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| अपनी अहलिया शाहिना बेगम के साथ |
सोमवार, 12 अप्रैल 2021
खुशबु जैसे लोग मिले
गुरुवार, 1 अप्रैल 2021
शकील अहमद ज़ियावद्दिन सैय्यद
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| मरहूम शकील अहमद सैय्यद |
मरहूम शकील अहमद तारीखे पैदाइश :22nd Feb 1960 वफ़ात :27 March 2021 (13 शाबान 1442 ) नवापुर के शहरे ख़मोशा (बड़े कबरस्तान ) में नया इज़ाफ़ा हुवा ,शकील अहमद भी हम सब को छोड़ कर अपने चाचाओं ,बड़े अब्बा बड़ी अम्मी और अपने अब्बा ,अम्मी के दरमियाँ पहुँच गए।
तुम्हारे चले जाने से एक ख़ला (vacuum ) होगया है जिस का अज़ाला भरपाई नामुमकिन है।
निक़हत के से साथ ३५ साला लम्बा अरसा गुज़ार कर तुम उसे तन्हा छोड़ गए ,फैज़ान की खुशिया चली गयी ,नवासे पोतो के सर से शफ़क़त उठ गयी ,सादिया व नौशीन ने अज़ीज़ वालिद खोया ,नाहिद ,नाज़ेरा ,ज़ाकिर ,ज़की ,शफ़ीक़ ने अपने हरदिलअजीज भाई शकील दादा की क़ुरबते रफ़ाक़ते खोयी। ईमान वाले को रज़ाए इलाही के सामने तस्लीम ख़म करना वाजिब है। हम अल्लाह की तरफ से आये हैं उसी की तरफ़ लौटने वाले हैं। अगर जन्नत मिल जाये तो ये सब से बड़ी कामयाबी है। अजीब इत्तेफ़ाक़ मग़रिब की अज़ान के वक़्त मरहूम शकील अहमद की रूह क़ज़ा हुवी। गवाहों ने शहादत दी है जिस वेहिकल से उनेह हॉस्पिटल पुह्चाया जा रहा था मरहूम की ज़बान पर तीनो इब्तेदाई कलमों का विरद ज़ोर शोर से जारी था। हॉस्पिटल पहुंचने पर डॉक्टर को सलाम किया ,वहां बैठे मरीज़ों की खैरियत पूँछी ,बाद में अपने अपनी जेबे तलाशने लगे। किसी ने पूछा क्या तलाश कर रहे हो कहा" तस्बीह"। फिर किसी साथी ने लकड़ी की तस्बीह हदिया की तो मरहूम मसरूर हुवे , तब्बसुम के साथ दुआ दी।पहली निशानी मरहूम शकील की जन्नती/शहीद होने की हमेशा ज़बान अल्लाह की याद से भीगी रहती है। माशाल्लाह मरहूम आखरी वक़्त तक अल्लाह के ज़िक्र में मसरूफ रहे ,मुस्कुराते रूह कब्ज़ हुवी।
जान दी,दी हुवी उसी की थी
हक़ तो ये है के हक़ अदा न हुवा
मरहूम शकील ने सौरूप सिंह नायक कॉलेज नवापुर से B.A तक तालीम हासिल की थी ,मगर पेशा अपनाया (नबी S.A.S का ) यानि कारोबार (business ) , मरहूम ने अपने वालिद ज़ियावोद्दीन के ज़ेरे साया झामंजर ,भड़भूँजा में ईमानदारी,लगन और मेहनत से दुकानदारी सीखी । फिर अपने हौसले और हिम्मत से नवापुर के सुनसान /बंजर इलाक़े ,देवल फली में अपना कारोबार शुरू किया। अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त का वादा है ईमानदार ताजिर का अंजाम औलियाओ नेक नामो के साथ होगा। मरहूम ने ज़िन्दगी भर ईमानदारी से तिजारत की ,घर भी मस्जिद के करीब बनाया।
जन्नती होने की दूसरी निशानी।
हमने हर गाम पे सजदों के जलाये हैं चराग़
अब तेरी राह गुज़र राह गुज़र लगती है
इस्लामपुरा की मस्जिद में मरहूम शकील अहमद नमाज़ अदा करते थे। अज़ान होते ही मरहूम घर से वज़ू कर के दुकान अल्लाह के हवाले कर मस्जिद रवाना होजाते ,इस्लामपुरा मस्जिद का हर गोशा (कोना ) हश्र में मरहूम के सजदों की इंशाल्लाह गवाही देंगा। अल्लाह रअबुलइज़्ज़त का वादा है ,एक नमाज़ के बाद दूसरी नमाज़ के इंतज़ार में रहने वाले मोमिन को क़यामत में अर्शे के साये में पनाह मिलेंगी।
मरहूम शकील अहमद की खुश मिज़ाजी की गवाही तमाम नवापुर शहर देता है। चेहरे पर हमेशा मुस्कराहट सजी होती। मुस्कराहट भी इस्लाम में सदक़ा होती है ,बहुत कम लोगों को ये खुश नसीबी हासिल होती है। मरहूम क्रिकेट के शौक़ीन थे ,मैंने उनेह खेलते देखा हूँ।
मरहूम ने दोनों बेटियों की शादी मारूफ घराने में कराई। अपने फ़रज़न्द फैज़ान की भी शादी करवाई, कारोबार की ABACD सिखाई किसे पता था इतनी जल्द उस मासूम के कन्धों पर ये ज़िम्मेदारी मुन्तक़िल होजाएंगी।
उदास छोड़ गया वो हर एक मौसम को
गुलाब खिलते थे कल जिस के मुस्कुराने से
मौत बरहक़ है "आज वो कल हमारी बारी है " नवापुर में रिश्तेदारों के बच्चों के तक़सीम इनामात के प्रोग्राम में उनसे आखरी मुलाक़ात हुवी थी। बहुत नसीहत अमेज़ तक़रीर की थी। इनामात उनके हाथों से तक़सीम किये जाने पर ख़ुशी का इज़हार भी किया था।
यु तो हर एक को जाना है इस ज़माने से
मौत तो वो है जिस पे ज़माना करे अफ़सोस
अल्लाह मरहूम शकील अहमद की मग़फ़िरत करे ,जन्नत में आला मुक़ाम आता करे ,घर के तमाम अफ़राद को सब्र जमील आता करे ,आमीन सुम्मा
बुधवार, 24 मार्च 2021
khushbu jaise log mile
खुशबू जैसे लोग मिले
अल्हाज सय्यद मखदूम अली
तारीखे पैदाइश : ३० मई १९५४
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| बशीर सैयद ,रागिब अहमद ,मखदूम अली (धुले तक़सीम इनामात प्रोग्राम ) |
रविवार, 21 मार्च 2021
रज़ीउद्दीन (खालू जान )
मरहूम अल्हाज रज़ीउद्दीन और अहलिया अकीला बी
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| L to R मरहूम ग़ुलाम मोहियुद्दीन ,मरहूम अल्हाज रज़ीउद्दीन , जनाब साबिर अली ,मरहूम सईद अहमद ,Adv नियाज़ |
शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021
शादी खाना आबादी
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| समिर व तहसीन |
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| नसरीन ,शगुफ्ता ,रागिब अहमद ,बशीर सय्यद ,इरफ़ान सैयद |
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| रागिब अहमद ,समीर ,तहसीन ,शगुफ्ता |
बुधवार, 17 फ़रवरी 2021
खुश्बू जैसे लोग मिले
सोमवार, 4 जनवरी 2021
GHULAAM MOHIYODDIN SAYYED
मौत से किसको रस्त्गारी है
आज वो कल हमारी बारी है
अक्सर नवापुर में लोगों के नाम के साथ उर्फियत लगी नज़र आती है। अच्छे भले नाम की मट्टी पलीद कर दी जाती है। मरहूम ग़ुलाम मोहियुद्दीन सय्यद को अच्छा हुवा,अपने सही नाम से ज़िन्दगी भर जाना गया। मरहूम रिश्ते में सगे मामू होते है। बचपन में ही हमारी वालिदा बिस्मिल्ला का इंतेक़ाल होगया था। हम सब भाइयों को अपने बच्चोँ से बढ़ कर चाहा। हमारी तालीम पर खास तौर पर तवज्जोह दी।
कहाँ बचकर चली ऐ फसले गुल मुझ आबला पॉ से
मेरे कदमों की गुलकारी बियाबान से चमन तक है
मरहूम ग़ुलाम मोहियुद्दीन सैयद ने ज़िन्दगी भर भड़भूँजे जैसे छोटे देहात में कारोबार किया। आदिवासियों के बीच दूकान चलना बड़ा दुश्वार होता है। मरहूम ने जिस ईमानदारी से कारोबार किया उसकी मिसाल नहीं दी जा सकती। अपनी औलाद को भी अपने रंग में ढाल गए।
मरहूम ग़ुलाम मोहियुद्दीन बड़े सच्चे ,ईमानदार वादे के पक्के थे। ज़िन्दगी अपने उसूलों पर जिये। बड़ी DISCIPLINED लाइफ गुज़ारी। खामोश तबियत थे। अपने से छोटे उम्र के बेटों , बेटियों ,भांजों ,भांजियों ,भतीजे भतीजियों तक को आपा ,दादा कह कर मुखातिब किया करते। कभी किसी से रंजिश नहीं रखी, न किसी से ग़ुस्से तैश में बात करते। आखिर उम्र में नवापुर के मुस्लिम मोहल्ले के मकान में रिहाइश पज़ीर हो गए थे। इंतेक़ाल से चार साल पहले उनकी अहलिया शकीला ,इस दुनिया से रुखसत हो गयी थी ,उनकी बीमारी के दौरान मरहूम ने ७ साल तक उनका बेहद ख्याल रखा।
दो साल गुज़र गए मरहूम ग़ुलाम मोहियुद्दीन को हम से जुदा हुवे ,दिन महीने साल इसी तरह गुज़रते रहेंगे ,वक़्त कहा किसी के लिए रुका है। हम सब भी जाने कब तारीख का हिस्सा बन जायेंगे। रहे बाकि नाम अल्लाह का। मरहूम ग़ुलाम मोहियुद्दीन नवापुर के ईद गाह कब्रस्तान में अपनी अहलिया के पड़ोस में आराम फरमा है।
उदास छोड़ गया वो हर एक मौसम को
गुलाब खिलते थे कल जिस के मुस्कुराने से













