मंगलवार, 19 सितंबर 2017

Atrangi doston ki yaad me

रात की झील में कंकर सा कोई फ़ेंक गया
दायरे दर्द के बनने लगे तन्हाई में
रोज़ की तरह आज भी सुबह ५ बजे उठ बैठा । करोना viros ने घर बिठा दिया है  ,मैं क्या पूरी दुनिया में लोगों ने अपने आप को दुनिया से जुदा कर लिया। ज़िंदा दिल दोस्तों की महफ़िल बहुत याद आयी। दिल मसूस कर रह गया।
किसी शायर की अपनी सोच है।
वह अच्छे के बुरे हम को बहुत प्यारे हैं
अब तो हम नए दोस्त बनाने से रहे
पुराने दोस्तों का क्या कहना। लेकिन अब तो कई पुराने दोस्त इस दुनिया से जा चुके हैं (कमल मल्होत्रा की याद ताज़ा होगयी )की यादें बाकी हैं। कुछ ऐसे ग़ायब हुए जैसे गधे के सर से सींग। न कोई अता पता छोड़ा न कोई सुराग़।
    इंसान का मिज़ाज भी मिकनातीस (मैगनेट ) के जैसा होता है। किसी ढेर में भी वह लोहे के टुकड़ों को ढूंढ लेगा।  इंसान भी जब दोस्ती करता है तो अपने हम खायाल ,हम मिज़ाज ,लोगों से ही करता है। सलाम नमस्ते तो हर दिन कई लोगों से कर लेते हैं ,लेकिन दिल से दिल बहुत काम मिल पाता है। उम्र के इस मुक़ाम पर में खुश किस्मत हूँ के रिटायरमेंट के बाद हम ख्याल ,हम मिज़ाज लोगों का एक अच्खा खासा crowd मिल गया है।  सोनवणे , मुज़्ज़फर , इश्तियाक़  ,सुनील कूडेकर ,सुनील होंनराव ,हमीद  ख़ानज़ादा ,फ़ारूक़  अल ज़मा ,औसाफ  उस्मानी ,मंसूर जेठाम ,इमरान ,प्रकाश राने  साहेब ,हरीश,अब्दुल , अतुल पांडेय ,माथुर साहब ,कर्नाड ,किशोर इत्यादि। हामिद ख़ानज़ादा ,माथुर साहेब छोड़ सब मुझ से उम्र में छोटे हैं। लेकिन जो खुलूस ,मोहब्बत ,उन्सियत ,अपनाइयत  इन सब से मिलती हैँ  सर फखर से ऊँचा होजाता है। हर कोई दूसरों की ख़ुशी से खुश होता है और अपने दोस्तों के ग़म सेः परेशानी से उदास । छोटी छोटी खुशीयां जैसे दोस्तों के बर्थ डे भी हम लोग इस जोश खरोश से celebrate  करतें हैं, यक़ीन नहीं आता। तहवरों की खुशियां भी हम लोग मिल बाट कर तक़सीम कर लेते हैं।
शायद ऐसे दोस्तों के लिए किसी शायर ने क्या खूब कहा है।
ज़िंदगी से बस यही गिला है मुझे
तू, बहुत देर से मिला है मुझे
किसी शायर ने क्या खूब कहा है
वक़्त रुकता नहीं कही थक कर
ये समय भी जल्द गुज़र जायेगा ,फिर वही महफिले होगी ,वही जश्न होगा।


सोमवार, 4 सितंबर 2017

Yaari hai imaan mera


वो भले हो के बुरे हम को बहुत प्यारे हैं
अब  तो हम नए दोस्त बनाने से रहे
अगर ऊपर वाला मुझे पुनर  जनम एक नयी  ज़िन्दगी देता है और वह मुझ से पूछे तुम अपने दोस्तों की लिस्ट अपनी मर्ज़ी से बनाओ तो पहले नंबर पर कौन रहेगा ? में कौन रहेगा ,में कहूंगा मंसूर जठाम ,दूसरे नंबर पर पर कौन में कहूंगा मंसूर झठाम ,तीसरे नंबर पर भी मैं उनिह का नाम लूंगा। मंसूर का मतलब(मीनिंग )होता है मदद किया गया। लेकिन हमारे मंसूर भाई दूसरों के ग़म को अपना ग़म समझते है और दूसरों की ख़ुशी में ऐसे शामिल होते हैं जैसे उनकी अपनी ख़ुशी हो।
    मेडिकल रीसर्च से साबित होगया है के जिन लोगों के अच्छे दोस्त होते हैं उन की उम्र में दस साल की बढ़ोतरी होजाती है। 
हम सब को मंसूर जैसा प्यारा दोस्त मिला है। हम सब की उम्र में यकीनन दस साल की बढ़ोतरी हगयी है। सालग्रह के इस मौके
 पर दिल से दुआ है उनेह सेहत ,तंदुरस्ती मिले और ज़िन्दगी में ऊँचा मक़ाम हासिल हो। 

मंगलवार, 22 अगस्त 2017

What an idea sir

७० वे यौमे आज़ादी के औसर पर दिली मुबारकबाद। दुआ है ये मुल्क फ़ले फुले ,दुनिया में सब से ऊंचा मुक़ाम हासिल हो।
     याद रखिये दूसरों पर उठाने पर हमारी अपनी तीन उंगलियां हम्मारी जानिब उठी होती है। कुछ पॉजिटिव कीजिये। कुछ ऐसे नारे होते हैं एक इन्किलाब बरपा करदेते हैं। टीपू सुल्तान ने कहा था "शेर की एक दिन की ज़िन्दगी लोमड़ी की सौ साला ज़िन्दगी से बेहतर है "  ,सुभाष चंद्र बोस ने नारा दिया "तुम मुझे खून दो में तुम्हे आज़ादी दूंगा। गाँधी जी ग़रीब ,दलित ,पिछड़े वर्ग और elite ,हिन्दू ,मुस्लिम को जुड़ने के लिए आवाज़ दी थी "हम सब एक है "आज़ादी हासिल करने में इन नारों की बहुत अहमियत रही है।
   हमारे प्रधान मंत्री मोदी जी ने आवाज़ लगायी " स्वच्छ भारत "तमाम गवर्नमेंट मशीनरी ,मिनिस्टर , अफसर और आम जनता इस नारे से जुड़ गयी। सब झाड़ू लेकर सफाई में जुट गएँ। सब लोगों को अहसास दिलाया जा रहा है खुली जगह पर टॉइलट करना कितना बुरा होता है। सलाम करता हूँ अफ़रोज़ शाह को जिनोह ने इस नारे पर अमल कर के अपनी टीम बनायीं और versava beach से गन्दगी दूर की। सारी दुनिया में उन की तारीफ़ हो रही है। उनेह awards दिए जा रहे है। सलाम करता हूँ "टॉयलेट एक प्रेम कथा " फिल्म बनाने वाली टीम को जिनोह ने हिम्मत जूटा कर इस subject पर सोचा।
  हम सब मिल कर कोशिश करें के मुल्क से ग़रीबी , भूक मरी ,बीमारी दूर हो। मुल्क में जहालत की जगह तालीम की रौशनी फैले।
  हिन्दुस्तान ज़िंदाबाद , जय हिन्द 

रविवार, 16 जुलाई 2017

Belasis Road/yadein Maharashtra college ki


यूँ   तस्सवर पे बरसती हैं पुरानी यादेँ
जैसे बर्सात में रिमझिम का समां होता है
बेलसिस रोड मुंबई की एक मशहूर सड़क थी । मुंबई सेंट्रल से  स्टेशन शुरू होकर नागपाड़ा जंक्शन पर ख़त्म होजाती है। इस सड़क पर मुंबई सेंट्रल बस स्टेशन ,उस से आगे Arabia Hotel ,उस से लग कर मेहदी मस्जिद ,पड़ोस में अंजुमन गर्ल्स स्कूल ,थोड़े आगे महाराष्ट कॉलेज सामने सेंट अन्थोनी गर्ल्स स्कूल और उस के पड़ोस में Alexandre Theater ,सड़क के end में traffic signal और K eddy company का छोटा सा मेडिकल store हुवा करता था। पास ही Sarvi Restaurant . १९७५/१९७७ जिस समय मैं Maharashtra College में B.Sc कर रहा था Saint Anthony Girls School के पड़ोस में बड़े बड़े घोड़ों के अस्तबल हुवा करते थे। इंद्रा गाँधी का  central में राज था ,आज की तरह चीज़ें आसानी से नहीं मिला करती थी। सोना कपडा ,इलेक्ट्रॉनिक के सामान smuggle किये जाते थे। हाजी मस्तान ,युसूफ पटेल नामी ग्रामी smugglers थे। जगे की कीमत  उस समय भी थी। क़िस्सा मुख़्तसर इन घोड़ों के अस्तबल को भी खाली कराने की ,इन लोगों के माध्यम से कोशिश की गयी। अस्तबल में आग तक लगवाई गयी,घड़े ज़ख़्मी हुवे ,कई मरे भी । लेकिन वह  उस समय ,उसे खाली न कर पाये। आज उस जगह पर आलिशान city central mall की ईमारत कड़ी है। लोग कहते हैं भलाई की बुराई पर  हमेशा जीत होती है। यह मेरी समझ से परे है । आज भी पूरी सड़क कुछ कुछ तब्दीली के साथ वैसी है। मानो  फ्रेम में लगी हुवी पुरानी तस्वीर। saarvi restaurant आज भी उसी हालत में है ,बलिययाँ लकड़ी लगा कर टूटी फूटी इमारत को गिरने से बचाने की कोशिश की गयी है ,होटल अब भी धुएं से भरा रहता  है। खानों में अब वह मज़ा नहीं रहा ,हालांकि कीमत कई गुना बढ़ गयी है। Alexandra theater की इमारत अब भी उसी हालत में है ,बाहर फिल्म के पोस्टर नहीं लगे है। सड़क का नाम बदल कर Jehangir Boman Behram Marg कर दिया गया है। लेकिन Raj Oil Mill की building उसी जगह है। कुछ समय पहले तक राज मिल्स के बहार गोली सोडा मिलता था ,अब उस दुकान पर नहीं दिखा,महाराष्ट्र कॉलेज की लड़कियां अब भी उसी शौक से चने चटपटे,आलू ,दही भेल कहती दिखाई पड़ी, आदमी का नेचर कभी  नहीं बदलता । चेंज है लेकिन धीमा सा,जिस तरह thermos  में राखी चाय बहुत देर तक गर्म रहती है।



Belasis Road ممبیئ سنٹرل اسٹین سے شروع ہوکر  ناگپاڑا جنکشن پر ختم  ہوجاتا ہے شاید اس کی حد تھوڑے آگے بھی ہو-اس سڑک پر ممبیئ سنٹرل بس  اسٹیشن،اس سے آگے اربیا ہوٹل،مہدی مسجد،انجمن اسلام گرلس اسکول،پڑوس میں مہاراشٹر کالج،سامنے سینٹ  اینتھنی گرلس اسکول اور اس کے پڑوس میں الکزنڈر تھیٹر سڑک کااختتام keddy company چھوٹا سا میڈکل  اسٹور تھا-اسی کے سامنے ٹریفک سگنل پاس ہی میں ساروی ہوٹل-سینٹ اینتھنی  اسکول کے پڑوس میں بڑے بڑے گھوڑوں کے اصطبل ہوا کرتے- اصطبل خالی کرانے کے لیے کیئ بار ان میں آگ بھی لگایئ گیئ-زخمی گھوڑوں کو سڑک پر دوڑتے پھر دم توڑتے ہم نے ان گنہکار آنکھوں سے دیکھا ہے-حاجی مستان ،یوسف پٹیل کا عروج تھا جگہ خالی کرانے کے لیے  اسوقت بھی سپاری دی جاتی تھی- لیکن اسوقت کیئ بار کی کوششیں  بھی اصطبل  کی جگہ خالی کرانے  میں ناکا میاب رہی تھی-  1974/1977 کی بات ہے میں بی-ایس-سی فایئنل ایر میں تعلیم حاصل کر رہا تھا-مہاراشٹرا کالج میں منشی صاحب پرنسپل ہوا کرتے،ککشی وال وایئس  پرنسپل,پروفیسر جاوید خان -آیے دن کالج کے ہال میں مشاعرے ،ادبی نشستیں،بیت بازی کی محفلوں کی رونق ہوتی-کرشن چندر،خواجہ احمد عباس،فیض  احمد فیض ،خواجہ عبدل غفور،مجروح ان محفلوں کو رونق بخشتے-شام طنز مزہ میں کرشن چندر نے " عشق کرنے کے باون طریقے " پڑھ کر سنایا تھا ہمارے پیٹوں میں بل پڑھ گیے تھے-فیض احمد فیض کا دھویں کے کش چھوڑتے ہویے "رنگ پیرہن کا خشبو ں ذلف لہرانے کا نام-موسم گل ہے تمہارے بام پہ آنے کا نام " مشہور غزل سنانا بھولتے نہیں بھولتا-کالج ڈے میں  بلراج سہانی،جاوید اختر، امجد خان کی موجودگی چار چاند لگا دیتی تھی-امجد خان کا شعلے کے ڈایلگ کی پیرڈی "ارے او بسنتی ناگپاڑے کی چکی کا آٹا  کھاتی ہو کیا" سنایا تو محفل گل و گلزار ہو گیئ تھی-بیت بازی میں پڑھے گیے معیاری شعر اب تک یاد ہے-
      Alexandra theater میں اس زمانے  میں فحش  انگلش  فلمیں دکھانے کا رواج تھا-عریاں سے پوسٹر پر فلم کے ٹایٹل کا  اردو/ہندی ترجمہ جیسے " ایک لکا تو دوسرا مکا" "بندوک ساڑی میں بندیا گاڑی میں" ٹھیٹر کے سامنے جو کالج کے بالکل مقابل ہے لٹکا دیا جاتا -کان صاف کرنے والے،دھونی دینے والے قفیر،لچے ،لفنگے لوگوں کا اث دہام فلم دیکھنے ٹوٹ پڑتا-پرنسپل منشی نالاں ہوجاتے کیئ بار تھیٹر مینجمنٹ کو بول کر پوسٹر ہٹوایے بھی-کچھ شرافت اس زمانے میں باقی تھی-
    آج بت خانے سے آیئ تھی آواز  اذاں
17 فروری 2015 ایک عرصے بعد بلاسس روڈ پر جانے کا موقعہ ملا-40 سال بعد بھی اس زمانے کے کچھ آثار قدیمہ اب بھی باقی ہیں-مہارشٹر کالج،انجمن گرلس ہایئ اسکول،سینٹ اینتھنی گرلس اسکول،اربیا ہوٹل کچھ تبدیلی کے بعد اب بھی باقی ہے-ساروی ہوٹل اب بھی دھویں سے بھرا رہتا ہے لیکن سیخ کباب میں اب بھی وہی مزہ ہے فرق قیمت میں ہے 20 گنا بڑھ گیئ ہے-فٹ پاتھ اب بھی ٹوٹے پھوٹے ہیں لیکن پہلے سے بہتر-جگہ جگہ اب بھی پوسٹر لگے ہیں چہرے بدل گیے ہیں-بنات والا ،زیاوالدین بخاری کی جگہ  اتحادالمسلمین کے اویسی بھاییوں نے لے لی ہے-keddy company  کی جگہ دو منزلہ عمارت بن گیئ ہے-راج آیل مل اپنی جگہ موجود ہے-گولی سوڑا اب بھی دستیاب ہے 25 پیسے کی جگہ 5 روپیے میں-کھٹی میٹھی چاٹ،ابالے آلو اب بھی لڑکیاں اسی شوق سے کھارہی تھی-گھوڑوں کے اصطبل کی جگہ city mall بڑی بڑی عمارتوں نے لے لی ہے-
                  سب سے بڑا انقلاب  theatre  Alexandra کی بلڈنگ وہی ہے –رفیق دودھ والا کی سرپرستی میں " ادارہ دینی تعلیم " مدرسہ میں تبدیل ہو گیا ہے-ہندوستان کے کونے کونے اور کیئ بیرونی ممالک میں اس ادارے کی سرپرستی میں کامیاب مدرسے چلایے جا رہے ہیں-17 فروری 2015 کو اساتزا کی 3 روزہ ورک شاپ کا پہلا روز تھا- مولانا کو ٹایم مینجمنٹ پر مدلل تقریر سن کر میں دنگ رہ گیا-آج کے دور کی مسابقت کرنی ہو تو اسی ڈسپلن  سے  مدارس کو چلانا ہونگا-

Ghodon Ka astabal jhan badi badi immarten ban chuki hai
Inside Alexendra Theatre
Raj Oil Mill Belasis Rd
Keddy company new building
St.Anthony Girls School Belasis Rd







मंगलवार, 4 जुलाई 2017

Bhawani rath yaadein jalgaon ki

आज से ५० साल पहले शहर जलगांव के लोगों की ज़िन्दगी
पोला ,गणपति ,मोहर्रम ,भवानी और रथ तहवरों पर सिमट कर रह गयी थी। और कहीं न कहीं हैदरी थिएटर इन तेहवारों का सेंटर बन जाता।
    सैय्यद हैदर , हैदरी थिएटर के मालिक थे। सय्यद साहेब leprosy के मरीज़ थे। हाथ पैर की उंगलियां झड़ चुकी थी। चेहरे पर नाक आधी ग़ायब थीं। फिर भी थिएटर से लगी ऑफिस में गांव तकिया लगाए बैठे रहा करते थे।  वैश्याओं में उन की बड़ी इज़्ज़त थी। हैदरी थिएटर जलगाव् ,में कटिया फ़ैल मोहल्ले के बीचों बीच था।  नाम के लिये मराठी आर्ट लवणी, जो तमाशे की एक शक्ल है का मज़हरा (promote ) करना था।  लेकिन खुले आम जिस्मों की तिजारत होती थी। एक मंडी थी।
    तमाशा शुरू होने से पहले वेश्याएं हैदर साहब  की आरती उतरती थी।  फिर शुरू होता नाच का प्रोग्रॅम। पहले भजन गाया  जाता। दो तीन  मराठी गानों पर धामा चौकड़ी होती। उस ज़माने में पाकीज़ा फिल्म का गीत " इन्ही लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा " बहुत मशहूर हुवा था।  इस गाने पर नाच ज़रूरी था। ढोल ,हारमोनियम ,तबला बजने वालों में कही ताल मेल न होता। और नाच के साथ बे हंगाम सुरों  में गातीं ,उन तवाइफ़ों की आवाज़ें एक एक अजब सा  बे हंगाम शोर पैदा कर देती।  फिर भी audience में बैठे तमाशायिं स्टेज पर पैसे फ़ेंक कर दाद देते। ९ वारी साडी कसे  ,चेहरे पर पाउडर  लिपस्टिक की परतें (layers ) लगाएं हुवे औरतें बड़ी अजीब सी लगती। entry ticket १ रूपया था। आस पास के देहातों के शौक़ीन थिएटर पर टूट पड़ते।
  दसहरे में जलगाँव शहर में भवानी का रूप धारे लोग ढोल ताशे के साथ भीक मांगने निकलते। हर घर ,हर दूकान चाहे हिन्दू की हो या मुसमान की उन्हें पैसे २ पैसे की सौग़ात मिल जाती। रथ भी उसी दौरान निकलता। मज़बूत लकड़ी से बना रथ साल भर एक जगे छत के नीचे खड़ा होता  शहर में घुमाने से पहले उसे साफ़ किया जाता खुशबूदार तेलों से महकाया जाता ,साल में एक बार मोटे मोटे रस्सों से बांध कर सरे शहर में फिराया जाता। रथ खींचना भी (तबर्रुक ) की तरह होता। क्या हिंदू क्या मुसलमान सब शरीक होते। रस्सा पकड़ कर खींचने के लिए एक होड़ लग जाती। रथ में बाल कटवा कर कुछ पंडित बैठे होते। उन पर कच्चे ,पके केलों की बौछार होती ,और वो लोग बर्तन ,ढाल की तरह बनी चीज़ों से अपना बचाव करते। उन ज़माने में जलगांव में केलों की पैदाइश बहुत होती थी ,१ रूपये में कई दर्जन केले मिल जाते। रथ के पीछे म्युनिसिपल का tractor में बैठे लोग उन केलों को जमा करते। हज़ारों रूपये के केले बर्बाद होते थे।  लेकिन एक जोश ,एक उत्साह ,ख़ुशी  जूनून का माहौल  कभी बाद में देखने को नहीं मिला।
      जलगांव की आबादी इन तहवरों में कई गुना बढ़ जाती थी। करीब के देहातों से लोग एक भीड़ शहर पर टूट पड़ती। रात रात भर लोग मटर गश्ती करते। उन दिनों शहर में ५ सिनेमा घर थे। हर सिनेमा घर में रात ३ बजे फिल्म शो शुरू होजाते। ७ से ८ शो हर थिअटर में दिखये जाते। आधी अधूरी फिल्मे देख कर लोग खुश होजाते। हैदरी थिअटर भी रात रात भर नाच गानों के शोर से डूबा होता।
यादे माज़ी अज़ाब है यारब


मंगलवार, 27 जून 2017

musafir hoon yaron



                               مسافر ہوں یاروں
کچھ اس طرح سے مجھے حادثات مہیب ملتے ہیں
اتفاقا" کسے روراہے پر ،جیسے بچھڑے رقیب ملتے ہیں
غلطی ہویئ رقیب کی بجائے اوصاف عثمانی لکھنا چاہئے تھا-درمیانہ قد ،مجھے 22 سال کی عمر کے بعد ملے اس لئے قد تبدیل تو نہیں ہوا،کچھڑی بال جن میں اب جگہ جگہ چاندی چمکنے لگی ہے-آنکھوں پر قیمتی چشمہ لگائے رکھتے ہے-موبائیل برسوں سے ایک ہی استمعال میں ہیں، اسکرین پر خراشیں  پڑ چکی ہیں،شاید تحفہ میں گرل فرینڈ یا بھابی سے ملا ہے-ورنہ اتنی بد ہیت چیز کا استعمال سمجھ میں  نہیں آتا-کپڑے ماشا اللہ برانڈڈ پہنتے ہیں-معروف عثمانی، ادب دان خاندان میں جنم لیا ہے-والد اردوں داں ،استاد  ،شايد اسی مناسبت سے نام اوصاف رکھا گیا-گاوں میں اردوں اسکول سے تعلیم کی شروعات کی-ممبیئ آکر مکمل کی –اسی لیے اردو سے والہانہ محبت ہے-اپنی اہلیہ سے بھی اتنی محبت ہے کیوں کے اپنے لیے انتخاب ہی اردو ٹیچر کا کیا ہے-
      منزل کی ہے تلاش تو دامن جنوں کا تھام
    اپنے  کریر کی شروعات fab tech سے کی –کمپنی کو اپنے خون جگر سے سینچا-کمپنی چھتنا آور  درخت بن چکی ہے-اب بھی اسی  مستعدی سے کمپنی کی ذلفیں سنوارنے میں مصروف ہے-پہلے بس ،ٹرین سے سفر کیا کرتے تھے –خال خال نیرول میں لظر آجاتے تھے-اب ماشااللہ پلین سے سفر کرتے ہے-کبھی چندی گڑھ تو کبھی دہلی،کلکتہ،احمدآباد،نیپال ،بھوپال،پونا، سارا ہندوستان جناب کے لیئے گھر آنگن ہو گیا ہے-سمجھ میں نہیں آتا انہیں کب فرصت مل  پاتی ہے،کیونکہ سفر سے لوٹتے ہی  اپنی کار ڈرائیور کے ساتھ کمپنی ہیڈ آفس یا پھر  عمر گام فیکٹری کی دوڑ لگا آتے ہے-
ہمیں پتہ ہے ہوا کا مزاج رکھتے ہو
ان کی زندگی میں ایک چوکور ہے –بھابھی،عظمان،امان اور علینہ جو ان کی زندگی کا مرکز ہے- سبھی سے  انہیں والہانہ قربت ہے لیکن بقول اشتیاق بھایئ "پتیلے میں لگی کھرچن بہت لزیز ہوتی ہے " کے مصداق امان میاں سے خاص  انسیت ہے-
    اس کے علاوہ بھی انہوں نے زندگی کو کیئ خانوں میں باٹ  رکھا ہے-باقاعدگی سے احمد بھایئ کے باہر کرسیاں بچھا کر دوستوں کی محفلیں سجانا،یاروں کی بارات کو کبھی محمد علی روڈ ،کبھی بھیونڈی دھابہ،کبھی ماتھیران ،کبھی ڈومبیولی دھابہ  لیجاکر چٹ پٹے کھانوں سے انہہیں متعارف کرانا-سوشل میڈیا پر ویڈیو کلپس،شاعری،جوکس  share  کرنا-سوشل کاموں میں شامل ہونا-اس کے علاوہ بقول منصور جٹھام ،مہاشے "گھریلو اتی  کرمن" کے لیئے  بھی جانے جاتے ہے-لیکن کامیاب نہیں ہونے پاتے-اشتیاق بھایئ سے پنگا نہیں لے سکتے-منصور جٹھام اینٹ کا جواب پتھر سے دیتے ہے-حامد بھایئ تھوڑے دب جاتے ہے کیونکے ان کی جوانی بانکپن میں گزری ہے-ہریش قربانی کا بکرا ،وہ بھی اب چکنا گھڑا ہوگیا ہے ہنس  کر ٹال دیتا ہے-ایک بار افسر امام نے گھر ناشتے کی دعوت دے کر اپنے پیر پر کلہاڑی مار لی-اب تو یہ عالم ہے جس راستہ سے اوصاف گزرتے ہے ان کی پرچھایئ بھی نہیں دکھایئ دیتی-
ایک  چہرے پہ کیئ چہرے لگا لیتے ہیں لوگ
   اوصاف میں تمہیں بہروپیہ نہیں کہونگا-آج دوستی ،وفا،پیار ،محبت  لونگ الایچی کی طرح عنقا ہوتے جارہے ہیں-ہنسی لوگوں کے لبوں سے غائب ہورہی ہے-بلاوجہ ہر جگہ ٹنشن کا ماحول ہے -تم اپنی مصروفیت کے باوجود لوگوں کے دکھ درد کم کرکے دوستوں کی زندگیوں میں اندر دھنش کے رنگ بکھیرنے کی کوشش میں لگے ہو-میں تمہاری ان کوششوں کی قدر کرتا ہوں –بقول شاعر
جہاںرہینگا وہاں روشنی لٹاینگا
کسی چراغ کا اپنا مکاں نہیں ہوتا

शनिवार, 24 जून 2017

speech on the ocassion of iftar

सलाम ,नमस्ते ,सत सीरी अकाल , good evening
गुल ने गुलशन से गुलफाम भेजा है।
सितारों ने आसमान से सलाम भेजा है।
मुबारक हो आप को रमज़ान  का महीना।
हम ने दिल से ये पैग़ाम भेजा है।
रोज़ा ,फास्टिंग  ,उपवास्  हर धर्म में अलग अलग नाम से जाना है।
क्रिस्तान बंधुओं में ४० दिन लेंट  में फास्टिंग करने का  कारण क्राइस्ट के बलिदान को समझना।
जीव्स  में याम किप्पर में फास्टिंग  ,गुनाहों से माफी।
जैन धर्म की नीव  ही उपास है। जब कोई ग़लती होगयी माफ़ी के लिए उपवास्  कर लिया।
बौद्ध धर्म में भी आत्मा शुद्धिकरण के लिए उपवास किये जातें हैं।
हिन्दू धर्म में हफ्ते में एक दो दफा सेल्फ कन्ट्रोल के लिए उपवास रखा जाता है ।
        रमज़ान में भी ,मुस्लिम भाइयों में २९ या ३० दिन के लिए तक़वा (अल्लाह का डर ) बढ़ाने  के लिए रोज़ा  रखा जाता है। दिन भर भूका रह कर ग़रीबों की भूक तकलीफ समझ सके। रमज़ान में कमाई  का ढ़ाई प्रतिशद मालदारों को ग़रीबों को देना होता है। ज़कात का मतलब अपने पैसे को पाक साफ़ करना ,अपने दिल को माल की मोहब्बत से दूर करना।
रमजान रोज़ा का एक और कारण है  ,ऊपर वाले को खुश करना ।
        इफ्तार के इस प्रोग्राम में  हमारा स्टेज मानो चाँद सितारों से सजा आकाश । सामने बैठे हुवे लोगों में भी समाज की बड़ी बड़ी हस्तियां बिराजे  हैं। आप सब का शुक्रिया ,धन्यवाद  प्रोग्राम को कामयाब बनाने के लिए।
ईद के लिए आप सब को शुभ कामनाएं।
आखिर में दुआ है।
चाँद से रोशन हो रमज़ान तुम्हारा।
इबादत से भरा हो रोज़ा तुम्हारा।
हर रोज़ा और नमाज़ कबूल हो तुम्हारी।
यही अल्लाह से दुआ है हमारी।