गुरुवार, 8 जुलाई 2021

राशिद अली युसूफ अली

                                               मौत तो वो है जिस पे ज़माना करे अफ़सोस                     

                                                                 



तारीखे पैदाइश : ०१/०४/१९६४  मुक़ाम :जलगांव  इंतेक़ाल : ३ जून २०२१ ,२२  ज़ूल क़दा १४४२  रात ११:३० बजे , तद्फीन :४ जून  इतवार  जलगांव (बड़ा क़ब्रस्तान ) सुबह ११:३० बजे 

                                                       तुम से बिछड़ा हूँ  तो सीने में उतर आया है 

                                                       ऐसा सन्नाटा किसी पेड़ का पत्ता न हिले 

किसी शहर की अहमियत वहां मुक़ीम लोगों से होती है। फिर ये होता है शहर अपनों से खाली ख़ाली होने लगता है। हर मानूस (जाने पहचाने ) शख्स की जुदायी से एक ख़ला पैदा होजाता है। जलगाँव  मेरा आबाई वतन है कल राशीद अली की मौत की खबर सुन कर यूँ लगा मानो जलगांव मेरे लिए अजनबी होगया हो। जलगांव की दिलकशी मेरे लिए काम होगयी हो।  

                                                     तुम याद आये साथ तुम्हारे, गुज़रे ज़माने याद आये  

   १९७७ /१९७८  में राशिद अली  ७th या ८th  क्लास में था। अब्बा ने उसे बॉम्बे हमारे पास बुलवा लिया। अंजुमने  खैरुल इस्लाम कुर्ला में उसका दाखला करवा दिया। गया। उस् समय हम लोगों का क़याम तिलक नगर चेम्बूर की ८४ नंबर  बिल्डिंग में था। पड़ोस की बिल्डिंग में उसका क्लासमेट शाहिद इरफ़ान रहता था जो अब कुर्ला का मशहूर advocate है,अच्छा शायर और अदीब है । आखरी उम्र तक दोनों की दांत कांटे की दोस्ती रही। राशिद अली की मौत  की खबर उसे सुनाई तो मुझे मैसेज भेजा "अफसोसनाक खबर एक अच्छा दोस्त मुझ से रुखसत हुवा अल्लाह राशिद अली को अपने हबीब के सदके में जन्नत में आला मक़ाम अता करे ,आमीन " 

 फिर हम लोग वाशी रो हाउस में शिफ्ट हो गए। जलगांव में आपा की ग़ुरबत की बिना पर राशिद अली की सही तालीम तरबियत नहीं हो पायी थी। सही तरह से उर्दू में अपना नाम भी नहीं लिख पाता  था। अब्बा के क़दमों में बैठ कर राशिद ने इल्म भी हासिल किया और अब्बा की  टूट कर खिदमत भी की। अब्बा से दुनयावी ,दीनी ,अख़लाक़ी तालीम हासिल की। मुक़ामिल इंसान बन गया। शगुफ्ता मुमानी को भी घरेलु कामो में बेहद मदद करता। वाशी में उसे सब लोग हमारा छोटा भाई समझते। उसने भी हमें उतनी ही इज़्ज़त दी और हमने भी उसे इतना ही प्यार दिया। 

                                                             मोहब्बत के लिए कुछ ख़ास दिल मख़सूस क्यों होंगे ?

पड़ोस में सामंत ब्राह्मण ख़ानदान मुक़ीम था। दीपक सामंत मशहूर architect ईरान से कई साल जॉब करके इंडिया लौटे थे CIDCO में काम करने लगे थे। उनकी अहलिया Sacred Heart स्कूल में टीचर थी। घर पर दो छोटे बच्चें  ओंकर और केदार थे। उन दोनों की राशिदअली निगहदाश्त करता ,दीपक साहेब को नॉन वेज खाने बना  कर खिलता। रशीद अली अपने खुलूस अपनी मोहबत से  उनकी फॅमिली का हिस्सा बन गया। कहा जाता है मोहबत तो वो बेल है जो खुलूस के सहारे परवान चढ़ती है। दीपक  सामंत हर छोटे बड़े कामो में राशीद अली से मश्वरा लिया करते थे, मानो वो उनका क़रीबी दोस्त हो । कल फ़ोन करके दीपक सामंत को राशिद अली की मौत की खबर सुनाई तो उनेह यक़ीन ही नहीं आया , दोनों मिया बीवी बहुत मलूल हुवे। 

                                                             हम  हुवे तुम हुवे के मीर हुवे 

                                                            उसकी जुल्फों के सब असीर हुवे  

बहुत मिकनातीसी  (Magnetic )शख्सियत थी राशीद अली की। लोगो को मोहब्बत के जाल में बांध लेता था। मुश्ताक़ सय्यद मुंबई पासपोर्ट ऑफिस में PRO थे। वो और उनकी अहलिया राशिदअली के गरवीदा थे। वाशी ही में रहते थे। भांजे से ज़ियादा राशिद से मोहब्बत थी। मुश्ताक़ को कही जाना होता राशिद उनके घर जा कर सोता। बाज़ार से सौदा लाता उनके बच्चों को स्कूल छोड़ता। राशिद अली को कुवैत जाने का ऑफर मिला तो पासपोर्ट मुश्ताक़ सय्यद ने ही बनवा के दिया था। जिस दिन राशिद अली की कुवैत रवानगी थी, मुझे याद है  मुश्ताक़ मसरूफियत के बावजूद सहार एयरपोर्ट तक छोड़ने पुहंचा था उस ज़माने में immigration clearance में बड़ी दिक्कत होती थी  ,राशिद को अपने पासपोर्ट ऑफिस के ID पर फ्लाइट तक सवार कर आया था। मुश्ताक़ अहमदनगर शिफ्ट होगया था ,उसकी दावत पर राशिद अली उसकी लड़कियों की शादी  में अहमदनगर जाकर शरीक हुवा था। रशीद अली मौत की खबर सुन कर मुश्ताक़ को बड़ा शॉक लगा। 

वक़्त गुज़रता रहा उस ने SSC पास कर जलगांव लौट कर इलेक्ट्रीशियन का काम सीखा। दादा भाई ने उसे कुवैत 

अपनी फैक्ट्री "Plastic and Packaging Industries " में इलेक्ट्रीशियन के काम के लिए बुलवा लिया। 

                                    यूँ वक़्त के पहिये से बंधा हु यारब 

                                    चाहूँ के न चाहूँ गर्दिश में हु यारब 

     मशीनो के बीच १८ घंटे की ड्यूटी , नाईट शिफ्ट ,२ या ३ साल तक छुट्टियों का इंतज़ार ,खानदान से दूरी। शायद अलग ही मिटटी से बने होते हैं ऐसे अफ़राद। राशिद भी इन में से एक था। कुवैत की कितनी  सख़्त सर्दिया ,गर्मिया बरसातें झेलीं जब कही वो अपने सपनो का घर गणेश कॉलोनी जलगांव में बना पाया। अपनी अम्मी शरीफुन्निसा को हज पर ले जा सका। हादी , उमैर ,सुमन और अपनी अहलिया शाहीन को  ज़िन्दगी की अनमोल खुशीयाँ दे सका। 

एक ऐसा वक़्त भी आया जब सद्दाम हुसैन के कुवैत के हमले के बाद राशिद अली को हिंदुस्तान लौटना पड़ा। फिर हालत मामूल पर आये। फिर वो कुवैत लोटा। १५ साल के लम्बे बनबास के बाद वो हिंदुस्तान लौटा। यहाँ भी उसने छोटी  मोटी इलेक्ट्रिक वर्कशॉप लगा कर अपनी जद्दो जहद जारी रखी। 

उम्र और वक़्त इंसान से उसकी जवानी उसकी ताक़त तो छीन सकते हैं उसके ख्वाब उसकी उमंगें उसकी चाहतें नहीं चीन छीन सकते। 

नाज़िम ने राशिद अली को  दुबई अपनी कंपनी में काम करने बुलाया। वहां कई प्रोजेक्ट उसके साथ मिलकर पुरे किये। मैं ने दुबई विजिट के दौरान उसके साइट पर जा कर मुलाक़ात की थी। लक लक सहराके दरमियान एक लम्बे चौड़े पोल्ट्री फार्म पर वो चंद अफ़राद के साथ इलेक्ट्रीशियन का काम कर रहा था। तब पता चला सहरा की ज़िंदगी कितनी बेलज़्ज़त  बोझल होती है। 

                                                             होशो हवास ताब व ताबां जा चुके हैं दाग़ 

लॉक डाउन से चंद रोज़ पहले राशिद दुबई से ३ साल लगातार काम करके छुट्टियां गुजरने हिंदुस्तान आया था। 

तहसीन की शादी में राशिद अली मुलाक़ात हुवी थी । नहीफ, कमज़ोर ,चेहरे की शादाबी ख़त्म होगयी थी। सेहरा और मशीनो ने उसकी तमाम तवानाई निचोड़ ली थी। जनवरी -२०२१ में उसे फिर से दुबई जाने का मौक़ा मिला था। लेकिन पहली बार ज़िन्दगी में उसे बेयक़ीनी का शिकार होते देखा था। एयर पोर्ट से वापिस अपने घर लौट आया। 

अच्छा हुवा मौत शनासावों के बीच वतन में वाक़े हुयी। आखिर के दो साल फुर्सत से अपने ख़ानदान के बीच तमानियत से गुज़ार कर मौत और तद्फीन के लिए ,दिन इतवार चुना लोगो को छुट्टी न लेना पड़े। 

३० जून बुध के रोज़ में सफर में था। हफ्ते में एक रोज़ ज़रूर मुझ से कॉल करके राशिद बात करता था। उस रोज़ भी मामूल के मुताबिक मुझ से बात की एक जुमला उछाल दिया आज तक कानो में वो जुमला सदाए बाज़ गश्त की तरह गूंज रहा है  "मामू कब जलगांव आरहे हो। "चुपके से मुझे अपनी मौत की खबर सुना दी। कहना चाहता हो "जल्दी से आकर मिल लो ,वक़्त कम बचा है"। अल्लाह राशिद अली को जन्नते फिरदौस में आराम सुकून की ज़िन्दगी आता करे। आमीन सुम्मा आमीन 

                                   रशीद की बचपन की तस्वीर लेफ्ट सुहैल सय्यद राईट रागिब अहमद 

गुरुवार, 27 मई 2021

IBNE BATUTA (Misbah Anjum)

अल्हाज मिस्बाह अंजुम सर 




 नाम :मिस्बाह अंजुम सैफुद्दीन शेख़ 

शरीके हयात : शमीम मिस्बाह अंजुम शैख़ 

तारीख़े पैदाइश :०३/०८/१९४८ 

शहर के अँधेरे को एक चिराग़ काफी है 

सौ चिराग़ जलते हैं एक चिराग़ जलने से 

जनाब मिस्बाह अंजुम ने सैफुद्दीन शेख़ के घर जनम लिया। जनम प्रताप हॉस्पिटल अमलनेर में हुवा। वालेदैन ने बहुत सोच कर नाम रखा मिस्बाह यानि चिराग़ और अंजुम मानी स्टार (सितारा ) दोनों रौशनी बांटते है। ज़िन्दगी भर तालीम की रौशनी अपने स्टुडण्टस में बांटते रहे ,बच्चों की बेहतरीन परवरिश की उनेह भी इल्म की दौलत से माला माला किया। 

मिस्बाह सर का  बचपन जलगांव के शिवजी नगर (पूना फ़ाइल) में गुज़रा। Z .P .School नंबर १३ में 4th तक तालीम हासिल की। स्कूल नंबर १० से फाइनल तक पढ़ाई की,फाइनल में पुरे डिस्ट्रक्ट में पहला मक़ाम हासिल किया । अब तक अपने  मोहतरम उस्ताद उस्मान जनाब को नहीं भूले जिनोह् ने उनकी तालीमी बुनियादो को मज़बूत किया। नेशनल उर्दू स्कूल कल्याण से  १९६५  में मीट्रिक फर्स्ट डिवीज़न में पास किया स्कूल में टॉप किया । उस दौर में इस्माइल युसूफ कॉलेज में एडमिशन मिलाना हर किसी का ख्वाब होता था। कॉलेज में सारी पढ़ाई स्कालरशिप मिला कर की।  सर ने इस्माइल युसूफ कॉलेज से B.Sc का एग्जाम पास किय।  घरेलु  हालत को मद्दे नज़र रखते हुवे फ़ारुक़ सत्तार उमर भाई बॉयज स्कूल में साइंस मैथ्स जैसे मुश्किल सब्जेक्ट्स को सिखाने का बेडा उठाया। स्कूल से उनेह B.Ed  करने का मौका दिया गया ,साधना इंस्टिट्यूट से B.Ed  किया । २००६ तक स्कूल के  बच्चों का मुस्तकबिल सवारते रहे। बेशुमार क़ौम के बच्चे  इंजीनियर ,डॉक्टर ,पॉलिटिशियन , वकील ,जज  हर field में उनकी तरबियत से बने हैं । स्कूल के प्रिंसिपल की पोस्ट से  ऑगस्ट २००६ में फ़ख़र से रिटायर हुए। 

क्यों डरे ज़िन्दगी में क्या होंगा   कुछ न होंगे तो तजुर्बा होंगा 

मिस्बाह सर ने इस दौरान IIT का एंट्रेंस टेस्ट भी दिया। C.C Shroff  से एक साल का Diploma in Industrial Research and Management (Chemistry ) कोर्स भी किया। अपने knowledge को  हमेशा update करते रहे। Garware Institute से COBOL ,Computer Analysis का कोर्स  भी किया।  अल्हम्दोलीलाह knowledge अपडेट होने की वजह से बच्चों की रहनुमाई में उनेह आसानी हुवी। 

 रोचा खुशबूदार घास से खुशबु बनाने का हुनर सीखने के लिए कश्मीर तक का सफर किया । princess street के चक्कर काटे। लेकिन हर चीज़ के लिए ज़रूरी होता है सरमाया। खैर जो हुवा बेहतर हुवा वरना हम एक बेहतरीन उस्ताद की खिदमात से महरूम होजाते। 

खिज़ा में फूल  खिलाने का है जूनून अलग 

मिस्बाह सर ने अपने बच्चोँ की तालीम उनकी शादियों की ज़िम्मेदारी से निपटने के बाद २००७ साल से फॅमिली ट्री बनाने के मिशन को जूनून की तरह अपनाया। कोलंबस की तरह हर गांव हर शहर में  जहां रिश्तेदार बसे हैं घर घर जा कर मालूमात हासिल की। रिश्तेदारों की शादी में शरीक होते, मै ने देखा है वह अपने दफ्तर के साथ तशरीफ़ लाते । इबने बतूता की तरह अपने इस family tree की आबयारी की अपने खून पसीने से सींचा ,मुझे यक़ीन है एहतेशाम ,फैसल ,डॉ सलमान ,रेहान ,मुनज़्ज़ा और फरहा से भी उनोहने मदद ली होंगी । मुझे लगता है वो रिकॉर्ड में इंट्री करते समय बावज़ू होकर जानमाज़ पर बैठ कर पूरी यकसूई से इंद्राज (entry )करते होंगे के कोई ग़लती न होजाये। १३  साल की कड़ी लगन ,जान फिशनी के बाद जो नतीजा आया उनोहने एक तारीख़ रक़म (लिखना ) कर दी,ये एक संग मील की हैसियत रखता है ।  ख़ानदान के  हर बुज़ुर्ग की मालूमात इस में मौजूद है। सदियों उनके कारनामे को रिश्तेदारों में याद किया जाएंगे। शायद किसी शायर उनिहि के लिए कहा है 

मेरे जूनून का नतीजा ज़रूर निकलेगा 

इसी सियाह (black ) समंदर से नूर निकलेगा 

इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हमने 

उनकी औलाद कनाडा ,बहरीन ,इंग्लैंड ,रूरकी ,नाला सुपरा ,बेंगलोरे में क़याम पज़ीर है। हज करने के बाद सुकून हासिल हुवा तो सैय्याह (Turist ) की तरह अपने पोतो ,पोतिया,नवासे निवासियों से मिलने के लिए निकल पड़ते हैं। हर जगह ज़हन में रिश्तेदारों की फलाह के लिए स्कीमें बनाते रहते है। 

अल्लाह मिस्बाह सर को सेहत के साथ हयाते ख़िदर आता करे। उनका साया हम पर क़ायम रखे।  आमीन सुम्मा आमीन। 

जहाँ रहे वो खैरियत के साथ रहे 

 उठाये हाथ तो एक दुआ याद आयी 



शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

हाजी( स्वतंत्र सेनानी )क़मरुद्दीन मुंशी


मरहूम हाजी क़मरुद्दीन मुंशी 

मरहूम हाजी क़मरुद्दीन अवार्ड लेते हुवे 

हज को जाते  हाजी क़मरुद्दीन मुंशी और हज्जन अहलिया रज़िया बेगम 


मरहूम क़मरुद्दीन अपने पोते पोती नवासे नवासी के दरमियान 

सुहिला ,मरहूमा रज़िया बेगम,तारिक़ ,मरहूम क़मरुद्दीन मुंशी ,समीना 

हाजी क़मरुद्दीन मुंशी -पैदाइश :1st May 1921 (यावल ) तारीखे वफ़ात :24th July 2007 (नवापुर )

आने वाली नस्लें तुम पर फख्र करेंगी हम असरो 
जब भी उन को ध्यान आयेगा हम ने मुंशी को देखा था 
आज जिस शख्स का ज़िक़रे खैर हो रहा है मैं ने उनेह जिंदगी में उनेह देखा हूँ ,उनसे बातें की हैं ,उनके साथ खाने में शरीक हुवा हूँ। में बे हद खुश नसीब हूँ मेरे शगुफ्ता के साथ निकाह में उनोहने वकील बन कर निक़ाह नामे  पर  दस्तखत किये है। मेरी मुराद अल्हाज Freedom Fighter क़मरुद्दीन मुंशी  से है। 
खुदा बख्शे बहुत सी खूबियां थी मरने वाले में 
मरहूम हाजी कमरुद्दीन मुंशी ने आज से सव (100 ) साल पहले यावल में आज ही के दिन (1st May 1921 ) मोजोद्दिन के घर जनम लिया। वालिद मारूफ शख्सियत थे पेशे से इंजीनियर थे। औलाद की तालीम पर खुसूसी तवज्जे दी। मुझे यक़ीन है  अपने बड़े भाई मरहूम वजीहोद्दीन की तरह ,मरहूम क़मरुद्दीन ने  भी यावल की मशहूर convent school Sim Cox English school से ही स्कूलिंग किया होंगा। 
अक़ाबि रूह जब पैदा होती है नौजवानो में 
नज़र आती है मंज़िल उनको अपनी आसमानो में 
इस्माइल युसूफ कॉलेज जोगेशवरी से मरहूम ने graduation किया। खेलने का शौक़ था अपनी लम्बे क़द का भरपूर फायदा उठाया । कॉलेज के ज़माने  में बेहतरीन वॉलीबॉल और हॉकी के खिलाडी होने का शरफ़ मरहूम क़मरुद्दीन मुंशी को हासिल था। यूनिवर्सिटी मुक़ाबलों में कॉलेज को represent किया। गन शूटिंग में मरहूम को महारत हासिल थी। एक हाथ से भी निशाना बाज़ी का फ़न मरहूम जानते थे। 
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है 
आज़ादी की लड़ाई अपने उरूज पर थी। गर्म खून ,उमंगें जवान थी ,मरहूम क़मरुद्दीन मुंशी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फ़ौज (INA ) में शामिल हुवे। मधु लिमये ,जॉर्ज फर्नांडिस से दोस्ताना ताल्लुक़ात रहे। ज़िन्दगी अपने उसूलों पर खुद्दारी से जी ,कभी न freedom fighter की पेंशन हासिल  करने के लिए कोशिश की न अपने पुराने ताल्लुक़ात का फायदा उठाया। सिर्फ अपने मकान (646 ,साहकार नगर ,चेम्बूर ) के बाहेर अपनी name plate पर अपने नाम के साथ स्वतंत्रता सेनानी लिखवाया था। शायद वो अब्दुल कलाम आज़ाद के इस क़ौल पर यक़ीन रखते थे के  (Character  will give you respect )
मेरे जूनू का नतीजा ज़रूर निकलेगा 
मरहूम क़मरुद्दीन मुंशी ने १९४५ में Prohibition and Excise Department में Thane  शहर  से जमादार की पोस्ट से शुरुवात की। जलगांव ,कल्याण ,कोल्हपुर महाराष्ट्र में पोस्टिंग मिली। अपनी काबिलियत पर उनेह पूरा यक़ीन था ,यहाँ तक के महाराष्ट्र के चीफ मिनिस्टर वसंत दादा पाटिल ,अपने बंगले वर्षा पर उनेह बुलाया करते ,उनसे मश्वरा करते । रिटायरमेंट के बाद department ने उनकी मालूमात का फायदा उठाया। अपनी मेहनत ,लगन और ईमानदारी से  १९७९ में Senior Inspector के rank तक पहुंचने के बाद मरहूम ने retirement ली और चेम्बूर के मकान में रिहाइश इख़्तियार की।  खुश नसीब रहे १९८६  में अल्लाह के मेहमान बने ,अपनी बेगम के साथ हज का सफर किया। 
A  mirror reflect man`s face but what he is really like, is shown by the kind of friends he choose . 
मरहूम यार बाश थे फिल्म स्टार रेहमान ,प्राण से क़रीबी ताल्लुक़ात थे और मीना कुमारी से भी जान पहचान थी।फिल्म स्टार रेहमान से उनकी गाडी छनती थी।  मरहूम शतरंज के माहिर खिलाडी थे ,रेहमान को भी शतरंज  का शौक़ था  दोनों रेहमान के घर शतरंज की बाज़ी जमाते ,फिर रेहमान उनेह  खुद अपनी निजी कार में चेम्बूर के घर तक छोड़ जाते।  हिंदुस्तानी क्रिकेट टीम के कप्तान अजित वाडेकर से उनका याराना था ,अजित वाडेकर ने उनेह ब्रीफ केस तोहफे में पेश की थी खूबसूरत यादगार के तौर पर ख़ज़ाने की तरह मरहूम ने कई साल संभाल से कर रखा था। 
कहाँ बच कर चली ऐ फसले गुल मुझ अबला प् से 
मेरे पैरो की गुलकारी बियाबान से चमन तक है 
कुछ हस्तियां ज़माना साज़ होती है वक़्त से पहले पैदा होजाती है ,अपना क़द इतना बढ़ा लेती है उन के सामने हर कोई अपने आप को बोना महसूस करने लगता है। मरहूम हाजी क़मरुद्दीन मुंशी उनमे से एक थे। सोने पे सुहागा उनेह शरीक हयात रज़िया बेगम भी उनिह की हम ख्याल थी। दोनों में बहुत मोहब्बत थी। मेहमानो से हमेशा घर भरा होता ,मुहतरमा के माथे पर शिकन नहीं आती। खुलूस से खिदमत में लगी रहती। मरहूम  ने बहुत से करीबी रिश्तेदारों को रोज़गार दिलवाया , अपने छोटे भाई हसिनोददीन मुंशी को ग्रेजुएशन के बाद मफ़तलाल कंपनी में जॉब दिलवाया था। ज़ैनुद्दीन सय्यद ने उनके घर रहकर मेट्रिक पास किया था। ऐसी कई  और मिसाले हैं। 
मरहूम ज़बान के बड़े पक्के वाक़े हुवे थे अपनी बड़ी बहन खुर्शीद जिसने शादी के बाद पाकिस्तानी शहरियत हासिल कर ली थी उनसे माँ की तरह मोहब्बत थी ,उनसे वादा किया था के उनसे मिलने पाकिस्तान ज़रूर आएंगे। रिटायरमेंट के फ़ौरन बाद अपनी अहिलिया के साथ पाकिस्तान का सफर किया बहन से मुलाक़ात की अपना वादा निभाया। 
मरहूम कमरुद्दीन मुंशी साहब को मुसलमानो में तालीम की कमी का शिद्दत से अहसास था।  मूसलीम  लड़कियों की तालीम और तर्रकी की वो दिल से कायल थे। उनकी दिली ख्वाहिश थी के उनके ख़ानदान के बच्चे  पढ़े और बे इन्तहा तर्रकी हासिल करे। अपनी पोती सीमा से उनेह बहुत उम्मीदें वाबिस्ता थी , और उसने भी उनेह मायूस नहीं किया। होम साइंस में ग्रेजुएशन किया  साथ साथ ,इंटीरियर डेकोरेशन भी किया। 
कभी किसी ने रंग व बू को पकड़ा है 
शफ़क़ को क़ैद में रखा हवा को बंद किया 
अपनी अम्मी के इंतेक़ाल के वक़्त मैं  ९ साल का था। माँ की कमी जिन हस्तियों ने पूरी की मुझ पर ममता को नौछाव्र किया अदीबुन्निसा ,सरीफुन्निसा (बहने ) , आसिया बेगम (मुमानी), रज़िया बेगम ( ख़ाला )और टेना (ख़ाला ) बतौर ख़ास रही हैं। इन लोगों की मुहबतें ,इनायतें ,करम कभी नहीं भूल सकता। 
१९७१ में जलगाव् से मीट्रिक करने के बाद महतरम सादिक़ भाई ने मुझे मुंबई बुलवा कर सोमैया कॉलेज में साइंस में दाख़िल करवा कर ,सब से पहले पहले मरहूम अल्हाज क़मरुद्दीन मुंशी के घर ले गए। कुछ वाक़ेआत ज़हन पर नक़्श होजाते हैं  ,भुलाना चाहे तो भी भूल नहीं सकता। मक़ान के बाहेर सुहिला और समीना छोटी साइकिल पर खेल रही थी (अब दोनों पोतो ,पोतिया ,नवासे नवासी वाली होगयी है )। इस घर से ऐसी निस्बत हुवी दो छोटी बहने मिली ,सज्जाद तारिक़ और ज़ाकिरा भाभी जैसी दो बामुर्रवत बाअख़लाक़ शख्सियतों से तार्रुफ़ हुवा ,रज़िया ख़ाला क़मरुद्दीन मुंशी जैसी बावक़ार शख्सियतों का प्यार मिला। ये घर मेरे और सादिक़ भाई के लिए नखलिस्तान (Oasis ) की हैसियत रखता था। जब भी जली रोटियों ,अध् पकी सब्ज़ियों के खाने से तंग आजाते, उनके घर पहुँच जाते। ईद ,मुहर्रम ,नियाज़ में उनके घर  दावत होती। ये मामला मेरे सादिक़ भाई के साथ ही नहीं था बल्कि हर किसी के साथ था । पहले में रज़िया खाला का भांजा हुवा करता था ,शगुफ्ता से शादी के बाद मुझे दुहरा शरफ़ हासिल हुवा ,में उनका दामाद भी बन गया। 
अजीब इत्तेफ़ाक़ था के सादिक़ भाई के इंतेक़ाल की खबर में तारिक़ भाईजान तक न पहुंचा सका कुछ रोज़ बाद उनेह खबर मिली।  भाईजान मिले गले लगाया ,मिज़ाज पुरसी की एक जुमला जिस में  न शिकायत थी न सरज़निश  "रागिब दादाभाई के इंतेक़ाल पर तुम मुझे कैसे भूल सकते हो  " ये होते है आला खानदान वालों के अख़लाक़। तारिक़ भाईजान ने नेरुल ही  में घर खरीद कर रिहाइश इख़्तियार कर ली है। नेरुल जुमा मस्जिद में  उनसे और खालिद से मुलाक़ातें होती रहती है। शफ़क़त से पूछते हैं "कैसे हो " अल्लाह उनेह हमारे सर पर सलामत रखे आमीन।
लोग अच्छे हैं बहुत दिल में उतर जाते हैं 
एक बुराई है तो बस ये है के मर जाते हैं 
मरहूम अल्हाज क़मरुद्दीन मुंशी की Planning का में हमेशा क़ायल रहा हूँ। Second home  का जिस वक़्त concept भी नहीं था मरहूम ने नवापुर ताई वाडा मोहल्ले में पुर सुकून माहौल में खूबसूरत बांग्ला नुमा घर खरीदा था। घर से १ किलोमीटर दुरी पर फार्म हाउस था जहाँ  AWIS Poultry Farm भी बनाया था। अपनी अहलिया रज़िया बेगम के इंतेक़ाल के चंद सालों बाद इसी पुऱ सुकूं माहौल में 24th July 2007 को आखरी सांस ली नवापुर के बड़े क़ब्रस्तान में अपनी अहलिया रज़िया बेगम और क़रीबी रिश्तेदारों के बीच आराम फरमा हैं। अल्लाह मरहूम को अपनी जवारे रहमत में आफ़ियत के साथ जगह अता फरमाए आमीन सुम्मा आमीन।  




सोमवार, 12 अप्रैल 2021

खुशबु जैसे लोग मिले

हसीनोद्दिन मुंशी अपनी जवानी में 
हसीनोद्दिन मुंशी की हालिया तस्वीर 


अपनी अहलिया शाहिना बेगम के साथ 

हसीनोद्दिन मुंशी की शादी का दावत नामा 

हसीनोद्दिन मोज़ोद्दिन मुंशी 

तारीखे पैदाइश :२७/१२/१९३० , मुक़ाम :मोहल्ला कसार चौड़ी (यावल )
मुझे हमेश से लोगों की Biography (life history ) पढ़ने में दिचस्पी रही है। मोहम्मद रसूल अल्लाह की सवाने हयात "दुर्रे यतीम " पढ़ कर कई दिन तक रोता रहा था। विंग्स ऑफ़  फायर डॉ अब्दुल कलाम  आज़ाद की कहानी भी दिलचस्पी से कम नहीं। तुज़के बाबरी ,हुमायूँ अकबर की ज़िंदगिया भी हैरत अंगेज़ क़िस्सों से भरी है।  हर इंसान की ज़िन्दगी से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है। कुछ साहबान की ज़िन्दगी हैरत अंगेज़ होती है। 
You don't grow old . You get old by not growing " (Deepak Chopra) 
मौत क्या है थकन ख्यालों की 
ज़िन्दगी क्या है दम ब दम चलना 
जनाब हसीन मुंशी ज़िन्दगी की ९० बहारें ,खिज़ायें और बरससातें देख  चुके हैं। दूसरी world war ,आज़ादी की जद्दो जहद ,चीन हिंदुस्तान की जंग ,पाकिस्तान से दो wars और अब इस उमर में करोना  का क़हर अपनी खुली आँखों से देख रहे हैं। इंसान  वोही  है जो न माज़ी की तल्ख़ीयों को याद रखे ,न मुस्तक़बिल के अंदेशों से खौफज़दा (भयभीत ) हो। कामयाब ज़िन्दगी वही जी सकता है जो हाल (present )में जीता हो। 
 मोहतरम हसीन मुंशी साहब एक मिसाल है।  ९० साला उमर में तहज्जुद भी मस्जिद  में अदा करते है ,पंज वक़्ता नमाज़े भी बाकायदगी से बाजमाअत मस्जिद में अदा होती है। अपने आप को अपडेट रखने के लिए अंग्रेजी अख़बार पढ़ते है। स्मार्ट फ़ोन   को भी मौसूफ़ चाबुक दस्ती से use कर सकते है। उनकी मुसबित (positive ) सोच है जो ज़िन्दगी से हार न मानने में मददगार साबित हो  रही है। 
वालिद मोजोद्दिन पेशे से इंजीनियर थे ,सुना है जर्मनी भी अपने काम के सिलसिले में जाना  हुवा था। शायद वालिद से बहुत सी खूबिया इन्हे वर्से में मिली है। 
 Confidence and hard work is the best medicine to kill the disease called failure .It will make us a successful person (APJ Abdul Kalaam )
 हसीन मुंशी  साहेब ने ज़िन्दगी में जो भी किया  confidence आन ,बान शान से किया और उसे तकमील तक पुह्चाया । उनकी हर बात में  एक रख रखाव,सलीका ,आला मेयार  दिखाई देता है। आज़ादी से पहले यावल की SIMCOCK convent school से तालीम का सिलसिला शुरू किया था । मेट्रिक के बाद जोगेश्वरी के मशहूर इस्माइल युसूफ कॉलेज से हॉस्टल में रह कर B.A  की डिग्री मुंबई यूनिवर्सिटी से हासिल की । आज भी उनेह अपने कॉलेज के प्रिंसिपल बनेर्जी साहब का नाम याद है। उर्दू टीचर नक़वी ,अरबी टीचर नदवी साहब।  कॉलेज Volleyball  टीम के कप्तान थे ,यूनिवर्सिटी तक अपनी कॉलेज  की Volleyball टीम की नुमायन्दगी की। ख़ूबरू तो थे ही ,तवील कद (Tall ), सफ़ेद रंग ,बाल बनाने के अपना अंदाज़ था। मुझे लगता है देव आनंद ने मुंशी साहब की हेयर स्टाइल फिल्मो में अपनायी थी। 
कोशिश भी कर ,उम्मीद भी रख ,रास्ता भी चुन 
फिर उसके बाद थोड़ा मुक़्क़दर तलाश कर 
 १९५४ /१९५५  में B.A  की तालीम पूरी करने के बाद।,मौसूफ़ हसीन मुंशी साहब ने अपनी काबिलियत की बिना पर १९५६ में मशहूर कंपनी मफतलाल  इंजीनियरिंग  में Quality  control  department में  ज्वाइन किया , और १९८६/१९८७  तक इसी कंपनी से जुड़े रहे । १९५७ में शाहिना बेगम  ( एस. नूरबेगम )से शादी  हुवी ,इस का सुबूत उनकी  शादी का कार्ड भी शामिल है। मौसूफ़ ने अपनी लड़कियों  ज़रीना ,तहमीना ,सबीना,  रुबीना और फेहमीना को अच्छी तालीम दिलवाई ,मारूफ घरानो में शादी करवाई। अपने फ़रज़न्द इरफ़ान आलम को गुलबर्गा कॉलेज से फार्मेसी की तालीम दिलवाई ,मेडिकल स्टोर कारोबार  शुरू करवा के कई सालों तक उसके साथ शरीक रहे। अल्लाह ने उनेह अपनी अहलिया के साथ हज की सआदत भी नसीब की। 
जहाँ रहे वो खैरियत के साथ रहे 
उठाये हाथ तो एक दुआ याद आयी 
 




गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

शकील अहमद ज़ियावद्दिन सैय्यद

मरहूम शकील अहमद सैय्यद 
मरहूम शकील एक प्रोग्राम में 

क्या लोग थे जो रहे वफ़ा से गुज़र गए 
दिल चाहता है नक़्शे क़दम चूमते चले 

मरहूम शकील अहमद तारीखे पैदाइश :22nd Feb 1960 वफ़ात :27 March 2021 (13 शाबान 1442 ) नवापुर के शहरे ख़मोशा (बड़े कबरस्तान ) में नया इज़ाफ़ा हुवा  ,शकील अहमद भी हम सब को छोड़ कर अपने चाचाओं ,बड़े अब्बा बड़ी अम्मी  और अपने अब्बा ,अम्मी के दरमियाँ पहुँच गए।

 तुम्हारे चले जाने से एक ख़ला (vacuum )  होगया है  जिस का अज़ाला भरपाई नामुमकिन है।  

निक़हत  के से साथ ३५ साला लम्बा अरसा गुज़ार कर तुम उसे तन्हा छोड़ गए   ,फैज़ान की खुशिया चली गयी ,नवासे पोतो के सर से शफ़क़त उठ गयी ,सादिया व  नौशीन ने अज़ीज़ वालिद खोया ,नाहिद ,नाज़ेरा ,ज़ाकिर ,ज़की ,शफ़ीक़ ने अपने हरदिलअजीज भाई शकील दादा की क़ुरबते रफ़ाक़ते खोयी। ईमान वाले को रज़ाए इलाही के सामने तस्लीम ख़म करना वाजिब है। हम अल्लाह की तरफ से आये हैं उसी की  तरफ़ लौटने वाले हैं। अगर जन्नत मिल जाये तो ये  सब से बड़ी कामयाबी है।  अजीब इत्तेफ़ाक़ मग़रिब की अज़ान के वक़्त  मरहूम शकील अहमद की रूह क़ज़ा हुवी। गवाहों ने शहादत दी है जिस वेहिकल से उनेह हॉस्पिटल पुह्चाया जा रहा था मरहूम की ज़बान पर तीनो इब्तेदाई कलमों का विरद  ज़ोर शोर से जारी था। हॉस्पिटल पहुंचने पर डॉक्टर को सलाम किया ,वहां बैठे मरीज़ों की खैरियत पूँछी ,बाद में अपने अपनी जेबे तलाशने लगे। किसी  ने पूछा क्या तलाश कर रहे हो कहा" तस्बीह"। फिर किसी साथी ने लकड़ी की तस्बीह हदिया की तो मरहूम मसरूर हुवे , तब्बसुम के साथ दुआ दी।पहली निशानी  मरहूम शकील की जन्नती/शहीद  होने की हमेशा ज़बान अल्लाह की  याद से भीगी रहती है। माशाल्लाह मरहूम आखरी वक़्त तक अल्लाह के ज़िक्र में मसरूफ रहे ,मुस्कुराते रूह कब्ज़ हुवी। 

जान दी,दी हुवी उसी की थी 

हक़ तो ये है के हक़ अदा न हुवा 

मरहूम शकील ने  सौरूप सिंह नायक कॉलेज नवापुर से B.A तक तालीम हासिल की थी ,मगर पेशा अपनाया  (नबी S.A.S का  )  यानि कारोबार (business )  , मरहूम ने अपने  वालिद  ज़ियावोद्दीन के ज़ेरे साया झामंजर ,भड़भूँजा में ईमानदारी,लगन और मेहनत  से दुकानदारी सीखी । फिर  अपने हौसले और हिम्मत से नवापुर के सुनसान /बंजर इलाक़े ,देवल फली में अपना कारोबार शुरू किया। अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त का वादा है ईमानदार ताजिर का अंजाम औलियाओ नेक नामो के साथ होगा। मरहूम ने ज़िन्दगी भर ईमानदारी से तिजारत की ,घर भी मस्जिद के करीब बनाया। 

जन्नती होने की दूसरी निशानी। 

हमने हर गाम पे सजदों के जलाये हैं चराग़ 

अब तेरी राह गुज़र राह गुज़र लगती है 

इस्लामपुरा की मस्जिद में मरहूम शकील अहमद नमाज़ अदा करते थे। अज़ान होते ही मरहूम घर से वज़ू कर के दुकान अल्लाह के हवाले कर मस्जिद रवाना होजाते ,इस्लामपुरा मस्जिद का हर गोशा (कोना ) हश्र में मरहूम के सजदों की इंशाल्लाह गवाही देंगा। अल्लाह रअबुलइज़्ज़त का वादा है ,एक नमाज़ के बाद दूसरी नमाज़ के इंतज़ार में रहने वाले मोमिन को क़यामत में अर्शे के साये में पनाह मिलेंगी। 

मरहूम शकील अहमद की खुश मिज़ाजी की गवाही तमाम नवापुर शहर देता है। चेहरे पर हमेशा मुस्कराहट सजी होती। मुस्कराहट भी इस्लाम  में सदक़ा होती है ,बहुत कम लोगों को ये खुश नसीबी  हासिल होती है। मरहूम क्रिकेट  के शौक़ीन थे ,मैंने उनेह खेलते देखा हूँ। 

 मरहूम ने दोनों बेटियों की शादी मारूफ घराने में कराई। अपने फ़रज़न्द फैज़ान की भी शादी करवाई, कारोबार की ABACD सिखाई किसे पता था इतनी जल्द उस मासूम के कन्धों पर ये ज़िम्मेदारी मुन्तक़िल होजाएंगी। 

उदास छोड़ गया वो हर एक मौसम को 

गुलाब खिलते थे कल जिस के मुस्कुराने से 

मौत बरहक़ है "आज वो कल हमारी बारी है " नवापुर में रिश्तेदारों के बच्चों के  तक़सीम इनामात के प्रोग्राम में उनसे आखरी मुलाक़ात हुवी थी। बहुत नसीहत अमेज़ तक़रीर की थी। इनामात उनके हाथों से तक़सीम किये जाने पर ख़ुशी का इज़हार भी किया था। 

यु तो हर एक को जाना है इस ज़माने से 

मौत तो वो है जिस पे ज़माना करे अफ़सोस 

अल्लाह मरहूम शकील अहमद की मग़फ़िरत करे ,जन्नत में आला मुक़ाम आता करे ,घर के तमाम अफ़राद को सब्र जमील आता करे ,आमीन सुम्मा 


 

 


बुधवार, 24 मार्च 2021

khushbu jaise log mile

खुशबू जैसे लोग मिले 

अल्हाज सय्यद मखदूम अली 


तारीखे पैदाइश : ३० मई १९५४
मखदूम अली ने रमजान अली के घर जन्म लिया था।  लेकिन  उनकी परवरिश उनके मामू जनाब मुरकोबोद्दीन शैख़ के घर जलगाओं में हुयी। 
"If you are born poor, it is not your mistake ,but if you die poor ,its your fault " ( Bill Gates )
जनाब मखदूम अली पर ये कहावत  १०० % सुच साबित होती  है। 
अल्हाज मखदूम अली ने १९६७ में फाइनल का इम्तेहान जिल्ला परिषद् स्कूल नंबर १० जलगांव  से पास किया । उनकी  स्कूल में चरखा कातना  सिखाया  जाता था। चरखा चलाना मुश्किल होता है। यही से मुश्किलात का सामना करने  की आदत हो गयी। 
एंग्लो उर्दू स्कूल जलगाँव से मेट्रिक का इम्तेहान १९७१ में फर्स्ट डिवीज़न में पास किया। जलगांव में अपने मामू  मुराकोबोद्दिन के साथ रहा करते थे ,जो पेशे से auditor हुवा करते।  बचपन में  अम्मी का इंतेक़ाल हो गया था , मुमानी( मुबा )की शफ़्क़तें साथ थी ,दोनों ( मामू  और मुमानी ) ने ,कभी भी माँ बाप की कमी महसूस नहीं होने दी। नाना रियासुद्दीन मशहूर हक़ीम नसीराबाद से मेडिकल अफसर की पोस्ट से रिटायर हुवे थे मखदूम साहब की  ज़हनी तरबियत में , आपने अहम् रोले अदा किया। मेट्रिक में "सेकंड लैंग्वेज सभी साथियों ने पर्शियन ली थी। जनाब  मखदूम  साहेब ने ,दूर अंदेशी दिखाई , रियासती ज़बान मराठी को फौकियत दी। शायद मरहूम इस्माइल सर और मामू मुराकोबद्दीन  ने इस तरफ तवज्जो /रग़बत दिलाई हो। उसी ज़माने से मखदूम अली को मराठी पर उबूर हासिल था जो आज भी है ,और शायद MPSC एग्जाम पास करने में मराठी जानने पर सहूलत भी हुयी।  आज भी क़ौम के बच्चों को मराठी लैंग्वेज की अहमियत का एहसास  दिलाने ,मराठी को आसान बना कर सीखाने ,समझाने का बेडा उठा रखा है ,रिटायरमेंट के बाद भी  दिलों जान से  मौसूफ़ मसरूफ़ है। 
एम्. जे कॉलेज जलगांव से B.COM  करने के बाद पाचोरा में Teaching  की साथ साथ M. COM का 
exam भी पास किया। 
 मेरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा 
ग्रेजुएशन के बाद कुछ अरसा टीचिंग का पेशा इख़्तियार किया। 
MPSC का exam बग़ैर किसी guidance के  पास  करना जुवे शीर निकलने से कम  नहीं मौसूफ़ ने वो  भी कर दिखाया। फिर  महाराष्ट्र गवर्नमेंट से Accounts Officer के ओहदे तक तररकी पा कर जनाब मखदूम अली  रिटायर हुवे। 
हम अपने पैरों में न जाने कितने भॅवर लपेटे हुवे पड़े हैं 
रिटायरमेंट के  बाद लोग चैन की बांसुरी बचाते है।  मखदूम अली साहब ने मुंबई  यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म में डिप्लोमा  किया जो उनका  देरीना ख़्वाब  था। 
मौत क्या है थकन ख्यालों की 
ज़िन्दगी क्या है दम ब दम चलना 
रिश्तेदारी में बच्चों की तालीम की  ग़र्ज़ से इक़रा खानदेश ट्रस्ट की बुनियाद डाली गयी,मखदूम अली को उनकी अहलियत देखते हुए treasurer का ओहदा दिया गया । आप ,आप के फ़रज़न्द इमरान, भाभी यास्मीन ,बहु रुखसार  भी ट्रस्ट के कामों में जान व तन से लगे हैं। अल्लाह जज़ाए खैर आता करे। 
अतनी मसरूफियत के आलावा,आप अपनी हाउसिंग सोसाइटी के सेक्रेटरी भी है। 
कोई बतलादे के एक उम्र का बिछड़ा मेहबूब 
इत्तेफ़ाक़न कही मिल जाये तो क्या कहते हैं ?
१९७१ साल में मीट्रिक का इम्तेहान पास  करने वाली बैच का reunion एंग्लो उर्दू स्कूल जलगांव में २५ दिसंबर २०२१ को जनाब मखदूम अली साहेब की काविशों का नतीजा था । ५० साल  पुराने साथियों को मिलाने का सेहरा उनिहि को जाता है। 
४ सितम्बर २०२२ को जलगांव में  prize distribution Program  जो इक़रा खानदेश फाउंडेशन की जानिब से organize किया गया है ,हाजी मखदूम अली साहब की सदारत में होने जा रहा है। 
अल्लाह ने  फ़रमा बरदार औलाद से नवाज़ा हैं। सीमा बेटी MBA है , बेटा इमरान इंजीनियर है। दोनों आला ओहदों पर फ़ाइज़ हैं। भाभी यास्मीन स्कूल की मुलाज़मत से सुबाकदोष होगयी है। 
 मखदूम अली खानदानी सैयद थे ही ,अल्लाह ने हज की सआदत नसीब करदी ,रुतबा और बुलुंद होगया। 

अल्लाह तमाम खानदाने मखदूम अली पर अपनी  इनायत रखे आमीन सुम्मा आमीन। 


बशीर सैयद  ,रागिब अहमद ,मखदूम अली (धुले तक़सीम इनामात प्रोग्राम )

रविवार, 21 मार्च 2021

रज़ीउद्दीन (खालू जान )


                                       मरहूम अल्हाज रज़ीउद्दीन और अहलिया अकीला बी 

 
L to R मरहूम ग़ुलाम मोहियुद्दीन ,मरहूम अल्हाज रज़ीउद्दीन , जनाब साबिर अली ,मरहूम सईद अहमद ,Adv नियाज़ 
                                                            एक शख्स सारे शहर को वीरान कर गया 
६ दिसंबर २०१३ को  सुबह होलनाक खबर से दोचार हुवा अल्हाज रज़ीउद्दीन इंतेक़ाल कर गए । १३ दिसंबर २०१३ को अल्हाज सादिक़ अहमद इस दुनिया से रुखसत हुवे। २०१४ में अल्हाज सईद अहमद का इन्तेक़ाल  हुवा। अजीब इत्तेफ़ाक़ था तीनो एक दूसरे के बहुत करीब हुवा करते थे। मेरी ज़िन्दगी में इन क़रीबी बुज़र्गों के एक साथ रुखसत होने से एक ख़ला होगया 
                                                    मंज़िल की हो तलाश तो दामन जुनू का थाम 
मरहूम रज़ीउद्दीन रिश्ते में मेरे सगे खालू  थे ,लेकिन में ने कभी बुज़र्ग नहीं समझा। १९७१ में हम दोनों ने एक साथ मेट्रिक का एग्जाम पास किया था। हम दोनों की उम्र में काफी फ़र्क़ था। में हमेशा उनेह अपना क्लास मेट कह कर लोगों से तार्रुफ़  करावाता। वो मुस्करा कर कहते "क्या ग़ज़ब रागिब मिया "  
मरहूम रज़ीउद्दीन इतनी उम्र में भी हमारे वालिद हाजी क़मरुद्दीन से मैथ्स के मुश्किल सवालात समझने एरंडोल से जलगाव आते ,  हालाँकि खुद टीचर थे। अब्बा ट्यूशन पढ़ाते थे। हम बच्चों के साथ बैठ कर सीखने में उनोहने कभी छोटापन महसूस नहीं किया ।  हम दोनों का एक ही सेंटर पर मेट्रिक एग्जाम का नंबर आया।,दोनों ने साथ साथ एग्जाम पास किया ,मुझे अपने से ज़ियादा ,उनके पास होने की ख़ुशी थी, क्यूंकि अक्सर ये होता है ,एक उम्र के बाद जिंदिगी ठहर जाती है ,आदमी ज़द्दो जहद से जी चुराता है।   मरहूम ने एक उम्र के बाद  तालीम का सिलसिला शुरू किया ,तर्रकी हासिल करनी थी, हेड मास्टर बनना था,अपनी लगन ,महनत से मेट्रिक भी पास किया और  अपने हदफ़ ,हेड मास्टर बनने को सच कर दिखया । 
वो इत्र दान सा लेहजा हमारे बुज़र्गों का 
मरहूम को उर्दू पर उबूर (command ) हासिल था। लफ़्ज़ों के तलफ़्फ़ुज़ ,जुमलों की बंदिश दिल चाहता था "वो कहा करे में सुना करू " जब मुंबई से जलगांव आना होता ,उनसे मुलाक़ात करने ज़रूर एरंडोल जाता। बहुत खुश होते।   तरह तरह की dishes तैयार करवा के मेहमान नवाज़ी करते। अजब दिलनवाज़ बातें हुवा करती थी उनकी। 
दिल चाहता था बातों का ये सिलसिला कभी खत्म न हो। 
उनसे जुदा होते वक़्त महसूस होता था। 
तेरी कुर्बत के लम्हे फूल जैसे 
मगर फूलों की उमरें मुख़्तसर हैं 
मरहूम के मिज़ाज में सादगी थी। एक  मर्तबा में ने उनसे कहा घर में टेलीफोन क्यों नहीं लगवा लेते ,फरमाने लगे "एरंडोल में एक मारवड़ी ने घर में टेलीफोन लगवाया उसकी इनकम टैक्स इन्क्वायरी आ गयी। 
मरहूम ने टीचरी के साथ साथ कारोबार भी किया। बड़े बड़े फलों के बाग़ात मियाद पर खरीद लिया करते मुंबई ,नागपुर और राजस्थान तक उनके फ्रूट सप्लाई होते थे। खालिद मिया को अपने साथ रख कर माहिर कारोबारी बना दिया। 
खाला जान अकीला माशाल्लाह हयात है ,अल्लाह सेहत तंदुरुस्ती के साथ लम्बी उम्र अता करे। अल्लाह ने उनेह नर्म दिल अता किया है। जब भी उनसे मुलाक़ात होती है  ,जज़्बाती होजाती है। ढेरों दुवाओं से नवाज़ती है।  नीलोफर भाभी जान ,खालिद ,साजिद ,शाबान सबीना ने ,सग्गे भाई बहनों की तरह उन्सियत ,अपना पन दिया । अल्लाह इसी तरह इन रिश्तों में क़ुरबत ,मोहब्बत बाक़ी रखे। आमीन सुम्मा आमीन।