शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

हाजी( स्वतंत्र सेनानी )क़मरुद्दीन मुंशी


मरहूम हाजी क़मरुद्दीन मुंशी 

मरहूम हाजी क़मरुद्दीन अवार्ड लेते हुवे 

हज को जाते  हाजी क़मरुद्दीन मुंशी और हज्जन अहलिया रज़िया बेगम 


मरहूम क़मरुद्दीन अपने पोते पोती नवासे नवासी के दरमियान 

सुहिला ,मरहूमा रज़िया बेगम,तारिक़ ,मरहूम क़मरुद्दीन मुंशी ,समीना 

हाजी क़मरुद्दीन मुंशी -पैदाइश :1st May 1921 (यावल ) तारीखे वफ़ात :24th July 2007 (नवापुर )

आने वाली नस्लें तुम पर फख्र करेंगी हम असरो 
जब भी उन को ध्यान आयेगा हम ने मुंशी को देखा था 
आज जिस शख्स का ज़िक़रे खैर हो रहा है मैं ने उनेह जिंदगी में उनेह देखा हूँ ,उनसे बातें की हैं ,उनके साथ खाने में शरीक हुवा हूँ। में बे हद खुश नसीब हूँ मेरे शगुफ्ता के साथ निकाह में उनोहने वकील बन कर निक़ाह नामे  पर  दस्तखत किये है। मेरी मुराद अल्हाज Freedom Fighter क़मरुद्दीन मुंशी  से है। 
खुदा बख्शे बहुत सी खूबियां थी मरने वाले में 
मरहूम हाजी कमरुद्दीन मुंशी ने आज से सव (100 ) साल पहले यावल में आज ही के दिन (1st May 1921 ) मोजोद्दिन के घर जनम लिया। वालिद मारूफ शख्सियत थे पेशे से इंजीनियर थे। औलाद की तालीम पर खुसूसी तवज्जे दी। मुझे यक़ीन है  अपने बड़े भाई मरहूम वजीहोद्दीन की तरह ,मरहूम क़मरुद्दीन ने  भी यावल की मशहूर convent school Sim Cox English school से ही स्कूलिंग किया होंगा। 
अक़ाबि रूह जब पैदा होती है नौजवानो में 
नज़र आती है मंज़िल उनको अपनी आसमानो में 
इस्माइल युसूफ कॉलेज जोगेशवरी से मरहूम ने graduation किया। खेलने का शौक़ था अपनी लम्बे क़द का भरपूर फायदा उठाया । कॉलेज के ज़माने  में बेहतरीन वॉलीबॉल और हॉकी के खिलाडी होने का शरफ़ मरहूम क़मरुद्दीन मुंशी को हासिल था। यूनिवर्सिटी मुक़ाबलों में कॉलेज को represent किया। गन शूटिंग में मरहूम को महारत हासिल थी। एक हाथ से भी निशाना बाज़ी का फ़न मरहूम जानते थे। 
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है 
आज़ादी की लड़ाई अपने उरूज पर थी। गर्म खून ,उमंगें जवान थी ,मरहूम क़मरुद्दीन मुंशी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फ़ौज (INA ) में शामिल हुवे। मधु लिमये ,जॉर्ज फर्नांडिस से दोस्ताना ताल्लुक़ात रहे। ज़िन्दगी अपने उसूलों पर खुद्दारी से जी ,कभी न freedom fighter की पेंशन हासिल  करने के लिए कोशिश की न अपने पुराने ताल्लुक़ात का फायदा उठाया। सिर्फ अपने मकान (646 ,साहकार नगर ,चेम्बूर ) के बाहेर अपनी name plate पर अपने नाम के साथ स्वतंत्रता सेनानी लिखवाया था। शायद वो अब्दुल कलाम आज़ाद के इस क़ौल पर यक़ीन रखते थे के  (Character  will give you respect )
मेरे जूनू का नतीजा ज़रूर निकलेगा 
मरहूम क़मरुद्दीन मुंशी ने १९४५ में Prohibition and Excise Department में Thane  शहर  से जमादार की पोस्ट से शुरुवात की। जलगांव ,कल्याण ,कोल्हपुर महाराष्ट्र में पोस्टिंग मिली। अपनी काबिलियत पर उनेह पूरा यक़ीन था ,यहाँ तक के महाराष्ट्र के चीफ मिनिस्टर वसंत दादा पाटिल ,अपने बंगले वर्षा पर उनेह बुलाया करते ,उनसे मश्वरा करते । रिटायरमेंट के बाद department ने उनकी मालूमात का फायदा उठाया। अपनी मेहनत ,लगन और ईमानदारी से  १९७९ में Senior Inspector के rank तक पहुंचने के बाद मरहूम ने retirement ली और चेम्बूर के मकान में रिहाइश इख़्तियार की।  खुश नसीब रहे १९८६  में अल्लाह के मेहमान बने ,अपनी बेगम के साथ हज का सफर किया। 
A  mirror reflect man`s face but what he is really like, is shown by the kind of friends he choose . 
मरहूम यार बाश थे फिल्म स्टार रेहमान ,प्राण से क़रीबी ताल्लुक़ात थे और मीना कुमारी से भी जान पहचान थी।फिल्म स्टार रेहमान से उनकी गाडी छनती थी।  मरहूम शतरंज के माहिर खिलाडी थे ,रेहमान को भी शतरंज  का शौक़ था  दोनों रेहमान के घर शतरंज की बाज़ी जमाते ,फिर रेहमान उनेह  खुद अपनी निजी कार में चेम्बूर के घर तक छोड़ जाते।  हिंदुस्तानी क्रिकेट टीम के कप्तान अजित वाडेकर से उनका याराना था ,अजित वाडेकर ने उनेह ब्रीफ केस तोहफे में पेश की थी खूबसूरत यादगार के तौर पर ख़ज़ाने की तरह मरहूम ने कई साल संभाल से कर रखा था। 
कहाँ बच कर चली ऐ फसले गुल मुझ अबला प् से 
मेरे पैरो की गुलकारी बियाबान से चमन तक है 
कुछ हस्तियां ज़माना साज़ होती है वक़्त से पहले पैदा होजाती है ,अपना क़द इतना बढ़ा लेती है उन के सामने हर कोई अपने आप को बोना महसूस करने लगता है। मरहूम हाजी क़मरुद्दीन मुंशी उनमे से एक थे। सोने पे सुहागा उनेह शरीक हयात रज़िया बेगम भी उनिह की हम ख्याल थी। दोनों में बहुत मोहब्बत थी। मेहमानो से हमेशा घर भरा होता ,मुहतरमा के माथे पर शिकन नहीं आती। खुलूस से खिदमत में लगी रहती। मरहूम  ने बहुत से करीबी रिश्तेदारों को रोज़गार दिलवाया , अपने छोटे भाई हसिनोददीन मुंशी को ग्रेजुएशन के बाद मफ़तलाल कंपनी में जॉब दिलवाया था। ज़ैनुद्दीन सय्यद ने उनके घर रहकर मेट्रिक पास किया था। ऐसी कई  और मिसाले हैं। 
मरहूम ज़बान के बड़े पक्के वाक़े हुवे थे अपनी बड़ी बहन खुर्शीद जिसने शादी के बाद पाकिस्तानी शहरियत हासिल कर ली थी उनसे माँ की तरह मोहब्बत थी ,उनसे वादा किया था के उनसे मिलने पाकिस्तान ज़रूर आएंगे। रिटायरमेंट के फ़ौरन बाद अपनी अहिलिया के साथ पाकिस्तान का सफर किया बहन से मुलाक़ात की अपना वादा निभाया। 
मरहूम कमरुद्दीन मुंशी साहब को मुसलमानो में तालीम की कमी का शिद्दत से अहसास था।  मूसलीम  लड़कियों की तालीम और तर्रकी की वो दिल से कायल थे। उनकी दिली ख्वाहिश थी के उनके ख़ानदान के बच्चे  पढ़े और बे इन्तहा तर्रकी हासिल करे। अपनी पोती सीमा से उनेह बहुत उम्मीदें वाबिस्ता थी , और उसने भी उनेह मायूस नहीं किया। होम साइंस में ग्रेजुएशन किया  साथ साथ ,इंटीरियर डेकोरेशन भी किया। 
कभी किसी ने रंग व बू को पकड़ा है 
शफ़क़ को क़ैद में रखा हवा को बंद किया 
अपनी अम्मी के इंतेक़ाल के वक़्त मैं  ९ साल का था। माँ की कमी जिन हस्तियों ने पूरी की मुझ पर ममता को नौछाव्र किया अदीबुन्निसा ,सरीफुन्निसा (बहने ) , आसिया बेगम (मुमानी), रज़िया बेगम ( ख़ाला )और टेना (ख़ाला ) बतौर ख़ास रही हैं। इन लोगों की मुहबतें ,इनायतें ,करम कभी नहीं भूल सकता। 
१९७१ में जलगाव् से मीट्रिक करने के बाद महतरम सादिक़ भाई ने मुझे मुंबई बुलवा कर सोमैया कॉलेज में साइंस में दाख़िल करवा कर ,सब से पहले पहले मरहूम अल्हाज क़मरुद्दीन मुंशी के घर ले गए। कुछ वाक़ेआत ज़हन पर नक़्श होजाते हैं  ,भुलाना चाहे तो भी भूल नहीं सकता। मक़ान के बाहेर सुहिला और समीना छोटी साइकिल पर खेल रही थी (अब दोनों पोतो ,पोतिया ,नवासे नवासी वाली होगयी है )। इस घर से ऐसी निस्बत हुवी दो छोटी बहने मिली ,सज्जाद तारिक़ और ज़ाकिरा भाभी जैसी दो बामुर्रवत बाअख़लाक़ शख्सियतों से तार्रुफ़ हुवा ,रज़िया ख़ाला क़मरुद्दीन मुंशी जैसी बावक़ार शख्सियतों का प्यार मिला। ये घर मेरे और सादिक़ भाई के लिए नखलिस्तान (Oasis ) की हैसियत रखता था। जब भी जली रोटियों ,अध् पकी सब्ज़ियों के खाने से तंग आजाते, उनके घर पहुँच जाते। ईद ,मुहर्रम ,नियाज़ में उनके घर  दावत होती। ये मामला मेरे सादिक़ भाई के साथ ही नहीं था बल्कि हर किसी के साथ था । पहले में रज़िया खाला का भांजा हुवा करता था ,शगुफ्ता से शादी के बाद मुझे दुहरा शरफ़ हासिल हुवा ,में उनका दामाद भी बन गया। 
अजीब इत्तेफ़ाक़ था के सादिक़ भाई के इंतेक़ाल की खबर में तारिक़ भाईजान तक न पहुंचा सका कुछ रोज़ बाद उनेह खबर मिली।  भाईजान मिले गले लगाया ,मिज़ाज पुरसी की एक जुमला जिस में  न शिकायत थी न सरज़निश  "रागिब दादाभाई के इंतेक़ाल पर तुम मुझे कैसे भूल सकते हो  " ये होते है आला खानदान वालों के अख़लाक़। तारिक़ भाईजान ने नेरुल ही  में घर खरीद कर रिहाइश इख़्तियार कर ली है। नेरुल जुमा मस्जिद में  उनसे और खालिद से मुलाक़ातें होती रहती है। शफ़क़त से पूछते हैं "कैसे हो " अल्लाह उनेह हमारे सर पर सलामत रखे आमीन।
लोग अच्छे हैं बहुत दिल में उतर जाते हैं 
एक बुराई है तो बस ये है के मर जाते हैं 
मरहूम अल्हाज क़मरुद्दीन मुंशी की Planning का में हमेशा क़ायल रहा हूँ। Second home  का जिस वक़्त concept भी नहीं था मरहूम ने नवापुर ताई वाडा मोहल्ले में पुर सुकून माहौल में खूबसूरत बांग्ला नुमा घर खरीदा था। घर से १ किलोमीटर दुरी पर फार्म हाउस था जहाँ  AWIS Poultry Farm भी बनाया था। अपनी अहलिया रज़िया बेगम के इंतेक़ाल के चंद सालों बाद इसी पुऱ सुकूं माहौल में 24th July 2007 को आखरी सांस ली नवापुर के बड़े क़ब्रस्तान में अपनी अहलिया रज़िया बेगम और क़रीबी रिश्तेदारों के बीच आराम फरमा हैं। अल्लाह मरहूम को अपनी जवारे रहमत में आफ़ियत के साथ जगह अता फरमाए आमीन सुम्मा आमीन।  




सोमवार, 12 अप्रैल 2021

खुशबु जैसे लोग मिले

हसीनोद्दिन मुंशी अपनी जवानी में 
हसीनोद्दिन मुंशी की हालिया तस्वीर 


अपनी अहलिया शाहिना बेगम के साथ 

हसीनोद्दिन मुंशी की शादी का दावत नामा 

हसीनोद्दिन मोज़ोद्दिन मुंशी 

तारीखे पैदाइश :२७/१२/१९३० , मुक़ाम :मोहल्ला कसार चौड़ी (यावल )
मुझे हमेश से लोगों की Biography (life history ) पढ़ने में दिचस्पी रही है। मोहम्मद रसूल अल्लाह की सवाने हयात "दुर्रे यतीम " पढ़ कर कई दिन तक रोता रहा था। विंग्स ऑफ़  फायर डॉ अब्दुल कलाम  आज़ाद की कहानी भी दिलचस्पी से कम नहीं। तुज़के बाबरी ,हुमायूँ अकबर की ज़िंदगिया भी हैरत अंगेज़ क़िस्सों से भरी है।  हर इंसान की ज़िन्दगी से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है। कुछ साहबान की ज़िन्दगी हैरत अंगेज़ होती है। 
You don't grow old . You get old by not growing " (Deepak Chopra) 
मौत क्या है थकन ख्यालों की 
ज़िन्दगी क्या है दम ब दम चलना 
जनाब हसीन मुंशी ज़िन्दगी की ९० बहारें ,खिज़ायें और बरससातें देख  चुके हैं। दूसरी world war ,आज़ादी की जद्दो जहद ,चीन हिंदुस्तान की जंग ,पाकिस्तान से दो wars और अब इस उमर में करोना  का क़हर अपनी खुली आँखों से देख रहे हैं। इंसान  वोही  है जो न माज़ी की तल्ख़ीयों को याद रखे ,न मुस्तक़बिल के अंदेशों से खौफज़दा (भयभीत ) हो। कामयाब ज़िन्दगी वही जी सकता है जो हाल (present )में जीता हो। 
 मोहतरम हसीन मुंशी साहब एक मिसाल है।  ९० साला उमर में तहज्जुद भी मस्जिद  में अदा करते है ,पंज वक़्ता नमाज़े भी बाकायदगी से बाजमाअत मस्जिद में अदा होती है। अपने आप को अपडेट रखने के लिए अंग्रेजी अख़बार पढ़ते है। स्मार्ट फ़ोन   को भी मौसूफ़ चाबुक दस्ती से use कर सकते है। उनकी मुसबित (positive ) सोच है जो ज़िन्दगी से हार न मानने में मददगार साबित हो  रही है। 
वालिद मोजोद्दिन पेशे से इंजीनियर थे ,सुना है जर्मनी भी अपने काम के सिलसिले में जाना  हुवा था। शायद वालिद से बहुत सी खूबिया इन्हे वर्से में मिली है। 
 Confidence and hard work is the best medicine to kill the disease called failure .It will make us a successful person (APJ Abdul Kalaam )
 हसीन मुंशी  साहेब ने ज़िन्दगी में जो भी किया  confidence आन ,बान शान से किया और उसे तकमील तक पुह्चाया । उनकी हर बात में  एक रख रखाव,सलीका ,आला मेयार  दिखाई देता है। आज़ादी से पहले यावल की SIMCOCK convent school से तालीम का सिलसिला शुरू किया था । मेट्रिक के बाद जोगेश्वरी के मशहूर इस्माइल युसूफ कॉलेज से हॉस्टल में रह कर B.A  की डिग्री मुंबई यूनिवर्सिटी से हासिल की । आज भी उनेह अपने कॉलेज के प्रिंसिपल बनेर्जी साहब का नाम याद है। उर्दू टीचर नक़वी ,अरबी टीचर नदवी साहब।  कॉलेज Volleyball  टीम के कप्तान थे ,यूनिवर्सिटी तक अपनी कॉलेज  की Volleyball टीम की नुमायन्दगी की। ख़ूबरू तो थे ही ,तवील कद (Tall ), सफ़ेद रंग ,बाल बनाने के अपना अंदाज़ था। मुझे लगता है देव आनंद ने मुंशी साहब की हेयर स्टाइल फिल्मो में अपनायी थी। 
कोशिश भी कर ,उम्मीद भी रख ,रास्ता भी चुन 
फिर उसके बाद थोड़ा मुक़्क़दर तलाश कर 
 १९५४ /१९५५  में B.A  की तालीम पूरी करने के बाद।,मौसूफ़ हसीन मुंशी साहब ने अपनी काबिलियत की बिना पर १९५६ में मशहूर कंपनी मफतलाल  इंजीनियरिंग  में Quality  control  department में  ज्वाइन किया , और १९८६/१९८७  तक इसी कंपनी से जुड़े रहे । १९५७ में शाहिना बेगम  ( एस. नूरबेगम )से शादी  हुवी ,इस का सुबूत उनकी  शादी का कार्ड भी शामिल है। मौसूफ़ ने अपनी लड़कियों  ज़रीना ,तहमीना ,सबीना,  रुबीना और फेहमीना को अच्छी तालीम दिलवाई ,मारूफ घरानो में शादी करवाई। अपने फ़रज़न्द इरफ़ान आलम को गुलबर्गा कॉलेज से फार्मेसी की तालीम दिलवाई ,मेडिकल स्टोर कारोबार  शुरू करवा के कई सालों तक उसके साथ शरीक रहे। अल्लाह ने उनेह अपनी अहलिया के साथ हज की सआदत भी नसीब की। 
जहाँ रहे वो खैरियत के साथ रहे 
उठाये हाथ तो एक दुआ याद आयी 
 




गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

शकील अहमद ज़ियावद्दिन सैय्यद

मरहूम शकील अहमद सैय्यद 
मरहूम शकील एक प्रोग्राम में 

क्या लोग थे जो रहे वफ़ा से गुज़र गए 
दिल चाहता है नक़्शे क़दम चूमते चले 

मरहूम शकील अहमद तारीखे पैदाइश :22nd Feb 1960 वफ़ात :27 March 2021 (13 शाबान 1442 ) नवापुर के शहरे ख़मोशा (बड़े कबरस्तान ) में नया इज़ाफ़ा हुवा  ,शकील अहमद भी हम सब को छोड़ कर अपने चाचाओं ,बड़े अब्बा बड़ी अम्मी  और अपने अब्बा ,अम्मी के दरमियाँ पहुँच गए।

 तुम्हारे चले जाने से एक ख़ला (vacuum )  होगया है  जिस का अज़ाला भरपाई नामुमकिन है।  

निक़हत  के से साथ ३५ साला लम्बा अरसा गुज़ार कर तुम उसे तन्हा छोड़ गए   ,फैज़ान की खुशिया चली गयी ,नवासे पोतो के सर से शफ़क़त उठ गयी ,सादिया व  नौशीन ने अज़ीज़ वालिद खोया ,नाहिद ,नाज़ेरा ,ज़ाकिर ,ज़की ,शफ़ीक़ ने अपने हरदिलअजीज भाई शकील दादा की क़ुरबते रफ़ाक़ते खोयी। ईमान वाले को रज़ाए इलाही के सामने तस्लीम ख़म करना वाजिब है। हम अल्लाह की तरफ से आये हैं उसी की  तरफ़ लौटने वाले हैं। अगर जन्नत मिल जाये तो ये  सब से बड़ी कामयाबी है।  अजीब इत्तेफ़ाक़ मग़रिब की अज़ान के वक़्त  मरहूम शकील अहमद की रूह क़ज़ा हुवी। गवाहों ने शहादत दी है जिस वेहिकल से उनेह हॉस्पिटल पुह्चाया जा रहा था मरहूम की ज़बान पर तीनो इब्तेदाई कलमों का विरद  ज़ोर शोर से जारी था। हॉस्पिटल पहुंचने पर डॉक्टर को सलाम किया ,वहां बैठे मरीज़ों की खैरियत पूँछी ,बाद में अपने अपनी जेबे तलाशने लगे। किसी  ने पूछा क्या तलाश कर रहे हो कहा" तस्बीह"। फिर किसी साथी ने लकड़ी की तस्बीह हदिया की तो मरहूम मसरूर हुवे , तब्बसुम के साथ दुआ दी।पहली निशानी  मरहूम शकील की जन्नती/शहीद  होने की हमेशा ज़बान अल्लाह की  याद से भीगी रहती है। माशाल्लाह मरहूम आखरी वक़्त तक अल्लाह के ज़िक्र में मसरूफ रहे ,मुस्कुराते रूह कब्ज़ हुवी। 

जान दी,दी हुवी उसी की थी 

हक़ तो ये है के हक़ अदा न हुवा 

मरहूम शकील ने  सौरूप सिंह नायक कॉलेज नवापुर से B.A तक तालीम हासिल की थी ,मगर पेशा अपनाया  (नबी S.A.S का  )  यानि कारोबार (business )  , मरहूम ने अपने  वालिद  ज़ियावोद्दीन के ज़ेरे साया झामंजर ,भड़भूँजा में ईमानदारी,लगन और मेहनत  से दुकानदारी सीखी । फिर  अपने हौसले और हिम्मत से नवापुर के सुनसान /बंजर इलाक़े ,देवल फली में अपना कारोबार शुरू किया। अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त का वादा है ईमानदार ताजिर का अंजाम औलियाओ नेक नामो के साथ होगा। मरहूम ने ज़िन्दगी भर ईमानदारी से तिजारत की ,घर भी मस्जिद के करीब बनाया। 

जन्नती होने की दूसरी निशानी। 

हमने हर गाम पे सजदों के जलाये हैं चराग़ 

अब तेरी राह गुज़र राह गुज़र लगती है 

इस्लामपुरा की मस्जिद में मरहूम शकील अहमद नमाज़ अदा करते थे। अज़ान होते ही मरहूम घर से वज़ू कर के दुकान अल्लाह के हवाले कर मस्जिद रवाना होजाते ,इस्लामपुरा मस्जिद का हर गोशा (कोना ) हश्र में मरहूम के सजदों की इंशाल्लाह गवाही देंगा। अल्लाह रअबुलइज़्ज़त का वादा है ,एक नमाज़ के बाद दूसरी नमाज़ के इंतज़ार में रहने वाले मोमिन को क़यामत में अर्शे के साये में पनाह मिलेंगी। 

मरहूम शकील अहमद की खुश मिज़ाजी की गवाही तमाम नवापुर शहर देता है। चेहरे पर हमेशा मुस्कराहट सजी होती। मुस्कराहट भी इस्लाम  में सदक़ा होती है ,बहुत कम लोगों को ये खुश नसीबी  हासिल होती है। मरहूम क्रिकेट  के शौक़ीन थे ,मैंने उनेह खेलते देखा हूँ। 

 मरहूम ने दोनों बेटियों की शादी मारूफ घराने में कराई। अपने फ़रज़न्द फैज़ान की भी शादी करवाई, कारोबार की ABACD सिखाई किसे पता था इतनी जल्द उस मासूम के कन्धों पर ये ज़िम्मेदारी मुन्तक़िल होजाएंगी। 

उदास छोड़ गया वो हर एक मौसम को 

गुलाब खिलते थे कल जिस के मुस्कुराने से 

मौत बरहक़ है "आज वो कल हमारी बारी है " नवापुर में रिश्तेदारों के बच्चों के  तक़सीम इनामात के प्रोग्राम में उनसे आखरी मुलाक़ात हुवी थी। बहुत नसीहत अमेज़ तक़रीर की थी। इनामात उनके हाथों से तक़सीम किये जाने पर ख़ुशी का इज़हार भी किया था। 

यु तो हर एक को जाना है इस ज़माने से 

मौत तो वो है जिस पे ज़माना करे अफ़सोस 

अल्लाह मरहूम शकील अहमद की मग़फ़िरत करे ,जन्नत में आला मुक़ाम आता करे ,घर के तमाम अफ़राद को सब्र जमील आता करे ,आमीन सुम्मा 


 

 


बुधवार, 24 मार्च 2021

khushbu jaise log mile

खुशबू जैसे लोग मिले 

अल्हाज सय्यद मखदूम अली 


तारीखे पैदाइश : ३० मई १९५४
मखदूम अली ने रमजान अली के घर जन्म लिया था।  लेकिन  उनकी परवरिश उनके मामू जनाब मुरकोबोद्दीन शैख़ के घर जलगाओं में हुयी। 
"If you are born poor, it is not your mistake ,but if you die poor ,its your fault " ( Bill Gates )
जनाब मखदूम अली पर ये कहावत  १०० % सुच साबित होती  है। 
अल्हाज मखदूम अली ने १९६७ में फाइनल का इम्तेहान जिल्ला परिषद् स्कूल नंबर १० जलगांव  से पास किया । उनकी  स्कूल में चरखा कातना  सिखाया  जाता था। चरखा चलाना मुश्किल होता है। यही से मुश्किलात का सामना करने  की आदत हो गयी। 
एंग्लो उर्दू स्कूल जलगाँव से मेट्रिक का इम्तेहान १९७१ में फर्स्ट डिवीज़न में पास किया। जलगांव में अपने मामू  मुराकोबोद्दिन के साथ रहा करते थे ,जो पेशे से auditor हुवा करते।  बचपन में  अम्मी का इंतेक़ाल हो गया था , मुमानी( मुबा )की शफ़्क़तें साथ थी ,दोनों ( मामू  और मुमानी ) ने ,कभी भी माँ बाप की कमी महसूस नहीं होने दी। नाना रियासुद्दीन मशहूर हक़ीम नसीराबाद से मेडिकल अफसर की पोस्ट से रिटायर हुवे थे मखदूम साहब की  ज़हनी तरबियत में , आपने अहम् रोले अदा किया। मेट्रिक में "सेकंड लैंग्वेज सभी साथियों ने पर्शियन ली थी। जनाब  मखदूम  साहेब ने ,दूर अंदेशी दिखाई , रियासती ज़बान मराठी को फौकियत दी। शायद मरहूम इस्माइल सर और मामू मुराकोबद्दीन  ने इस तरफ तवज्जो /रग़बत दिलाई हो। उसी ज़माने से मखदूम अली को मराठी पर उबूर हासिल था जो आज भी है ,और शायद MPSC एग्जाम पास करने में मराठी जानने पर सहूलत भी हुयी।  आज भी क़ौम के बच्चों को मराठी लैंग्वेज की अहमियत का एहसास  दिलाने ,मराठी को आसान बना कर सीखाने ,समझाने का बेडा उठा रखा है ,रिटायरमेंट के बाद भी  दिलों जान से  मौसूफ़ मसरूफ़ है। 
एम्. जे कॉलेज जलगांव से B.COM  करने के बाद पाचोरा में Teaching  की साथ साथ M. COM का 
exam भी पास किया। 
 मेरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा 
ग्रेजुएशन के बाद कुछ अरसा टीचिंग का पेशा इख़्तियार किया। 
MPSC का exam बग़ैर किसी guidance के  पास  करना जुवे शीर निकलने से कम  नहीं मौसूफ़ ने वो  भी कर दिखाया। फिर  महाराष्ट्र गवर्नमेंट से Accounts Officer के ओहदे तक तररकी पा कर जनाब मखदूम अली  रिटायर हुवे। 
हम अपने पैरों में न जाने कितने भॅवर लपेटे हुवे पड़े हैं 
रिटायरमेंट के  बाद लोग चैन की बांसुरी बचाते है।  मखदूम अली साहब ने मुंबई  यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म में डिप्लोमा  किया जो उनका  देरीना ख़्वाब  था। 
मौत क्या है थकन ख्यालों की 
ज़िन्दगी क्या है दम ब दम चलना 
रिश्तेदारी में बच्चों की तालीम की  ग़र्ज़ से इक़रा खानदेश ट्रस्ट की बुनियाद डाली गयी,मखदूम अली को उनकी अहलियत देखते हुए treasurer का ओहदा दिया गया । आप ,आप के फ़रज़न्द इमरान, भाभी यास्मीन ,बहु रुखसार  भी ट्रस्ट के कामों में जान व तन से लगे हैं। अल्लाह जज़ाए खैर आता करे। 
अतनी मसरूफियत के आलावा,आप अपनी हाउसिंग सोसाइटी के सेक्रेटरी भी है। 
कोई बतलादे के एक उम्र का बिछड़ा मेहबूब 
इत्तेफ़ाक़न कही मिल जाये तो क्या कहते हैं ?
१९७१ साल में मीट्रिक का इम्तेहान पास  करने वाली बैच का reunion एंग्लो उर्दू स्कूल जलगांव में २५ दिसंबर २०२१ को जनाब मखदूम अली साहेब की काविशों का नतीजा था । ५० साल  पुराने साथियों को मिलाने का सेहरा उनिहि को जाता है। 
४ सितम्बर २०२२ को जलगांव में  prize distribution Program  जो इक़रा खानदेश फाउंडेशन की जानिब से organize किया गया है ,हाजी मखदूम अली साहब की सदारत में होने जा रहा है। 
अल्लाह ने  फ़रमा बरदार औलाद से नवाज़ा हैं। सीमा बेटी MBA है , बेटा इमरान इंजीनियर है। दोनों आला ओहदों पर फ़ाइज़ हैं। भाभी यास्मीन स्कूल की मुलाज़मत से सुबाकदोष होगयी है। 
 मखदूम अली खानदानी सैयद थे ही ,अल्लाह ने हज की सआदत नसीब करदी ,रुतबा और बुलुंद होगया। 

अल्लाह तमाम खानदाने मखदूम अली पर अपनी  इनायत रखे आमीन सुम्मा आमीन। 


बशीर सैयद  ,रागिब अहमद ,मखदूम अली (धुले तक़सीम इनामात प्रोग्राम )

रविवार, 21 मार्च 2021

रज़ीउद्दीन (खालू जान )


                                       मरहूम अल्हाज रज़ीउद्दीन और अहलिया अकीला बी 

 
L to R मरहूम ग़ुलाम मोहियुद्दीन ,मरहूम अल्हाज रज़ीउद्दीन , जनाब साबिर अली ,मरहूम सईद अहमद ,Adv नियाज़ 
                                                            एक शख्स सारे शहर को वीरान कर गया 
६ दिसंबर २०१३ को  सुबह होलनाक खबर से दोचार हुवा अल्हाज रज़ीउद्दीन इंतेक़ाल कर गए । १३ दिसंबर २०१३ को अल्हाज सादिक़ अहमद इस दुनिया से रुखसत हुवे। २०१४ में अल्हाज सईद अहमद का इन्तेक़ाल  हुवा। अजीब इत्तेफ़ाक़ था तीनो एक दूसरे के बहुत करीब हुवा करते थे। मेरी ज़िन्दगी में इन क़रीबी बुज़र्गों के एक साथ रुखसत होने से एक ख़ला होगया 
                                                    मंज़िल की हो तलाश तो दामन जुनू का थाम 
मरहूम रज़ीउद्दीन रिश्ते में मेरे सगे खालू  थे ,लेकिन में ने कभी बुज़र्ग नहीं समझा। १९७१ में हम दोनों ने एक साथ मेट्रिक का एग्जाम पास किया था। हम दोनों की उम्र में काफी फ़र्क़ था। में हमेशा उनेह अपना क्लास मेट कह कर लोगों से तार्रुफ़  करावाता। वो मुस्करा कर कहते "क्या ग़ज़ब रागिब मिया "  
मरहूम रज़ीउद्दीन इतनी उम्र में भी हमारे वालिद हाजी क़मरुद्दीन से मैथ्स के मुश्किल सवालात समझने एरंडोल से जलगाव आते ,  हालाँकि खुद टीचर थे। अब्बा ट्यूशन पढ़ाते थे। हम बच्चों के साथ बैठ कर सीखने में उनोहने कभी छोटापन महसूस नहीं किया ।  हम दोनों का एक ही सेंटर पर मेट्रिक एग्जाम का नंबर आया।,दोनों ने साथ साथ एग्जाम पास किया ,मुझे अपने से ज़ियादा ,उनके पास होने की ख़ुशी थी, क्यूंकि अक्सर ये होता है ,एक उम्र के बाद जिंदिगी ठहर जाती है ,आदमी ज़द्दो जहद से जी चुराता है।   मरहूम ने एक उम्र के बाद  तालीम का सिलसिला शुरू किया ,तर्रकी हासिल करनी थी, हेड मास्टर बनना था,अपनी लगन ,महनत से मेट्रिक भी पास किया और  अपने हदफ़ ,हेड मास्टर बनने को सच कर दिखया । 
वो इत्र दान सा लेहजा हमारे बुज़र्गों का 
मरहूम को उर्दू पर उबूर (command ) हासिल था। लफ़्ज़ों के तलफ़्फ़ुज़ ,जुमलों की बंदिश दिल चाहता था "वो कहा करे में सुना करू " जब मुंबई से जलगांव आना होता ,उनसे मुलाक़ात करने ज़रूर एरंडोल जाता। बहुत खुश होते।   तरह तरह की dishes तैयार करवा के मेहमान नवाज़ी करते। अजब दिलनवाज़ बातें हुवा करती थी उनकी। 
दिल चाहता था बातों का ये सिलसिला कभी खत्म न हो। 
उनसे जुदा होते वक़्त महसूस होता था। 
तेरी कुर्बत के लम्हे फूल जैसे 
मगर फूलों की उमरें मुख़्तसर हैं 
मरहूम के मिज़ाज में सादगी थी। एक  मर्तबा में ने उनसे कहा घर में टेलीफोन क्यों नहीं लगवा लेते ,फरमाने लगे "एरंडोल में एक मारवड़ी ने घर में टेलीफोन लगवाया उसकी इनकम टैक्स इन्क्वायरी आ गयी। 
मरहूम ने टीचरी के साथ साथ कारोबार भी किया। बड़े बड़े फलों के बाग़ात मियाद पर खरीद लिया करते मुंबई ,नागपुर और राजस्थान तक उनके फ्रूट सप्लाई होते थे। खालिद मिया को अपने साथ रख कर माहिर कारोबारी बना दिया। 
खाला जान अकीला माशाल्लाह हयात है ,अल्लाह सेहत तंदुरुस्ती के साथ लम्बी उम्र अता करे। अल्लाह ने उनेह नर्म दिल अता किया है। जब भी उनसे मुलाक़ात होती है  ,जज़्बाती होजाती है। ढेरों दुवाओं से नवाज़ती है।  नीलोफर भाभी जान ,खालिद ,साजिद ,शाबान सबीना ने ,सग्गे भाई बहनों की तरह उन्सियत ,अपना पन दिया । अल्लाह इसी तरह इन रिश्तों में क़ुरबत ,मोहब्बत बाक़ी रखे। आमीन सुम्मा आमीन। 



शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

शादी खाना आबादी

समिर व तहसीन 

नसरीन ,शगुफ्ता ,रागिब अहमद ,बशीर सय्यद ,इरफ़ान सैयद 

 
रागिब अहमद ,समीर ,तहसीन ,शगुफ्ता 
१४ फरवरी (१ रज्जब ) को समीर और तहसीन का निकाह जलगांव में मुनअक़िद हुवा। मोहर्रम ,रजब ,ज़िलक़दह व ज़िल्हज्ज इस्लाम में हुरमत वाले महीने क़रार दिए गए हैं। रज्जब में अल्लाह के रसूल लगातार रोज़े रखते थे। इस महीने में हुवी शादी भी खैर व बरकत वाली इंशाअल्लाह साबित होगी। 
शकर को पानी में मिला दो या पानी को शकर में नतीजा एक ही निकलेगा , यानि मिठास इसी तरह सय्यदों की लड़की सय्यद के घर बियही गयी। 
समीर : फायदा देने वाला अपने नुकसान पर भी वो फायदा बख्श रहेगा 
तहसीन :तारीफ के लायक। अल्हम्दोलीलाह तहसीन है भी मुख्लिस ,संजीदा और तारीफ के लायक। 
ज़ाहिद : नेक ,तक़वे वाला  आबिदा : इबादत गुज़र की लड़की बशीर : खुश खबरि सुनाने वाला नसरीन : सफ़ेद फूल के घर जारही है अल्लाह दोनों खानदानो के इस खशगवार मिलन को कामयाबी बख्शे। मिया बीवी में ता उम्र तालुलूक़ात खुश गवार रहे। अल्लाह इन्हें ईमान वाली ,खूबसूरत ,तंदुरुस्त अवलाद से नवाज़े। आमीन सुम्मा आमीन 

बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

खुश्बू जैसे लोग मिले


Dr Wasif Ahmef

डॉ  वासिफ़ अहमद ; तारीख़े पैदाइश :१९५० 
कहानी मेरी रउदादे जहाँ मालूम होती है 
जो सुनता है उसी की दास्ताँ मालूम होती है 
हिंदुस्तान की  आज़ादी मिलने के ३ साल बाद वासिफ अहमद ने मरहूम हाजी क़मरुद्दीन और मरहूमा बिस्मिल्ला शैख़ के घर नवापुर में जनम लिया। वालिद कोर्ट में सीनियर क्लर्क (कारकुन ) थे। हुकूमत के फैसले पर हमेशा बोरिया बिस्तर बांधे रहते। वालिद का यावल में तबादला था काज़ी पूरा में क़याम था वासिफ अहमद की पढ़ाई की शुरुवात यवाल प्राइमरी स्कूल से हुवी। वालिद का तबादला चोपड़ा मुस्तफाबाद होगया मुस्तफा मिया के रोज़े के करीब की स्कूल में वासीफ साहब का दाखला कराया गया। वासिफ मिया स्कूल के वक्फे में अपने साथियों के साथ रोज़े के सहन में खेला करते। कच्चा ज़हन था कितनी दुवायें कितनी उमीदें कितने ख्वाब इस सहन में देखे होंगे अपने ख्वाब अपनी आरज़ूओं उमंगों को हकीकत में बदलने के लिए बे तहाशा मेंहनत की। माशाल्लाह ज़हीन तो थे ही फाइनल ने एग्जाम में टॉप किया। वालिद के रिटायरमेंट के बाद बच्चों के सुनहरी मुस्तकबिल के लिए पुरे ख़ानदान  ने जलगांव में रिहाइश इख़्तियार कर ली। एंग्लो उर्दू स्कूल जलगाव में वासिफ साहेब का दाखला हुवा। रौशन मुस्तकबिल की तरफ उठा ये पहला क़दम था। इस दौरान मुश्फ़िक़ वालिदा का इन्तिक़ाल भी हुवा। स्कूल में क़ाबिल उस्तादों ,जिया सर ,शैख़ सर ,इस्माइल सर ,मुन्नवर सर ,फ़ारुक़ सर की सरपरस्ती मिली जिनोह ने इस हिरे को तराशा। १९६७ में वासिफ अहमद ने एंग्लो उर्दू स्कूल में टॉप किया। कई अरसे तक प्रिंसिपल के कमरे में टोपर की लिस्ट में इनका नाम नुमायां हुरूफ़ में बोर्ड पर डिस्प्ले रहा। 
If you want to shine like a sun first burn like sun (Abdul Kalam Azad )
वासिफ अहमद ने जलगांव के एम् जे कॉलेज में सायेंस स्ट्रीम में दाखला लिया। १०*११ के कटियाफाईल के छोटे से मकान में पढ़ाई करना लोहे के चने चबाने जैसे था। घर में बच्चों का शोर ,मोहल्ले में औरतों के झगडे ,फेरी वालों की चक चक। लेकिन वासिफ अहमद लोहे के पलंग के गिर्द चादर लटका के किताबों ,कापियों और कंदील ले कर घुस पड़ते ,घंटों पढ़ाई में मसरूफ रहते ,फिर न उनेह बच्चों का शोर सुनाई  पड़ता न मोहल्ले की औरतों  के झगडे न फेरी वालों की चक चक। न सर्दी का एहसास  न गर्मी का। न ट्यूशन  थी न किसी की  रहबरी। ज़हानत ,कड़ी महनत 
के बल बूते पर मेरिट लिस्ट में नाम आया। सेवाग्राम मेडिकल कॉलेज में १९६९ दाखला मिला। मालदार बच्चों के बीच ग़रीब घर का लड़का। कड़ी मेहनत ,ज़हानत के बल बूते पर राहें आसान होगयी। डॉक्टरी की पढ़ाई इस्कोलरशिप हासिल कर के की। १९७३/१९७४ में वो घडी आही गयी। 
अगर हो तिशनगी कामिल तो पैमाने भी आएंगे 
MBBS की डिग्री मिलने पर वासिफ अहमद डॉ वासिफ अहमद कहलाये जाने लगे। कुछ ऐजाज़ात ,डिग्री इंसान से जुदा नहीं कर सकते जैसे डॉ। 
मेहनत से वो तक़दीर बना लेते है अपनी। 
वर्से में जिन्हे कोई खज़ाना नहीं मिलता 
गुजरात गवर्नमेंट में मेडिकल अफसर का अप्पोइंटमेन्ट लेप्रसी हॉस्पिटल बालपुर में हुवा। डॉ साहेब ने बड़ी मेहनत और मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी निभाई 
अलग बैठे थे साक़ी  निगाह पड़ी हम पर 
१९७५/१९७६ में बिहार में चेचक (small pox ) ने कोहराम मचा रखा था। ये बीमारी महामारी /वबा की शक्ल इख़्तियार कर चुकी थी। लोग कीड़े मकोड़ो की तरह मर रहे थे। UNO की निगाह छोटे से देहात में बैठे होनहार  मेडिकल अफसर पर  पड़ी। उनेह एयर टिकट देकर बिहार बुलाया गया। ब्रिटिश ,अमेरिकन डॉक्टर्स की टीम के साथ के साथ मिल कर इस बीमारी को दुनिया से नेस्त नाबूद करने का शरफ़ उनेह हासिल  हुवा। वाह वाह शाबाशी मिली। उस ज़माने में वारियर का ख़िताब मिला ,कईं सर्टिफिकेट्स भी  मिले।  वापसी गुजरात में हुयी व्यारा ,कर्जन ,गुजरात के कोने कोने में मेडिकल ऑफ़िसर की ड्यूटी निभाई। 
अगर हो आसानिया जीना दूश्वार होजाये 
गुना मध्य प्रदेश में जब पोलियो की बीमारी खतरनाक शक्ल इख़्तियार कर गयी। फिर से UNO को डॉ वासिफ की याद आयी। अल्हम्दोलीलाह अपनी और अपनी टीम की कोशिशों से इस वबा का ख़ात्मा दुनिया से करने का ऐज़ाज़ डॉ  साहेब को मिला। 
गुजरात लौटने पर हुकूमत ने जब ये देखा के इतना क़ाबिल डॉ बार बार WHO की खिदमात  के लिए बुलाया जा रहा है। उनेह उनका दूसरा ख्वाब पब्लिक हेल्थ  सर्विस में पोस्ट ग्रेजुएशन करने का मौक़ा मिला गुजरात  गवर्नमेंटकी तरफ से उनेह कलकत्ता डेपुटेशन पर रवाना किया।गया। वापसी पर DHO का प्रमोशन डॉ वासिफ को ऑफर किया गया। कई PHCS डॉ  मातेहत रही। कहा जाता है 
If you salute your work you do not have to salute anybody .If you pollute your work you have to salute everybody 
डॉ वासिफ ने  मेहनत, लगन ,ईमानदारी से काम किया।  २००९ में सुर्ख़ रु होकर रिटायर हुवे। रिटायरमेंट के बाद कुछ अरसा मेडिकल कॉलेज में टीचिंग का शौक़ भी पूरा किया।
डॉ वासिफ अब ज़ियादा समय दुबई में अपने बेटे ,बहु ,अपनी बेगम और पोतों  के साथ  गुज़ारते है। अपनी चहेती बेटी  के पास अमेरिका भी हो आये है। वक़्फ़े वक़्फ़े से हिंदुस्तान आकर गुजरात गवर्नमेंट को अपनी हयाती का सबूत भी पेश कर देते है ।  अपनी knowledge  polish करने के लिए  medical conferences  ,seminars भी attend कर लेते है। रिश्तेदारों की इमदाद में ख़ामोशी से पेश पेश रहते है। 
अल्लाह हम  सब के सर पर उनका साया सलामत रखे। उम्र दराज़ अता करे। आमीन सुम्मा आमीन।