क़लक रहा। सोने  पे सुहागा जनाब हसींन मुंशी से अरसे बाद मिल कर तबियत बाग़ बाग़ होगयी। 

           दूसरे दिन ६ फेबरवरी २०२५ जनाब अब्दुल अब्दुल रहीम शैख़ साहेब की जानिब से सलमान हॉल नज़्द दिल्ली गेट औरंगाबाद में वलीमे का इंतेज़ाम किया गया था। अब्दुल रहीम शैख़ साहेब बड़े खुश मिज़ाज तबियत रखते हैं। बॉम्बे मर्केंटाइल बैंक से रिटायर हुए है अपनी तीनो औलादों की बेहतरीन तरबियत की है। नौशे मिया ( शाजेब )माशाल्लाह UPSC के लिए appear होने वाले हैं। उनके रोशन मुस्तकबिल के लिए नेक ख्वाहिशात। मुनाफ मंज़ूर अली सय्यद साहब से फ़ोन पर गुफ्तगू हुयी तो अकदा खुला के कडु मिया शैख़ से उनकी क़रीब की रिश्तेदारी है। इसी मौके पर पहली बार औरंगाबाद की नामवर डिश नान खलिया खाने को मिली बहुत मज़ा आया। 

                                                 वो फूल सर चढ़ा जो चमन से निकल गया 

                                                  इज़्ज़त उसे मिली जो वतन से निकल गया 

           खान्देशियों ने जिस जगह भी हिजरत करके उस मुक़ाम को अपना वतन बनाया। बे-इन्तहा तर्रकी हासिल की। खान्देशियों की खासियत है हर माहौल में बखूबी ढल जाते है,  जिस तरह शकर नमक पानी में घुल जाते हैं। इरफ़ान मुंशी ने हिमायत नगर (चाउश कॉलोनी ) में अर्फी मंज़िल तामीर की। कल्याण को अलविदा कह कर एक नयी दुनिया आबाद की। अपने बच्चों के साथ मिल कर रेडी मेड कपड़ों की तिजारत शुरू की और कामयाब भी हुए  माशाल्लाह क़ाबिले सताइश है। उनके दो सपूत दुबई में जॉब कर रहे हैं। अपने उम्र रसीदा वालिदैन की खिदमत भी आरिफा इरफ़ान दिलो जान से कर रहे हैं , सताइश के क़ाबिल है। अल्लाह उनके कामों में और बरकत आता करे। 

                                                         जाने वो कैसे लोग थे जो मिल के एक बार 

                                                          नज़रों में जज़्ब होगये दिल में उतर गए 

         रहीमुद्दीन शैख़ से मिल कर कुछ ऐसा ही लगा। आप बहादर पुर से बिलोंग करते हैं। मुझे भी एरंडोल बहदर पुर से निस्बत रही है। बचपन में बहादरपुरी होने पर कुछ adverse comments (तन्ज़िया कलमात ) सुनने को मिलते थे। ये लोगों के ज़हन की उपज थी। आज बहादरपुरियों की मिसाल पेश की जा सकती है। रहीमुद्दीन शैख़ साहेब बड़े disciplined ,वक़्त के पाबंद वाक़े हुए है। अल्लाह उनकी और इज़्ज़त बढ़ाये। 

                                                       ढूंढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती 

                                                       ये ख़ज़ाने तुझे शायद के खराबों में मिले 

          नसीम खाला ,मेरी खाला और शगुफ्ता की फूफी होती है जब भी मिलता हु ,  मोहबत का मतलब समझ में आता है। खाला अम्मा से मिलकर मरहूम शराफत अली जनाब की यादें यादें ताज़ा होगयी। अपने नाम की तरह उनमे शराफत कूट कूट कर भरी थी। अल्लाह जन्नत के आला दरजात आता करे आमीन । रईस ,इल्मान ,ज़ीनत से भी मिल कर बे इन्तहा ख़ुशी हुयी,रोशन गेट  सादात मस्जिद के क़रीब, उनके घर जा कर मुलाक़ात की । इस खानदान ने भी माशाल्लाह बहुत तर्रकी की है। अल्लाह मज़ीद तर्रकी आता करे आमीन। 

          सैरे हासिलऔरंगाबाद की रिहाइश पुर लुत्फ़ रही। 


गुरुवार, 23 जनवरी 2025

Khiraje Aqeedat

                                                                       खिराजे अक़ीदत 
Late Sayed Zakir Hussain

                                              अजीब दर्द का रिश्ता था सब के सब रोये 

                                               शजर गिरा तो परिंदे तमाम शब् रोये 

१९ जनवरी 2025 सैय्यद ज़ाकिर की अलालत की खबर सब ग्रुप्स में वायरल हो गयी थी और उसी शब् इंतेक़ाल की खबर भी रिश्तेदारों के सभी ग्रुप्स में देखने को मिली। ताज़ियत के मेसेजेस का एक सैलाब हर ग्रुप में उमड़ आया। जनाब हसींन और JGShaikh ने भी मरहूम को अपने खूबसूरत अंदाज़ में  खिराजे अक़ीदत (Obituary ) पेश किया।  २० जनवरी २०२५ बामुतबिक १९ रज्जब १४४६ तद्फीन  एरंडोल के उसी क़ब्रस्तान में कई सौ लोगों की मौजूदगी में अमल में आयी , जिस क़बरसतन को रजिस्टर करवाने और बॉउंड्री की दीवार बनाने के लिए एरंडोल क़ब्रस्तान कमिटी के साथ मिलकर ज़ाकिर सैय्यद ने अनथक मेंहनत की थी , खुश किस्मत रहे उनेह  हमारे  बुलंद अख़लाक़ बुज़र्गों के दरमियान जगह मिली। 

                                                    फैला के पाँव सोयेंगे तुर्बत में आज हम 

                                                     लो अब सफर तमाम हुवा घर क़रीब है 

  बचपन से सैय्यद ज़ाकिर को किताबों से अदब से दिलचस्पी रही। उन की पहली कहानी बहुत कम उम्र में छपी थी। ये कहानी एक सच्चे हादसे पर मर्कूज़ थी। में ये कहानी पढ़ चूका हूँ। उनकी सभी कहानियां ज़िन्दगी से क़रीब हादसात ,वाक़ेयात पर लिखी गयी। "रासतें बंद हैं "ये किताब जब छपी मुझे भी एक कॉपी रवाना की थी और मुझ से कहा था अपने तस्सुवरात ज़रूर बयान करना। क़रीबी रिश्तेदारों ,बुज़र्गों पर जब कालम लिखना शुरू किया उस का उन्वान भी ज़ाकिर सय्यद ने तजवीज़ किया था जो बहुत खूबसूरत "खुशबु जैसे लोग लोग मिले " था। लगातार कई बुज़र्गों के हालते ज़िन्दगी हमारे सामने लाने में वह कामयाब हुए। काश के हम एक किताबी शक्ल में छाप सकते। मेरी ये आरज़ू रह गयी के खुशबु जैसे लोग मिले में उन पर लिख पाता। खैर उन के लिए खिराजे अक़ीदत ही सही। एरंडोल की हिस्ट्री पर उनेह ऊबूर  (Mastery   ) हासिल थी। सदियों पहले सिपह सालार मालिक काफूर की अपने लश्कर के साथ एरंडोल में रहियिश यहाँ जामे मस्जिद का बनवाना ,छावनी कायम करना मरहूम सैय्यद ज़ाकिर ही से मालुम हुवा था । हज़रात ख्वाजा खुर्रम खत्ताल चिस्ती की ज़िन्दगी पर एक तवील मज़मून भी सय्यद ज़ाकिर ने लिखा था। सय्यद ज़ाकिर फिरोज हाश्मी (क़लमी नाम ) के नवासे और क़ाज़ी मुश्ताक़ के क़रीबी हैं।  क़ाज़ी मुश्ताक़ तो आज के दौर के मारूफ मुससनीफ़ (Writer ) माने जाते है। उनके लिखे ड्रामे साने गुरूजी ,ग़ालिब की हवेली ,अबुलकलाम आज़ाद हिन्दुस्तान भर में मशहूर हुए हैं। ऐसे खानदान के सपूत को यक़ीनान लिखना वाजिब होता है। हम तो ज़िन्दगी गुज़ार कर गुज़र जाते हैं सय्यद ज़ाकिर जैसे लोग ज़िन्दगी के साथ गुज़रते है ,महसूस करते है और लफ़्ज़ों में बयान भी करते हैं। 

   सैय्यद ज़ाकिर  बचपन ही से बुज़र्गों की बहुत इज़्ज़त किया करते थे। उनके साथ बैठने वक़्त गुजरने में उनेह लुत्फ़ महसूस होता था।  उनकी नसीहतों पर अमल करने में फख्र महसूस करते। हमारे वालिद मरहूम हाजी क़मरुद्दीन से वह रब्त में रहते थे और बड़े खूबसूरत खत लिखा करते थे। काश हमने पुराने खुतूत के ख़ज़ाने को मेहफ़ूज़ कर लिया होता। मैं ने भी अपने वालिद मरहूम क़मरुद्दीन ,मरहूम हाजी सादिक़ अहमद के खत पढ़ कर बहुत कुछ सीखा है। और डॉक्टर वासिफ अहमद के खुतूत का कोई जवाब नहीं  होता था। आज के दौर में सोशल मीडिया ने इस फन  को दफ़न ही कर दिया है। 

                             कौन मुझसे पूछता है रोज़ इतने प्यार से 

                             काम कितना होगया, है वक़्त कितना रह गया 

  मरहूम सैय्यद ज़ाकिर को खानदान के शिजरे की ज़बरदस्त मालूमात थी। औलिआ अल्लाह से भी उनेह ज़बरदस्त अक़ीदत थी। होता ये है के रिटायरमेंट के बाद लोग अपने आप को समेट लेते हैं ,मरहूम ज़ाकिर के साथ कुछ अलग ही  हुवा। एंग्लो उर्दू स्कूल एरंडोल ,मस्जिद और क़ब्रस्तान ट्रस्ट एरंडोल के साथ जुड़े रहना। अपनी अदबी मसरूफियत ,सुना है मरहूम रोटरी क्लब के मेंबर भी थे। मराठी साहित्य सम्मलेन में भी एक्टिव थे। ये तमाम काम सताइश की तम्मना सिले की परवाह से बेनियाज़ होकर मरहूम ने किया। जो भी किया अपनी तस्कीन के लिए किया। शायद इसी लिए उनके वक़्त में इतनी बरकत होगयी ,और इतने काम कर सके। 

                                 कितने अच्छे लोग थे ,क्या रौनकें थीं उनके साथ 

                                 जिनकी रुखसत ने हमारा शहर सूना कर दिया 

  जन्नती होने की जितनी बशारतेँ  अल्लाह के रसूल ने दी थी , वो सब मरहूम सैय्यद ज़ाकिर में मौजूद थी।  तीन लड़किया जिन की बेहतरीन तरबियत कर ,मारूफ घरानों में उनके रिश्ते  मरहूम ने करवाए। मरहूम के जनाज़े में एक जम्मे ग़फ़ीर (भीड़ ) ने शिरकत की। सुना है एरंडोल का वाटर सप्लाई का मसला मरहूम सय्यद ज़ाकिर ने हल (solve ) करवाया।  "रास्ते बंद हैं "मरहूम की किताब का उन्वान (title ) है ,दुनिया में आने के वो तमाम रास्ते बंद कर गए ,लेकिन अपने लिए जन्नत का रास्ता खोल कर गए। 

                                  बहुत सी खूबियां थी मरने वाले में 

अल्लाह मरहूम सय्यद सय्यद को जन्नत में आला दरजात आता करें अमीन सुम्मा अमीन। 


  

  


गुरुवार, 9 जनवरी 2025

Khushbu jaise log mile-2


Fareeda (Tena khala ) with shagufta



                                           शादी की तक़रीब में रागिब अहमद ,ग़यासोददीन शैख़ साहब 
                                                     सुनी हिकायतें हस्ती तो दरमियान से सुनी 
जनाब ग़यासोददीन शैख़ साहब अपनी उम्र के ८० बहार व ख़िज़ाँ देख चुके हैं। और अब भी माशाल्लाह सेहतमंद और चाक व चौबंद हैं। वालिद सदरुद्दीन शैख़ नसीराबाद से बिलोंग करते थे। पुलिस में जॉब था। आप की ११ औलादें थी ६ बेटे ५ बेटियां। ग़यासुद्दीन साहब जब २ साल के थे वालिद का  इंतेक़ाल हो गया था। चाचाओं ने उनेह अपने पास बॉम्बे बुला लिया। 
                                                      मेहनत से वो तक़दीर बना लेते हैं अपनी 
                                                      विरसे में जिन्हे कोई खज़ाना नहीं मिलता 
   ग़यासोददीन खालू ज़ियादा तालीम हासिल न करने का उनेह हमेशा अफ़सोस रहा है। रिश्ते में वो हमारे खालू और हमारी मिसेस के फूफा लगते है। हमारी खाला फरीदा उर्फ़ टेना और खालू   ने ८ साल जब १९७७ से १९८४ तक ठाणे बेलापुर रोड पर यूनाइटेड कार्बन कंपनी में जॉब करता था मेरा बहुत ख्याल रखा। अक्सर छुट्टी के दिन थाना धोबी आड़ी चला जाता था। कभी कभी तो दोस्तों की एक फ़ौज के साथ उनके घर पहुँच जाता और वो खंदा पेशानी से हमारा इस्तक़बाल करते।  १९८२ में पहली बार कलर टेलीविज़न उन्ही के घर हम दोनों मियां बीवी ने देखा था। 
   जनाब ग़यासुद्दीन ने टेक्सन कंपनी ठाणे से  शुरुआत की जो  ब्रास अल्लुमिनिम रेडिएटर्स और आयल कूलर्स बनाने वाली मशहूर कंपनी है ।
                                                     इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हम ने 
 वो एक बेहतरीन वेल्डर /फैब्रिकेटर्स रहे हैं। जब पासपोर्ट बनाना जुए शीर (दूध की नहर ) निकलने जैसा था किस मेहनत जान फिशनी से अपना और अपनी फॅमिली का पासपोर्ट बनाया होंगा  ग़यासोददीन शैख़ ने 2.5 साल (1971 -1973) अपनी फॅमिली के साथ  रह कर सिंगापुर में काम किया। 
   मुल्क मुल्क की visit  करके उनोहने अपनी skill दुनिया को दिखाई । दुबई ,जॉर्डन ,यमन ,सऊदी अरबिया में जद्दा एयरपोर्ट के इलावा जनाब ने थाई लैंड में भी काम किया। अपनी ज़हानत ,हार्ड वर्क से ग़यासुद्दीन साहब ने प्रोडक्शन इंजीनियर पोस्ट तक तर्रकी की। 
                                                      अदब से देखना लोगों ये मेरा हलाल रिज़्क़ 
                                                      ये कम लगे भी तो तासीर में ज़ियाद है 
   हलाल रिज़्क़ हासिल करके तीनो औलादों की तरबियत भी ग़यासोददीन शैख़ साहब और उनकी अहलिया फरीदा ने खुश असलोबी से की। माशाल्लाह ज़हीर शैख़  (मुकंद ) में जॉब तो करते ही है कराटे में ब्लैक बेल्ट याफ्ता है। लोगो को कराटे  सिखाते हैं दीन से भी जुड़े है। ज़ाहिद शैख़ अबुधाबी में आयल इंडस्ट्री में काम कर रहे हैं। आरिफ शैख़ का खुद का कारोबार है। इनकी औलादों में भी अल्लाह  ने माँ बाप की दुवाओं की बदौलत ज़हानत ,तरक़्की अता की है। 
    अपनी मेंहनत ,ईमानदारी से इंसान कितनी तरक़्की कर सकता है ग़यासोददीन शैख़ साहब इस की ज़िंदा मिसाल है। अल्लाह मौसूफ़ को सेहत के साथ तवील उम्र आता करे आमीन। 


 

मंगलवार, 31 दिसंबर 2024

Ek hangame pe mauquf




With bride and bride groom

Ghyasoddin shaikh,bride and Bride groom,Mrs Fareeda and others

With Anees  Sir Kalyan
                                                      
                                           एक हंगामे पे मौक़ूफ़ है घर की रौनक 
हुज़ैफ़ा ज़ाहिद शेख़  और राफिआ की शादी के वलीमे की दावत का एहतेमाम ग्लोरिया हॉल ठाणे में २९ दिसंबर २०२४ के रोज़ रात में किया गया था। ज़ाहिद शैख़ ने इसरार किया था के बेटे के वलीमे में अज़रूर शरीक रहे। ज़ाहिद  शैख़ साहेब जो मेरे खाला ज़ाद भाई और शगुफ्ता के फूफी ज़ाद है ,दुहरे रिश्ते का एहतराम भी करना था। ज़ाहिद को बचपन में धोबी आड़ी ठाणे के मकान में उनके घर अक्सर देखा था। अब देखना था के ससुर बनने के बाद वो किस तरह नज़र आते है। 
         में और शगुफ्ता रात ९ बजे ग्लोरिया हाल पहुंचे। हाल रौशनी से जगमगा रहा था। हम दोनों ने दूल्हा दुल्हन को स्टेज पर  जा कर मुबारकबाद पेश की  , मौके की ,मुनासबत से शेर सुनाया  
                                       मुझे सहल हो गयी मंज़िले वो हवा के रुख भी बदल गये 
                                       तेरा हाथ हाथ में आगया के चराग़ रह में जल गएँ 
    शानदार दावत थी। ज़हीर और आरिफ ने भी मेहमानो की मेहमान नवाज़ी में कोई कसर नहीं छोड़ी। ज़ाहिद ने भी हमारी वलीमे की दावत में शिरकत पर ख़ुशी का इज़हार किया। वलीमे में एवर यंग तारिक़ मुंशी भाई जान ,भाभी जान ,खालिद मुंशी एंड फॅमिली ,सीमा ,सुलेमान क़ादरी एंड फॅमिली ,अनीस सर ,ज़ाकिर (मुन्ना ),परवीन ज़ाकिर  ,नाज़िरोद्दीन एंड फॅमिली। से मुलाक़ात दुआ सलाम हुयी।  मेहमानो का न ख़त्म होने वाला सिलसिला था। हमारे समाज में बुज़र्गों का बड़ा एहतराम किया जाता है। वलीमे में भी सब लोग सब से पहले ग़यासुद्दीन शैख़ और फरीदा शैख़ (टेना खाला ) (ज़ाहिद शैख़ के वालेदैन ) से मिलने के बाद ही स्टेज पर जा रहे थे।  
      अल्लाह दूल्हा दुल्हन में हमेशा मोहब्बत क़ायम रखे अमीन। ज़ाहिद शैख़ को भी फ़र्ज़ की अदायगी पर दिली मुबारकबाद। 

With zahid Shaikh

शनिवार, 28 दिसंबर 2024

khushbu jaise log mile

                                          Ammar Irfan Sayed ke sath uski office me 
                                           एक और खेत पक्की सड़क ने निगल लिया 
                                           एक और गांव शहर की वस् अत में खो गया  (वस् अत -चौड़ाई )
     नवापुर शहर से मुझे  बचपन से क़ुरबत रही है।  मेरी  (ननिहाल )वालिदा वही से बिलोंग करती है और इंतेक़ाल के बाद वहीँ बड़े क़बरसतान में दफन है।अब तो इस शहर से क़ुरबत और बढ़ गयी है क्यूंकि यही मेरी ससुराल भी है इस शहर की शोहरत की वजह है गुजरात महराष्ट्र की तक़सीम ,नवापुर की टिकट विंडो महराष्ट्र में है और प्लेटफार्म गुजरात में। नवापुर एक sleeping town हुवा करता था। बचपन में ६ बजे शाम के बाद दुकाने बाजार बंद होजाया  करते थे । म्युनिसिपल से रात ८ बजे साईरन बाजाय जाता था उसके बाद शहर में एक हु का आलम हुवा करता। वहा की भतवाल सिनेमा में तनवीर मामू के साथ बहुत अंग्रेजी वेस्टर्न फ़िल्में देखि है। अब भतवाल सिनेमा की जगह रेसिडेंशियल काम्प्लेक्स बन गया है। नवापुर शहर के बीचों बीच से नेशनल हाईवे की तामीर हो रही है। दिन भर शहर मिट्टी से अटा रहता है। सूरत तक नेशनल हाईवे तैयार होचुका है। २ से ३ घंटे में  नवापुर से सूरत पहुंचा जा सकता है। नवापुर MIDC(  D+ ZONE) आदिवासी टैग लगने से ,पावर भी uninterrupted  available है। लेबर भी सस्ता है। ज़मींन भी सस्ती है। बड़ी बड़ी यार्न बनाने वाली companies सूरत से यहाँ शिफ्ट हो रही है। छोटा सा नवापुर टाउन शहर की सूरत इख़्तियार कर रहा है। इस बात का सुबूत है ,पिछले २ चार सालों  में केक की ८ दुकाने खुल चुकी है। फ़ास्ट फ़ूड के बेशुमार आउटलेट्स ,ब्रांडेड चाय की दुकाने। दो माल भी खुल चुके हैं ।रात देर तक स्टॉल्स लोगो से भरे रहते हैं।  अब तो नवापुर में traffic jam भी लगने लगे हैं।सय्यद बिरयानी ब्रांड, नवापुर की पहचान बन गया है।  नेशनल पेपर्स (Times of India )में भी नवापुर को सुर्ख़ियों में जगह दी जा रही है। शायद नवापुर चंद सालों में मालेगाव और भिवंडी को मात दे देंगा । लेकिन शहर में तब्दील होने पर नवापुर का सुकून बर्बाद होजाएंगा ,अब तो हो भी चूका है। खैर कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है।  
                                               बात निकलेंगी तो दूर तलाक जायेंगी 
      नवापुर के लोगों के सोचने का अंदाज़ भी बदलता जा रहा है। quality  एजुकेशन पर नयी नस्ल का रुजहान बढ़ता जा रहा है। सैयद ख़ानदान में ३ क़ुरान के हाफ़िज़ , इंजिनीर्स , और एम. बी. ए मौजूद पाएंगे। 
  आज खुशबु जैसे लोग मिले में अम्मार इरफ़ान सय्यद को introduce करना चाहूंगा। अम्मार नवापुर के मशहूर मारूफ सय्यद खानदान से बिलोंग करते हैं। सिलसिले नस्ब (family tree ) अहमदाबाद के शाह वाजिहुद्दीन से जुड़ता है। मारूफ शरीफुद्दीन सय्यद (बच्चू भाई ) के पोते और इरफ़ान सैयद के फ़रज़न्द है। अल्लाह के रसूल (S.A ) ने नसीहत की थी के अपने बच्चों के खूबसूरत नाम रखे क्यूंकि नाम की खुसूसियत बच्चों में ज़ाहिर होती है। इरफ़ान सय्यद ने नाम रखा अम्मार जिस का मतलब होता है बनाने वाले। नाम ही निस्बत /बरकत से मुंबई के मशहूर साबू सिद्दीक़ कॉलेज से  (B.E Civil )यूनिवर्सिटी में ९३% मार्क्स हासिल करके टॉप किया। इरफ़ान  (अब्बू )के साथ रह कर बिज़नेस की मालूमात हासिल की और साथ साथ M.TECH की तालीम मुक्कमिल की। 
         इस बार इरफ़ान ने मुझे और शगुफ्ता को अम्मार की ऑफिस ले जा कर उनसे मिलवाया। बड़ा खुशगवार मौक़ा था। अम्मार सयेद की ऑफिस का मुक़ाबला मुंबई की किसी कॉर्पोरेट ऑफिस से किया जा सकता है । स्टाफ वर्क स्टेशन पर अपने काम में मशग़ूल (busy ) थे। ऑफिस में खूबसूरत फिश पोंड देखने को मिला। ऑफिस के बाहेर क़तार दर क़तार खूबसूरत पौदे लगे थे। तितली की शक्ल के पौदे को देख कर ख़ुशी हुयी। बोंज़ाई प्लांट भी देखने को मिले। 
          पता चला इरफ़ान सय्यद ने अम्मार को तैरना सिखाया उस ने तो बड़ी लम्बी छलांग माशाल्लाह लगायी। जल जीवन योजना सेंट्रल गवर्नमेंट द्वारा चलायी जा रही है और financing वर्ल्ड बैंक से होती अब तक ४५ villages तक ये स्कीम अम्मार के ज़रिये पहुँच चुकी है लोग फायदा उठा रहे हैं। योजना क्या है  बोरिग पंप  installation १ लाख लिटर्स का ओवरहेड टैंक ,और देहात के हर घर तक पाइपलाइन। TATA CONSULTANCY SERVICES MUMBAI  की कड़ी निगरानी में ये योजना implement की जारही है। इस योजना को कामयाब करने के लिए अम्मार ने  १४ ,१५ लोगों का trained स्टाफ भी रखा है। खुद के वाटर टैंकर्स ,Poclain ,excavator भीअम्मार ने खरीद रखे हैं। माशाल्लाह जुमे की नमाज़ के बाद हम ने उसकी ऑफिस को विजिट किया था और अम्मार भी सफ़ेद कुर्ते पाजामे में मलबूस (पहने ) था। क़ुरान में सूरा जुमा में आयात है के जुमे की नमाज़ के बाद अपना रिज़्क़ तलाशने निकल पड़ो। बहुत ख़ुशी हुयी अम्मार का set up देख कर। अल्लाह खानदान के हर नौजवान को इसी तरह की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन 
         इरफ़ान सैय्यद ,रेहाना भाभी मुबारकबाद के मुस्तहक़ है बहुत खूबसूरत अंदाज़ में अम्मार की तरबियत की। अम्मार के लिए दिल की गहराईओं से शगुफ्ता मेरी जानिब से नेक ख़वाहशत ,दुवायें । अल्लाह दिन दुगनी रात चौगनी तरक़्क़ी अता करें आमीन सुम्मा आमीन। ,
           अम्मार ख़ुशी इस बात की भी है के लोगों तक पानी पुह्चाना  सवाबे जरिया है। तुम ईमानदारी से काम तो कर रहे हो ,माशाल्लाह घर घर पानी पहुंचा कर सवाब भी  कमा रहे हो। इसे कहते हैं "आम के आम गुठलियों के दाम "
                                       उक़ाबि रूह जब बेदार होती है जवानों में 
                                       नज़र आती है उनको अपनी मंज़िल आसमानो में 

   
                                           
          L To R Ammar sayyed ,Ragib Ahmed, Shagufta, Mrs. Rehaana Irfan sayed ,Irfan Sayed


 

सोमवार, 23 दिसंबर 2024

Akbar Qadri

                                                                अकबर क़ादरी  

             


                      Akbar Qadri ke sath

कोई बतलादे के एक उम्र का बिछड़ा मेहबूब 

                                     इत्तेफ़ाक़न कही मिल जाये तो क्या कहते हैं 

    १५ डिसेम्बर २०२४ इत्तेफ़ाक़न फरहान से मुलाक़ात करने रांदेर (सूरत ) जाना हुवाऔर वहां ,२ दिन रुकना भी  हुवा, तो कई पुराने रिश्तों को झाड़ पोंछ कर नयाँ पन अता हुवा। सग़ीर जनाब ,मुसरत और अज़्ज़हरुद्दीब से मुलाक़ातें हुयी। अकबर क़ादरी से अरसे बाद, उनके घर मुलाक़ात हुयी। बात चीत में वही बर्जस्तगी देखी ,सेहत भी माशाअल्लाह। मुलाक़ात से  पहले मैं ने उसे फ़ोन पर कांटेक्ट किया "कब आया राग़िब और घर कब आ रहे हो। अभी आजा हम दोनों मियां  बीवीअकेले हैं साथ खाना खायेंगे " उसी वक़्त अपने मक़ान का location गूगल पर शेयर कर दिया ७०३ ,मालाबार रेजीडेंसी । इसके इस खुलूस ने मुझे बहुत मुत्तासिर किया। 

  १०३० बजे सुबह  मैं और शगुफ्ताअकबर के  घर पहुंचे यास्मीन भाभी और अकबर ने हम दोनों को खुश आमदीद कहा नाश्ता पेश किया। बातों बातों में यादों का पिटारा खुला माज़ी (past ) और हाल (present ) के दरमियान की ऊँची दीवारें ढह गयी। और २ घंटे हम लोग पुरानी यादों से शराबोर होते रहे । 

                                      क्या लोग थे रहे वफ़ा से गुज़र गए 

                                      दिल चाहता है नक़्शे क़दम चूमते चले 

     Dr. क़ादरी  अकबर क़ादरी के वालिद की यादें ताज़ा होगयी।  उनका तकिअए क़लाम "hurry up slowly " हुवा करता था। अल्लाह उन्हें जन्नत के ऊँचे दर्जे इनायत करे बड़ी ज़िंदा दिल , खुश गवार शख्सियत के इंसान थे। छोटे छोटे जोक्स सुना कर महफ़िल को गुलो गुलज़ार कर देते थे। मुझे उनका एक लतीफा आज तक याद  है। एक अँगरेज़ किसी मुक़ाम से गुज़र रहा था। देखा एक इंडियन आदमी लकड़ियां काटने में मसरूफ था ,लकड़ियों ढेर लगा था। अँगरेज़ ने हिंदुस्तानी आदमी से सवाल किया "what is this place name " हिंदुस्तानी समझा लकड़ियों के बारे में सवाल कर रहा है। उसने जवाब दिया "कल काटा " अँगरेज़ ने कहा " ok this place name is culcatta " इस तरह कलकट्टा का नाम पड़ा। 

   लम्बी उम्र की दूआ देने वाले दुनिया से ग़ायब होते जा रहे हैं। अकबर की अम्मा भी हमेशा मुझे छोटी छोटी बातों पर दुवायें  दिया करती थी , उनोहने  कभी भी मुझे सही नाम से नहीं पुकारा। कभी कभी राकेट तो कभी राजेश कह कर बुलाती लेकिन थी मामता की मूरत। अल्लाह उनेह अपने जवारे रहमत में जगह अता करे आमीन। 

                                          आयी किसी की याद तो आंसु निकल पड़े 

                                           आंसु किसी की याद के कितने क़रीब थे 

अकबर ने मॉमू मिया अफ्ज़लोद्दीन उर्फ़ लाला मियां की यादें ताज़ा कर दी। किस तरह अकबर को साथ  अहमदाबाद ले जा कर उसे गुजरात हुकूमत से फिशरीज ऑफिसर का appointment letter दिलवाया था। सग़ीर जनाब को भी टीचर पोस्ट का appointment letter  उन्होंने ही दिलवाया था। अकबर इतने साल बाद भी अपने मोहसिन को नहीं भूल पाया। न जाने कितने क़ौम के नौजवानो की मुस्तक़बिल की राह मामू मियां ने आसान की होंगी। हम चारों भाइयों पर भी उनकी नज़रे इनायत थी। उनके अहसानों को हम किसी क़ीमत पर भी भूल नहीं सकते। अल्लाह मामू मियां को जन्नत फिरदौस में आला मक़ाम आता करे आमीन। 

                                                तुम याद आये साथ तुम्हारे 

                                                गुज़रे ज़माने याद आये 

      शफ़ीक़ ,रहम दिल ,हम सब के राहबर मरहूम हाजी सादिक़ अहमद के ज़िक्रे खैर के बग़ैर यादों का  सिलसिला  मुक़्क़मिल नहीं हो सकता। वो हम सब के ideal थे। उनकी बातों उनकी यादों का लमुतनाही सिलसिला था हम सब शराबोर होते रहे। यक़ीनन वो जन्नती है। सदियों में ऐसी शख्सियत पैदा होती हैं और अपने पीछे एक पूरी जनरेशन की ज़हनी तरबियत कर जाते हैं। उनकी जुदाई पर किसी शायर का ये शेर याद आगया 

                                                     अजीब दर्द का रिश्ता था सब के सब रोये 

                                                      शजर गिरा तो परिंदे तमाम शब् रोये 

    dr लियाक़त ,dr वासिफ , अफ़सान ,भाभी ज़ुबेदा ,शम्सु आप ,अहमदुल्ला ,लुबना ,समीरा ,नाएला ,उज़्मा गोरे मामू माज़ी की किताब के पन्ने उलटते रहे। आखिर में अहमद मिल के  यूनियन लीडर ,जावेद अहमद की याद  अकबर ने की, में ने फ़ोन लगा कर अकबर से जावेद की बात भी करा दी।  अतीत से आज की चकाचौंद दुनिया की तरफ लौटना भी एक तकलीफ दे अमल था। 

     अकबर के साथ बीताये दो घंटे दो पल की तरह लगे। 

      अकबर MSc मुक़ामिल करने के बाद गुजरात government में Fisheries officer की gatzzeted पोस्ट से रिटायर हुवा।  अब भी अपनी मालूमात से लोगों को फ़ैज़याब कर रहा है। consultant की services दे कर हफ्ते में ३ दिन अपने आप को मसरूफ रखता है। बेटा साहिल क़ादरी अपनी अहलिया के साथ उलवा नवी मुंबई में मुक़ीम है। अकबर ने कोंकण अपने आबाई गांव धापोली में खूबसूरत बांग्ला तामीर किया है। साल में ३ महीने हापुस आमों के सीज़न में अपने सेकंड होम में गुज़रता है कुछ अरसा मिया बीवी साहिल एंड फॅमिली के साथ भी  खुशगवार वक़्त गुज़रते हैं। 

     अकबर ,यास्मीन भाभी हम दोनों को छोड़ने की लिए सोसाइटी गेट तक आये। हम सब बीती यादों में डूब कर जज़्बाती हो गए थे। वक़्त जुदाई किसी उर्दू शायर का ये कतआ मेरे ज़हन में गूंजने लगा। 

                          वक़्त खुश खुश काटने का मश्वरा देते हुए 

                          रो पड़ा वो आप मुझ को हौसला देते हुए 

                           जब तलक नज़र आता रहा तकता रहा 

                          भीगीं आँखों उखड़े लफ़्ज़ों से दूआ देते हुए 

 जैसे जैसे हमारी उमर में साल जुड़ते जा रहे हैं क़रीबी ताल्लुक़ात रखने वाले लोग काम होते जा रहे हैं , अकबर क़ादरी जैसे मुख्लिस लोगों की क़द्र हमारे दिल में बढ़ती जा रही है। अल्लाह सेहत तंदुरुस्ती के साथ अकबर क़ादरी भाभी यास्मीन  का साथ क़ायम रखे उनकी उमर दराज़ करे आमीन।