सोमवार, 1 मई 2017

star is born

महात्मा गाँधी ,रतन टाटा ,अमिताभ बच्चन ,सचिन तेंदुलकर ,नरेंद्र मोदी ,oprah Winfrey ,Bill Gates ,Emmma Thompson इन सभी नाम चिन्ह महारथियों को एक common चीज़ ने आपस में जोड़ा है। किसी ने फिल्म में,  किसी ने आर्ट्स में अपनी शोहरत का झंडा गाड़ा है ,किसी ने business में ,किसी ने खेल में ,किसी ने पॉलिटिक्स में। इन सब मशहुर हस्तियों को जोड़ने वाली चीज़ है  सब का lefty होना। हमारी नवासी आलिया भी लेफ्टी ही है। शायद यही कारण है के वह बहुत छोटी उमर से पेंसिल ,paint और ब्रश का इस्तेमाल professional के जैसे करने लगी  है। हर painting के पीछे एक कहानी होती है और शायद ओरिजिनल painter ही उसे अच्छी तरह बता सकता है।

तस्वीर की कहानी आलिया की ज़बानी
५ साल की नन्ही उम्र में उस की ऊपर  download गयी  अपनी पेटिंग का background मुझे उसने कुछ इस तरह बयांन किया। " नानू जुम्मे का दिन है बेटा म्यूजिक का शौक़ीन है, और वह रेडियो पर गाने सुन रहा है। बाप ग़ुस्से से उसे कह रहा है , "आप को नमाज़ आती है , रेडियो बंद  करो ,जुम्मे की नमाज़ को जाओ।

ऊपर वाली तस्वीर  भी उसकी कारीगरी है जिस में उस ने समुन्दर के नीचे की  तेह की तस्वीर sand painting से की है ।
आने वाला दौर original thinkers का होंगा । artificial intelligence इंसानो को jobless करके छोड़ देगा। driver less car,offices  ,factories ,banks ,hotels में इंसानों की जगह robot काम करने लगेंगें। अगले दस सालों में  अनुमान हैं ,१० करोड़ हिंदुस्तानी jobless होजाएंगें। मुस्तकबिल की कड़वी सच्चाई का सामना करने के लिए हमारी कितनी तैयारी है।
   

गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

यादें जलगाओं की -part1

लोग हमराह लिए फ़िरते हैं यादों के हुजूम
ढूंढ़ने पर भी कोई शख्स न तन्हा निकला
एक age के बाद आदमी ताज़ा ताज़ा बातें भूलने लगता है। शाम तक ये याद नहीं आता लंच में क्या खाया था। लेकिन गुज़रें कल की यादें दीमग़ से ऐसी चिमटी होती है जैसे mobile को छूते ही video message स्क्रीन पर दौड़ने लगता है।
यादे माज़ी अज़ाब है यारब
१९६७ /१९७० जलगाओं  की कुल आबादी १ लाख थी। पश्चिम में एंग्लो उर्दू स्कूल थोड़ी दूरी पर ख्वाजा का मज़ार ,उसके आगे हरे भरे खेतों का सिलसिला ,पूरब में जूना जलगांव ,आगे की सड़क नसीरबाद तक जाती। दक्षिण में पूना फ़ैल ,उत्तर की दिशा में मेहरून का तालाब चारो तरफ से मशहूर बेरों और अमरुद के बाग़ात से घिरा। उस ज़माने में शहर में इमारतें छोटी छोटी थी।  जलगाव् म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन को क्या सूझी शहर के बीचों बीच १५/१६ floor  का पतला सा टावर खड़ा कर दिया। हम लोगों के लिए एक अजूबा टावर की आखरी मंज़िल से सारे शहर का नज़ारा होता ,तेज़ हवा के झोकों से तबियत घबरा जाती। मेहरून तालाब में किश्ती उलटंने से तीन लोगों की मौत होगयी थी,कुछ समय तक तालाब सूना रहा ,फिर रौनक लौट आयी ,सैर के लिए और कोई मुनासिब जगह थी भी नहीं।  कभी कभी तालाब सूख भी जाता। मेहरून के बेर  अमरूदों का स्वाद फिर कहीं न पाया । सीरिया ,सूडान ,सऊदी अरबिया ,मिडिल ईस्ट घूमा लेकिन कहीं भी वह बात न पायी।
रात की झील में कंकर सा कोई फ़ेंक गया
दायरें दर्द के बनने लगे तन्हाई में
चार  सिंगल स्क्रीन theaters अशोक,राजकमल ,नटराज ,नटवर लोगों के फिल्म  का शौक पूरा करने के लिए हुवा करते। एक open air theater जहाँ मराठी ड्रामे के शौक़ीन ड्रामे देखा करते। इसी ओपन थिएटर में कुशतियों के मुक़ाबले होते। कई दिन पहले cycle rickshaw पर hoarding लगा कर लाउडीस्पीकर पर महोल्लो में घुम घूम कर लोगों का उत्साह बढ़ाया जाता। पहलवानो पर शर्ते लगती। मुक़ाबले के दिन थिएटर खचा खच भर जाता। लोग थिएटर के चरों तरफ बिल्डिगों , पेड़ों पर चढ़ कर मज़ा  लेते ,कान पड़े आवाज़ सुनाई न पड़ती।मुक़ाबले के रिजल्ट सुनने पर तूतु में में होती
बहस होती ,इलज़ाम तराशियाँ होती ,कभी कभी बात झगडे तक भी पहुँच जाती।
तहवारों की धूम हुवा करती। ईद ,बकरीद में ढोल ताशों के साथ ईद गाह तक लोग पहुंचते खुले मैदान में ईद की बाजमाअत नमाज़ अदा करने के बाद साथ लगे कब्रस्तान में दुआ करते  एक दूसरे से गले मिलते ,मुबारकबाद का
सिलसिला चलता।


शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

Social media कितना सच कितना झूठ

                                              Social media कितना सच  कितना झूठ
SMS ,internet ,whatsup ,google ,facebook ने एक सैलाब की तरह नयी generation को बहा ले गयी। अब ये ज़रूरी नहीं इन medium से जो messages हम तक पहुँच रहे हो सब के सब सही हो। islamic sites पर जो मालूमात शेयर की जाती हैं वह islamic sites हैं भी या नहीं ? हो सकता है ये इस्लाम के नाम पर एक ग़लत propoganda हो। कुछ  महीने पहले उर्दू पेपर इन्कलाब में ऐसे कई इस्लामिक साइट्स की तरफ लोगों का ध्यान आकर्षक कराने की कोशिश की गयी थी जो इस्लाम के नाम पर लोगों को गुमराह करने की साज़िश है।  इसी article में कई ऑथेंटिक इस्लामिक sites की लिस्ट भी प्रोवाइड की गयी थी।
   WHATSUP पर हर दिन अल्लाह के  रसूल के नाम से झूटी हदीसे भेजी जाती हैं और साथ साथ यह मैसेज भी ATTACHED होता है के ज़्यादा से ज़्यादा लोगों में फैलाएं। कहीं कोई हदीस की किताब का refrence तक नहीं दिया जाता। में  ने कई बार मुफ़्ती साहब से WHATSUP पर मिली हदीसों के बारे में सच्चाई जननी चाही लेकिन उनोह ने भी वह हदीस कभी नहीं सुनी न पढ़ी।  लोगों के दिलों से अल्लाह का डर निकल गया है। कुछ दिन पहले whatsup पर एक मैसेज मिला था। अगर ४ रकअत नफिल नमाज़ कायदे में बैठे बग़ैर अदा कर दी जाये तो ज़िन्दगी भर के गुनाह मॉफ होजायेंगे नौज़बिल्ला।और मुझे सवाब की निय्यत से forward करने की सलाह भी मिली। इस तरह से न कोई हदीस है न कोई रिवायत कहाँ से ऐसे मैसेज घड़े जातें हैं। मेरे एक करीबी बुज़ूर्ग ने whatsup पे मैसेज रवाना किया के सफर का महीना बड़ा मनहूस होता है अल्लाह के रसूल इस महीने बीमार और उदास रहा करते थे। में ने उन बुज़र्ग से शिकायत की क्यों ऐसा ग़लत मैसेज रवाना किया। फरमाने लगे तुम आगे फॉरवर्ड करने पहले check कर लिया करो। क्या ये बिदअत फैलाने का तरीक़ा नहीं है ? इस मौके के लिए किसी शायर ने खूब कहा है।
बड़े वसूक़ (CONFIDENCE ) से दुनिया फरेब देती है
बड़े खलुस से हम ऐतेबार करते है 

बुधवार, 22 मार्च 2017

इक़्कीसवीं सदी के हिंदुस्तान की दो तस्वीरें

                                        इक़्कीसवीं सदी के हिंदुस्तान की दो तस्वीरें
तर्रकी (progress ) की दौड़ में हिंदुस्तान ने अमेरिका ,यूरोप की बराबरी कर ली है। अब तो एक ही वक़्त में १०५ सय्यारे (satellites ) हमारी ज़मीन से खला (space ) में  कामयाबी से छोड़े गएँ ,नयूक्लेअर हथ्यार ,बेहतरीन सड़कें ,पुल ,कारें ,ऊंची ऊंची बिल्डिंगें सोने पे सुहागा अरब पतियों  की हिंदुस्तान जैसे मुल्क में कमी नहीं हैं।
    कुछ रोज़ पहले times of India में एक ख़बर पड़ कर शर्म से सर झुक गया। महाराष्ट्र जिसे हिंदुस्तान की सब से ज़ियादा progressive states में जाना जाता है ,में पंढरपुर शहर ( ज़िल्ला शोलापुर )में  आषाढ़ी एकादशी के अवसर पर ६ लाख भक्त  विठोबा टेम्ले के दर्शन के लिए जमा होतें हैं। सब से बड़ी समस्या drainage system न होने से सफाई कर्मचारियों को toilet disposal के लिए हाथों से काम करना होता है। कोर्ट ने महाराष्ट्र गवर्नमेंट को डाट भी पिलाई थी। सायेंस ,technology ने इतनी तर्रिकी की है। किस तरह यह ज़लील काम लोगों से करवाया जाता है। सोच कर अक़ल हैरत ज़दा होजाती है। 

बुधवार, 8 मार्च 2017

किनारा विलेज रेस्टॉरेंट /ढाबा -bonsai पौदे जैसा

                                   किनारा विलेज रेस्टॉरेंट /ढाबा -bonsai  पौदे जैसा





 मेरा बच्पन भी साथ ले आया
गाँव से जब भी आ गया कोई
सुना था हर आदमी में एक बच्चा छुपा होता है ,या ज़ेहन के किसी कोने में कुछ ख्वाब /यादें /ज़ज़्बात छुपे होतें हैं। और हम उन खवहिशों को किसी सूरत में पूरा होते देखना चाहते हैं। हर कोई देहात से शहर में आय है। आज से कुछ साल पहले तक हम सब छोटे छोटे देहातों के बासी हुवा करते थे। खुली हवा  में साँस लेना, सितारों ,चांदनी, खुले  आसमान  तले सोना। बात होती हेक्टर ,एकर ज़मींन की। खेतों फसलों के बीच उधम मचाने का कुछ और ही मज़ा था। फिर दूध भी हमारे सामने जानवरों के थनों से धोया जाता था। आज बच्चों से पुछा जाये के दूध कहा से आता हैं ,जवाब मिलेगा डेरी से। नेचर से दूरी इस तरह बढ़ती रही , तो अंजाम खुदा जाने! पहले तो छुटियों में दादा/दादी /नाना /नानी से मिलने बड़े चाव से जाया जाता था। अब तो नाज़ुक रिश्तें भी ख़त्म हो गए हैं। लोग धुल मिटटी से इतने डरने लगे हैं ,तो   क्या शहरों की फज़ा को कारखानों ,कार के धुवें ने बर्बाद नहीं कर दिया हैं?
     किनारा ढाबा /रेस्टॉरंट ,थीम विल्लज की शक्ल में बनाया गया है। मुम्बई से ६० किलो मीटर दूरी पर लोनावाल से ३ किलो मीटर दूर पुराने मुम्बा पूना हाईवे पर, शहरों की ज़िन्दगी से तंग लोग कुछ सुकून भरे पल गुजरने यहाँ पहुँच जातें हैं। bonsai मैं ने इसलिए कहा के जिस तरह शहरी  लोग छोटे छोटे पौदों पर फल और सब्ज़ियां ऊगा कर ख़ुश  होजातें हैं , खुले खुले मकानों की जगह २०*१० के फ्लैट में रहते हैं। किनारा विलेज भी उसी शक्ल पर बनाया गया है। लेकिन धुल  भरी सड़कों की जगह  कंक्रीट ब्लोग्स लगे हैं। साफ शफाफ टॉयलेट हैं। उम्दा किस्म के खाने लेकिन दाम उसी वैसे ही । नील गाय का दूध भी मिलेगा लेकिन आसमान छूती  कीमत पर यानि  १४०० किलो। कबाड़ियों की दुकान से उठायी वस्तुवें पोलिश कर सलीके से रखा गया है। बड़ी  बड़ी संदूकें जिन में किसी ज़माने में ख़ज़ाने रखे जातें थे ,बड़े बड़े तालों से बंद, पूरा यक़ीन है खाली ही होंगी। लकड़ी से बनी अलमारियां , पुराने ज़माने की खाट पर बिस्तर बिछा सोने की व्यवस्था भी है। फर्नीचर ,बैल गाडी, बैल नादारद । ऊंट ,घोड़े की सवारी ,palmist ,मेहंदी आर्टिस्ट। live ग़ज़ल का प्रोग्रम लेकिन स्टेज के सामने बोर्ड लगा है "dancing is strictly prohibited " अक़्ल   में बात आती  ही नहीं के ग़ज़ल पर कौन डांस कर सकता है ?
हम शहरी लोग खूबसूरत लिबास पर थिगल (patch ) लगाने की आदत से मजबूर हैं।

रविवार, 5 मार्च 2017

कार्ला केव्स -तारीख के पन्नो पे लिखी दास्तान

                                              कार्ला केव्स -तारीख के पन्नो पे लिखी दास्तान








हिंदुस्तान का चप्पा चप्पा तारीखी इमारतों ,खंडरों ,गुफाओं से भरा पड़ा है। बद नसीबी, हम हिंदुस्तानी नयी तहज़ीब से इतने मुतास्सिर हैं के यूरोप ,अमेरिका ,रोम की सैर करेंगें लेकिन इतनी तौफीक नहीं होती कभी आस पास ही नज़र दौड़ा लेते। एलफेंटा केव्स ,अजंता ,एल्लोरा कितने लोगों ने देखा होंगा ,  हालांके पूरी दुनिया के टूरिस्ट इन मक़ामात की सैर लाज़मी समझतें है। वे जब ऐसे मुक़ाम पर पहुचतें हैं तो पूरी मालूमात के साथ पहुंचतें हैं। हमारें लोकल गाइड्स से ज़ियादा उनेह पता होता है।
   पिछले महीने १३  फ़रवरी-२०१७ पूना से लौटतें हुवे कार्ला  केव्स देखने का इत्तेफ़ाक़ हुवा। लोनावाला से ५ किलो मीटर दूरी पर पुराने मुम्बई पूना रोड  के करीब ,इंद्रायणी हिल्स पर इन केव्स को पहाड़ काट काट कर बनाया गया है। १०० मीटर उचाई पर १६  केव्स बनाये गएँ हैं। जिन में से एक चैतनग्रह और बाकी १५ विहारस कहलातें हैं। चैतनग्रह प्रेयर करने की जगह है जो एक स्तूपा एक बड़े हाल के किनारे ,दोनों जानिब बड़े बड़े सत्मभों से सजाया गया है।स्तम्भ भी ख़ूबसूरत मूर्तियों से सजे हैं। हॉल में इंट्री पर खूबसूरत दालान हैं जो ख़ूबसूरत मेहराबों से सजे हैं , बड़े बड़े  हाथियों  को दालान की दोनों जानिब  सलीके से पत्थरों में तराश के बनाया गया है। ये हीनयान ,महायान सेक्ट बुद्धिस्ट की यादगार हैं। १५ विहारस केव्स भक्तों और बाहर से आने वालों के लिए छोटे छोटे रूम्स की शक्ल में बने हैं।  पत्थर से बने बेड्स , जिन पर लेट कर लोग आराम करतें होंगे। ये १५ केव्स काफी ऊंचाई २ मंज़िल इमारत की शक्ल में बने हैं। पहुचने के लिए पत्थरों की सीढ़ियां भी बनी हैं। Archeological Survey Of India की दी मालूमात से पता चलता है के ये केव्स 1st और 6 AD के दरमियान बनाये गएँ हैं। और इन केव्स को बनाने में बनारस ,नालासोपारा , मराठी प्रिन्स और monks की माली मदद और कोशिश शामिल हैं। 
          पत्थर सुलग रहें थे कोई नक़्श पा (पैर का निशान ) न था
    ६ सदियों तक लगातार काम करने वाले ,कई generations इस काम को करते करते ख़त्म होगयी होंगी। न मॉडर्न ज़माने के क्रेन थे ने मशीने , छीनी  हथोड़ों से पत्थरों की चटानों को काट कर उन में दिल धड़काने वाले  ये आर्टिसंस ये मेमार कितनी मुशक्त ,जाफिशानी से उन लोगों ने काम किया होंगा । क्या पाकीज़ा माहौल बनता होंगा ,जब बुद्ध भिकशू इन मोहबत ,मेहनत ,जिगर का लहू करने वालों की प्रेयर रूम में स्तुपा के इर्द गिर्द खुश्बूं से महकते माहौल में ऊपर वाले की याद में डूब जाते होंगें। यकीनकन उनेह उस रब ,God ,प्रमेश्वर की कुर्बत ,नज़दीकी हासिल होंगी।
     कुछ इस तरह तै की है हम ने अपनी मंज़िलें
     गिर पड़े ,गिर के उठे ,उठ के चले
   आज के मॉडर्न ज़माने के हम लोग कार्ला केव्स तक पहुचने का आधा सफर कर से पूरा किया। ५० मीटर १५० सीढ़ियां चढ़ते चढ़ते पसीना निकल गया। हर कदम पर cold drinks ,छाछ ,मिठाई और ठंडे पानी की दुकाने थी। चंद  कदम चल दुकान वालों से पूँछतें "कितनी सीढ़ियां और बाकी है " गिरते पड़ते ऊपर पहुंचें। कुछ नवजवान केव्स  देख मायूस हुवे। हवा में जुमला उछाल दिया " खोदा पहाड़ निकला चूहा "  साहब ,बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद। हम एयर कंडीशनों में रहने  और सफर करने वाले ,नर्म गद्दों पर सोने वाले क्या उन लोगों की तकलीफ का अहसास कर सकतें हैं ,  पूर्वज जो पथरों पर सोतें ,मौसमों की सख्त सर्दियाँ ,गर्मियां और बारिशें झेल कर ६ सदियाँ पहाड़ों का सीना  चीर कर आने वाली नस्ल के लिए अनमिट यादगारें,निशाँ  छोड़ गएँ।

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

Modern day Hatim Tai









मॉडर्न डे हातिम ताई



उसे नहीं अभी अपने कद का अंदाजा
वो आसमान है मगर सर झुका  के चलता है

मैं एक एैसे शख्स की बात कर रहा हूँ जिसमें हिंदुस्तानी संस्कृति की झलक दिखाई पड़ती है।  दर्दमंद दिल, लोगों को दावत पर बुला कर, खिला पिला कर खुश हो लेने का जज़्बा, हमारे मंसूर झेटाम, इश्तेयाक खान , औसाफ़ उस्मानी, सुनील हॉनराव, सुनील कूड़ेकर, हामिद ख़ानजायादा , इमरान इनामदार और फ़ारूकूज़्ज़मान साहेब में अक्सर इस बात पर डिस्कशन होती है कि ये एैसा शख्स है जो १०० लोगों की दावत करता है, लेकिन इस  में इतनी बरकत होजाती है कि १५० लोगों के दावत का मज़ा लेने के बाद भी खाना बच जाता है। आप लोग समझ गए होंगे मैं जिस हस्ती का ज़िक्र कर रहा हूँ उसे लोग "कमल मल्होत्रा " के नाम से जानते हैं।

हातिम ताई मुस्लिम हिस्ट्री में एक एैसा मशहूर शख्स गुज़रा है जिस से ज़यादा मेहमान नवाज़ शायद ही कोई हुआ हो। इसीलिए हमारे कमल भाई को मैं ने मॉडर्न डे हातिम ताई के ख़िताब से नवाजा है। दुनिया अगर एक हाथ से देती है , तो दूसरे हाथ से लेने के लिए तैयार रहती है। हर काम के पीछे कोई मक़सद होता है। कमल मल्होत्रा दोनों हाथों से देतें हैं ,किसी मक़सद के बग़ैर।" नेकी कर और भुल जा " कहावत उन पर फिट आती है।

मशहूर उर्दू शायर ग़ालिब ने कमल साहब जैसे लोगों के लिए कहा है।

न सताईश की तमन्ना न सिले की परवाह
(आइ एम नॉट बॉदर्ड अबाउट प्रेज़ नॉर आइ एक्सपेक्ट एनी रिवॉर्ड)

कुछ महीनों पहले कमल मल्होत्रा ने नेरुल में जगह जगह प्रोग्राम करके एन एम एम सी सफाई कर्मचारियों  को इनामात से नवाजा। कौन भला आज के ज़माने में इन लोगों को याद करता है।  ईद के मौके पर नमाज़ बाद तमाम मुस्लिम भाईयों  को फूल ,मिठाई और कोल्ड ड्रिंक्स अपने हाथों से डिसट्रिब्यूट किये। नवरात्रि हो ,के होली, के दिवाली, के लोहड़ी,  के गणपति ये सिलसिला उन की जानिब से चलता रहता है। और वह हर जगह मौजूद होतें है। कुछ लोग उन्हें किसी पोलिटिकल पार्टी से जुड़ा हुआ समझते हैं और कुछ लोग इलेक्शन लड़ने की तैयारी का नाम देते है। हम जानते हैं वह ये काम दिल से ,बिना किसी लालच के करते हैं। हम सब के दिलों में उन की बहुत इज़्ज़त है। उन का एक उसूल है " खुलूस ,खुलूस, खुलूस "। 

किसी शायर ने कहा है,
वह उनका काम है अहले सियासत जानें
मेरा पयाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे

कमल साहब ईसी तरह महफ़िलें जमाते रहें। आप भले ही नॉन वेज नहीं खाते हों लेकिन अपने नॉन वेज जोक्स से महफ़िल को लोट पोट ज़रूर कर देते हैं ,और आप के ठुमकों के क्या कहने।  आप की तंदुरस्ती औ लंबी उम्र के लिए हम सब दुआ करतें हैं।



Written By,
Janab Raghib Ahmed Shaikh