मंगलवार, 26 मार्च 2019

Sathi hath badhana


छोटी आपा शरीफुन्निसा ने ,अम्मा की sudden मौत के बाद हम चारों भाइयों को अपने दामन में समेट लिया था ,जिस तरह मुर्ग़ी अपने चूज़ों की हिफाज़त करती है।८ साल हमारे खाने ,पीने ,पहनने का इंतेज़ाम एक माँ के जैसे किया।हमारे ज़ख्मों पर मरहम रखा , किसी हद तक अम्मा की कमी पूरी कर दी। दादाभाई (मरहूम सादिक़ अहमद ) उनके बच्चों  ज़ाहिद और राशिद को कुवैत में job दिला कर आपा के लिए राहत का सामान पैदा कर दिया था। अल्लाह मरहूम अल्हाज सादिक़ अहमद को करवट करवट जन्नत नसीब करे ,उन के दरजात बुलुंद हो आमीन सुम्मा आमीन।

  अल्हाज मरहूम सादिक़ मरहूम की ख्वाहिश थी के हम सब भाई मिल कर एक ट्रस्ट बनायें जिस से खैर के काम किये
जाएँ करीबी ग़रीब रिश्तेदारों की मदद की जाएँ। उन का ये ख्वाब हकीकत का रूप न ले सका खैर। जब भी में ने लब्बैक कहाँ मदद ज़रूर मिली। अल्हस्नात उर्दू स्कूल की लाइबररि के लिए ,आप सब ने एक पुकार पर १४०,००० रूपए भेज दिए थे। आज उस लयबररि को ग़रीब स्टूडंट्स को इस्तेमाल करते देखता हूँ तो आप सब के लिए दिल से दुवायें निकल पड़ती
 हैं।
  छोटी आपा की नवासी ,मुफिजा की बेटी रौशनी की शादी २६ अप्रैल को जलगाव् में होनी है। माशाल्लाह रौशनी ने दो साल पहले ,zoology से B.Sc किया है। १० वी क्लास से ट्यूशन करके अपनी फीस, खुद अदा की है। आज भी मोहल्ले के २५ बच्चे उस के पास पढ़  रहें है। ग़रीब बस्ती है हर  बच्चे से १०० रुपये महीना फीस लेती है। अच्छे  घर में ,अपनी रिश्तेदारी में रिश्ता हुवा है। रिश्ता finalise करने  में  अल्हम्दोलीलाह मेरा involment रहा है। रौशनी के dady मुजाहिद का कुछ महीने पहले heart valve replacement का operation हुवा है। वैसे भी उसकी कोई perm
enent income नहीं ऱही है।
  अल्हम्दोलीलाह शादी में मेरा पूरा involvement रहेंगा। ज़ाहिद अली तमाम इंतज़ाम में लगा है। डॉक्टर वासिफ ने भी इस कार खैर (अच्छे काम ) में बखूबी हात बटाया है ,कदम कदम पर रेहनुमाई की है। अल्लाह उनेह जज़ाए खैर अता करे। नवेद अंजुम ने शादी के खर्च के लिए ४०,०००  रूपये रवाना कर दिए। सना की तरफ से १०,००० ,मेरी और डॉक्टर वासिफ की तरफ से १०,००० रूपये ,हिना ने भी कंट्रीब्यूशन दिया है। ७५,००० रूपये शादी के खर्च के लिए जमा हो गए हैं। आप सब से contribution की request है इंशाल्लाह इस अमाउंट से रौशनी को कुछ जहेज़ ज़रूरी सामान दिला दिया जायेगा।
  CONTRIBUTION के लिए ज़ाहिद अली के bank details रवाना कर रहा हूँ।




शनिवार, 26 जनवरी 2019

70th republic day






Saturday, January 26, 2019


(70th Republic Day)

Super power America has shut down  for a month, perhaps there  is fault in their constitution. Our neighboring country Pakistan got independence with us, our democracy has been strengthened in the last 70 years, we have matured day by day, Pakistan has been immersed  in chaos day by day, now Pakistan has started to be known as the failed State, perhaps there was a huge fault in their constitution; There is nothing called constitution in china, people work like robots. Our constitution has been created by intellectuals with great strength, great potential. Dr. Ambedkar, Jawaharlal Nehru, Sardar Vallabh Bhai Patel, Abul Kalam Azad, Rajendra Prasad have laid the foundation of such a beautifully constructed constitution. It can not be completely changed, people have the freedom to eat  practice religion, never shuts down. There are honest courts. Elections are free and fair , there is  transparency and the results are announced on the second day. People want to come to India to learn election procedures from all over the world.In  Super power America  elections  are still conducted by  ballet papers, and results are many days long to be announced.
      Talking about Indira Nooyi being the President of the World Bank, Kamala Haris, who is an Indian origin, has been nominated for the American President ship. Future is ours. Nobody can stop  becoming a super power, the condition is that Do not hate the other by creating the basis of religion, eating food, do not die of hunger, every Hindustani should be given basic health facility, Basic education is provided  to every Indian.






70 योमे जम्हुरिया (70th Republic Day )

                                                      70 योमे जम्हुरिया (70th Republic Day )
Super power अमेरिका में एक महीने से shut down है। शायद उनके constitution में कोई कमी रह गयी थी। हमारा  पडोसी मुल्क पाकिस्तान अफ़सोस के  हमारे साथ साथ आज़ाद हुवा ,पिछले ७० सालों में हमारी democracy मज़बूत हुयी ,हम दिन ब दिन mature  हुवे ,पकिस्तान दिन ब दिन immature हुवा , अब तो पाकिस्तान को failed state के नाम से जाना जाने लगा है , शायद उन के constitution में बहुत बड़ी कमी रह गयी थी, । china में constitution नाम की कोई चीज़ नहीं ,लोग robot की तरह काम करते हैं। हमारे constitution को intellectuals ने बड़ी मेह्नत ,बड़ी काबिलियत से बनाया है। हम दुवायें  देते हैं Dr. आंबेडकर ,जवाहर लाल  नेहरू ,सरदार वल्लभ भाई पटेल ,अबुल कलम आज़ाद ,राजेंद्र प्रसाद को ,इतनी खूबसूरती से constitution  की बुनियाद रखी है। इसे न पूरी तरह से बदला जा सकता है, लोगों को मज़हब खाने पीने की आज़ादी है। कभी shut down नहीं होता ,ईमानदार अदालतें (courts )हैं। transparency इतनी के एक दिन में election हो कर दूसरे दिन result declare होजाते हैं। लोग पूरी दुनिया  से चुनाव प्रकिरिया सीखने  इंडिया आना चाहतें  हैं। Super power अमेरिका में आज भी ballet papers से चुनाव होते हैं, और result declare होने में कई कई दिन लग जाते हैं।
      इंदिरा नूयी को world bank का president बनाने की बात हो रही है ,कमला हारिस जो Indian origin की है american president ship के लिए nominate किया गया है। future हमारा है। इंडिया को कोई भी super power बनने से नहीं रोक सकता शर्त है हम सब मोहब्त से मिल कर रहे। मज़हब ,खाने पीने को बुनियाद बना कर एक दुसरे से नफरत न करे ,कोई भूक से न मरे ,हर हिंदुस्तानी को basic health facility मोहय्या (available ) हो। बेहतरीन एजुकेशन हर शहरी को नसीब हो। 

सोमवार, 21 जनवरी 2019

sharifuddin sayed urf (bachu Bahi)

                                   शरीफुद्दीन सय्यद उर्फ़ (बच्चू भाई )
ढूंढ उजड़े हुवे लोगों में वफ़ा के मोती
ये ख़ज़ाने तुझे शायद के खरबों में मिले
नवापुर की मशहूर हस्ती किसी तआरुफ़ (introduction ) की मुहताज नहीं ,माशाल्लाह उन के  नाम से  ही शराफत टपकती है। उम्र की ८० बहारें देख चुके हैं। अब भी लगता है, मानो उनेह समय के थरमस (thermos ) में क़ैद कर दिया गया हो। बक़ौल हमारे बड़े भाई डॉक्टर वासिफ  अहमद "बच्चू मॉमू अब भी वैसे ही दिखाई देते हैं जैसे पहले थे"। बच्चू मॉमू  बहुत हाज़िर जवाब ,कहते  देते हैं "चलो डॉक्टर से भी मुझे  अल्हम्दोलीलाह fitness certificate मिल गया "
        ६ फिट का कद (height ),दूध के जैसा सफ़ेद रंग ,चेहरे पर सब्ज़ नीलगूँ ऑंखें ,गूंजदार आवाज़ एक्टिंग line में गये  होते तो दिलीप कुमार को नहीं, अमिताभ बच्चन को शुहरत में ज़रूर पीछे छोड़ दिया होता। शाह वाजिहुद्दीन अहमदाबादी  के खान्दान से ताल्लुक़ रखते हैं। ज़िन्दा  दिल खुश मिज़ाज ,हलीम तबियत कभी उनेह ग़ुस्सा होते नहीं देखा। तालीम (education ) ज़ियादा हासिल नहीं कर पाये ,दुनिया के तजुर्बात ने  बहुत कुछ सीखा दिया । बच्चू  मॉमू से एक दिन मैं ने  सवाल किया था उनेह बच्चू की उर्फियत कैसे मिली, उनोह ने जवाब दिया "मरहूम हाजी मियां उनेह प्यार से बच्चा कहा करते थे "शायद लोगों ने बिगाड़ कर बच्चू कर दिया और अब सारी दुनिया में इसी नाम से जाने जाते हैं।
जिस दिन से चला हूँ मेरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा
      बच्चू मॉमू ने मशाअल्लाह जिस काम में हाथ डाला कामयाब रहे।   भड़भूँजा,झामंजर ,साकरदा में दुकानें  खोली ,कामयाबी से चलायी। politics में कदम रखा तो लगतकर २० साल तक झामंजर के सरपंच रहे। ८ साल पंचायत समिति के मेंबर रहे और  उस area ,में जहा आदिवासियों का बोल बाला (वर्चस्व ) है। गवर्नमेंट से contract ले कर रोड्स बनायें ,हॉस्पिटल तामीर किये ,खेती बाड़ी की ,लकड़ों का business किया।
मुझे सहल हो गयी मंज़िलें वो हवा के रुख भी बदल गये
तेरा हाथ हाथ में आ गया के चिराग़ रह में जल गये
      १९६१ में हमारी मुमानी शमशाद बेगम से उन की जुगल बंदी माफ़ करना शादी हुवी २ साल बाद इंशाल्लाह उनकी कामयाब शादी शुदा ज़िन्दगी के ६० साल पुरे हो जायेंगे। दोनों ने मिल कर बच्चों की बेहतरीन तरबियत (training )  की। अच्छे खानदानों में शादियां करवाई ,इरफ़ान ,नुमान को अछि तरह बिज़नेस में सेट  करवा दिया। अब भी मॉमू मियां अपने आप को खेती बाड़ी में ,अच्छी किताबें पढ़ने में मसरुफ़ रखते है। दोस्तों का बहुत बड़ा ग्रुप है उन के साथ बैठ कर बचा कुचा वक़्त खुश गप्पियों  और पाबन्दी से वाकिंग करके गुजारते हैं। कई अरसा पहले आप के पर लग गये यानी पर नाना बन गये थे । उनेह उड़ते देखों तो ताज्जुब (आश्चर्य ) न करना।
   अपने बड़े भाई मरहूम ज़ैनुलआबेदीन उर्फ़ ( छोटू ) से उनेह बहुत मोहब्बत थी ,नवापुर में खेत ,बंगला छोटू मॉमूउन्ही की सलाह से खरीदा था।  शगुफ्ता और मुझसे  बच्चू मॉमू को  गहरी उनसियत है हमारे रिश्ते में  उनोहने ज़बरदस्त role play किया था जिस के लिए में हमेशा उन का शुक्र गुज़ार रहूँगा ।
क्या पता कल वो ज़माने के निसाबों में मिले
    इस ज़वाल पज़ीर दौर में लोग social media ,whatsup पर इतने busy है के बुज़र्गों के पास बैठने की फुर्सत नहीं ,न उनके तजुर्बात (experience ) से सीखने का शौक़ ,माशाल्लाह बच्चू मॉमू के अपने खानदान में आज भी उन का दबदबा वैसे ही क़ायम है। कोई भी काम उन के मश्वरे के बिना नहीं होता। और वो खुद भी अपनी तहज़ीब ,अपने बुज़र्गो अपनी रिवायतों के इतने पाबंद है के अपने पोते का नाम अपने दादा अब्दुल वाहिद के नाम  पर रखा ,मेडिकल स्टोर खोला उसे भी जमादार के नाम से मंसूब किया ।
    बच्चू मॉमू  सियासत( politics )से retire होगये हैं लेकिन अब भी स्वरुप सिंह नाईक  ,माणिक राव जैसे मारूफ लोग उन के मश्वरे के बिना कोई काम नहीं करते ,अब भी उनकी वैसी ही इज़्ज़त की जाती है। इरफ़ान ,नुमान के बाद अब वो उन की औलाद की तरबियत लगे हैं।
   अल्लाह से दुआ है के बच्चू मॉमू को तंदुरस्ती के साथ लम्बी उम्र मिले ,हमेशा खुश व खुर्रम रहे ,अपनी मुस्कराहटों ,खुश गोयी ,खुश अख़लाक़ी ,शफ़ाक़तों ,इनायतों ,महबतों  से दुनिया को गुल व गुलज़ार करते रहे आमीन  सुम्मा आमीन।





बुधवार, 5 दिसंबर 2018

Humayun 2 nd Moghal ruler

                                                       Masjid kuhna purana kila
                                                Hammam purana kila
                                                           Member Masjid kuhna
   
Isa khan tomb
मौत से किस को रस्तगारी है 
औलिया हमेशा ज़िन्दगी में सादा  ज़िन्दगी गुज़ारते रहे। बादशाहे वक़्त से दूरी क़ायम रखी। मौत के बाद बादशाहे वक़्त की ख्वाहिश होती थी के उनेह औलिया के पहलु में दफन किया जाये, शायद  उनकी नजात का ज़रिया बन जाये। हुमायूँ का मक़बरा भी हज़रात निजामुद्दीन औलिया के करीब ही में हैं। बड़ी अजीब बात है के मोगलिया दौर में औरतों को एक मक़ाम हासिल था। गुलबदन बानू ,हमीदा बेगम ,जहां आरा चंद गिनी चुनी शख्सियतों के नाम हम तक पहुँच पाए हैं। हमीदा बेगम जो हुमायूँ की बीवी थी अकबर को अकबर आज़म उसी ने बनाया। कहा जाता है हुमायूँ के मक़बरे की तामीर भी उसी ने हुमायूँ के इंतेक़ाल के ४ साल बाद पूरी कर ली। मक़बरे को देख केर बनाने वाले की दूर अंदेशी ,design ,architecture की दाद देनी पड़ती है। ४५० साल बाद भी मक़बरे की रौनक जो की तूं बरकरार है। एक्कीस्वी सदी में मक़बरे को restore करते करते कई साल लग गए। 
मक़बरे के एंट्री पर बड़ा दरवाज़ा है। उस से लग कर इसा खान जो शेर शाह सूरी का वज़ीर था उस का मज़ार है। मज़ार के सामने खबसूरत मस्जिद है जहाँ अब नमाज़ नहीं पढ़ सकते। हुमायूँ के मक़बरे की बायीं जानिब हमाम बना है। दायीं जानिब नाई का मक़बरा है। मक़बरे में हुमायूँ के अलावा कई कब्रें हैं। ईसी मक़बरे से  १८५७ की जंगे आज़ादी के  बाद बहदुर शाह ,आखरी मोघल को अंग्रेज़ों ने गिरफ्तार किया था। 
आ तुझ को बताता हूँ तक़्दीरे उमम क्या है 
शमसीर व सना अव्वल चंगेज़ व रुबाब आखर 
शायरे  मशरिक़ डॉक्टर इक़बाल बताना चाहते है के क़ौमों की तक़दीर मुसलसल जद्दो जहद से बनती ही ,और क़ौमों की मौत ऐशो  इशरत और राहत तलबी से होती है। तारीख़ भी हमें यही सबक देती है। 

Humain darwaza purana kila
23 नवंबर से २७ नवंबर २०१८ के बीच दिल्ली शहर की खाक छानने का मौक़ा मिला। दिल्ली  मेट्रो से सफर आराम दे भी होगया और आप कम टाइम में लम्बा डिस्टेंस कवर कर सकते हैं। इस बार पुराना क़िला विजिट करने का चांस मिला। मुग़लियाँ सल्तनत का दूसरा बादशाह हुमायूँ ,ने पुराने किले से हकूमत की थी। उस ने लिखा है जहाँबादल, बरसात हो वहीसे  बादशह ने हकूमत करनी चाहिए। public private participation के ज़रिये ASI और आग़ा खान foundation की कोशिशों से दिल्ली के तमाम पुराने monuments को नयी ज़िन्दगी बख्शी जा रही है। पुराना किला ,भी उन में से  एक है। इसी पुराने किले से हुमायूँ ने १५३२ से १५४० तक हुकूमत की। शेर शाह सूरी ने हुमायूँ को १५४० में शिकस्त दी  और इस किले पर कब्ज़ा किया यहाँ एक ख़ूबसूरत मस्जिद (कोहना ) बनायीं। इस किले को उस ज़माने में शेर मंडल कहा जाने लगा।
यूँ वक़्त के पहिये से बंधा हूँ यारब
चाहूँ  के  न चाहूँ गर्दिश में हूँ यारब 
हिमायूं नामाँ हिमायूं की जिंदिगी के  हालात  पर लिखी किताब है। गुलबदन बेगम जो हिमायूं की बहन थी हिमायूं की मौत के बाद अकबर बादशाह ने अपनी सगी फूफी से हिमायूं के हालत ज़िन्दगी बयां करने की दरख्वास्त पर ये किताब लिखी गयी।गुलबदन बेगम के बारे में कहा जाता है की वह बहुत पढ़ी लिखी ,शायरा ,सियासत दान थी। बड़ी तफ्सील से उस ने हुमायूँ के हालत बयान किये हैं।   हिमायूं जिंदिगी भर सख्त हालत से झूंझता रहा। बाबर ने इब्राहिम लोधी को पानीपत में शिकस्त दी और दिल्ली पर कब्ज़ा कर लिया। उस वक़्क़त हुमायूँ बदख्शां (अफ़ग़ानिस्तान) का गवर्नर था। बाबर की बीमारी की खबर सुन कर बग़ैर बाबर की इजाज़त के वह दिल्ली आगया। बाबर बहुत बिगड़ा भी लेकिन बाप की मोहब्बत ग़ालिब आगयी। बाबर किसि वजह से दिल्ली की हुकूमत हुमायूँ के सुपर्द नहीं करना चाहता था। एक ऐसा वक़्त आया के  २२ साल की उम्र में ,हुमायूँ सख्त बीमार होंगया  ,बाबर ने बीमार हुमायूँ के बिस्तर के गिर्द घूम कर कर दुआ की के हुमायूँ सेहतयाब होजाये और उसे मौत आजाये। जो  दुआ दिल से निकलती  है असर रखती है हुमायूँ सेहतयाब होगया और बाबर की ३८ साल की उम्र में मौत होंगयी।  
१५४० में शेर शाह सूरी ने हुमायूँ को शिकस्त दी। हुमायूँ अपनी बीवी हमीदा बानो ,चंद जांबाज़ सिपाहियों के साथ काबुल में पनाह लेना चाहता था । उस का भाई कामरान मिर्ज़ा इजाज़त नहीं देता है । पता नहीं हुमांयू किस मिटटी का बना था। किसी तरह बचता बचाता ईरान पहूँश्चाता है बड़ी फ़ौज लेकर लौटता है  ।  इसी दौरान अकबर की पैदाइश होती है। १५ साल की जद्दो जहद के बाद पहले अपने भाई कामरान मिर्ज़ा को शिकस्त दे कर उसे अँधा कर हज के लिए रावाना कर, दिल्ली पर  १५५५ में हमला करता है और शेर शाह सूरी जिस की हुकूमत के पंजे हिंदुस्तान में गड चुके थे उखाड़ फेंकता है ,पुराना  किला (शहरे पनाह ) से अपने फरमान जारी करता है। 
किस्मत तो देखिये टूटी कहाँ कमांड 
एक साल हिंदुस्तान में हुकूमत करने के बाद २७ जनवरी  १५५६ जुमे के दिन अपनी एक मंज़िला library से कुछ किताबें बग़ल में दाबे, उतर रहा था। असर की अज़ान सुनाई दी ,हुमायूँ की आदत थी अज़ान सुन  कर एह्त्रामन  बैठ जाने की , सब से ऊँची सीडी पर बैठ गया। अज़ान ख़त्म होने पर  ,उठते वक़्त अपना balance न संभाल सका ,सर के बल गिर कर मौत होगयी,कहा जाता है उस वक़्त हुमायूँ की उम्र ४७ या ५१ साल थी । अकबर १३ साल का था और उस समय काबुल में था। किसी तरह मौत की खबर को कुछ रोज़ के लिए छुपाया गया। अकबर को काबुल से बुला कर गद्दी सोपि गयी।
आज पुराने किले को नयी ज़िन्दगी तो बख्श दी गयी है लेकिन वो lovers paradise बन गया है। Holy wood की फिल्मों से ज़्याद खतरनाक scene देखने को मिलते हैं। शायद हुमायूँ शेर शाह सूरी की  रूह क़ब्र में तड़प उठती होंगी। नए ज़माने की नयी फसल को कौन रोक सकता है ?  

Bada darwaza

isa khan masjid
Humayun Tomb



रविवार, 4 नवंबर 2018

HAJI Sayed Sayeed Ahmed (Bana Bhai)

                     मरहूम  हाजी सय्यद सईद अहमद (बना भाई )
अल्फ़ाज़ व सूरत व रंग व तस्सवर के रूप में
ज़िंदा हैं लोग आज भी मरने के बावजूद 
दूल्हे मामूं की मौत पर खाला जान (अकीला ) से बातों बातों में पता चला के वह ७९ सालों की होगयी हैं और सईद अहमद  (गोरे मामूं ) उन से ४ साल छोटे ,यानि अगर आज वो हयात होते तो ७५ बरस के होजाते।
तुम याद आये साथ तुम्हारे गुज़रे ज़माने याद आये 

  •  हाजी सईद अहमद अपने चार भाईयों ( हाजी अफ्ज़लोद्दीन ,ग़ुलाम महियोद्दीन ,मुहम्मद युसूफ ) और तीन बहनों (बिस्मिल्ला ,अकीला ,जीलानी) में सब से छोटे थे। सब की आँखों का तारा , माँ ,बाप (इकरामुद्दीन,मुमताज़ बेगम ) के नूरे नज़र थे। सईद अहमद से उन की उर्फियत बना भाई कैसे  होगयी, ये एक राज़  ही है। तमाम भाइयों में सब से छोटा कद उनिह का था। रंग सफ़ेद माईल (बेहद गोरा ) था। बोलती हुवी ऑंखें ,सर बार घनेरे बाल। नफासत पसंद थे।खुश मिज़ाजी कूट कूट कर भरी थी।  सफ़ारी  पह्नने के शौक़ीन। किसी ज़माने में wiber smith की imported Pistol  लिए घूमते थे। लइसेंस भी बनवा रखा था। double boar वाली gun भी थी ,कभी कभी शिकार भी खेल लेते थे। अच्छे   खानो का उनेह शौक़ था। खाने से ज़ियादा उन्हे  लोगों को खिलने का शौक़ था।
जाने वो कैसे लोग थे जो मिल के एक बार
नज़रों में जज़्ब हो गये दिल में उतर गए 
 मरहूम इंजीनियर हाजी सादिक़ अहमद और गोरे मामूँ की उम्र में ज़ियादा फ़र्क़ नहीं था। दोनों दोस्तों की तरह रहते थे। किसी ज़माने में इस्माइल युसूफ कॉलेज ,मुंबई १९६४  में साथ साथ पढ़ते भी थे। सारे कॉलेज और हॉस्टल में  सादिक़ भाई की वजह से ,वो  सईद अहमद की बजाये ,गोरे मामु के नाम से जाने जाते। उन के हॉस्टल के साथी अब्दुल करीम हल्दे जो रिज़र्व बैंक से डिप्टी मैनेजर के ओहदे से रिटायर हुवे है ,आज भी उन की याद करते हैं।
मरहूम ने अजीब तबियत पायी थी जीस  से मिलते उस की उम्र के होजाते। डॉक्टर वासिफ के साथ वही कहकहे ,वही बेतकलुफ़ी ,मानो मामू भांजे न हो दोस्त हो। मुझ से भी वही क़ुरब , वही उन्सियत थी।  हमारी छुट्टियां भड़भूँजे में गुज़रती ,रेलवे स्टेशन पर चुनी भाई स्टेशन मास्टर की ड्यूटी हुवा करती। रात में भड़भूँजा के स्टेशन मास्टर की ऑफिस में वक़्त गुज़री के लिए पत्तों की बाज़ी जमती। में और गोरे मामूं पार्टनर ,डॉक्टर वासिफ और चुनी भाई एक तरफ। चुनी भाई की यही तमन्ना होती के वो किसी तरह जीत जाएँ। लेकिन वह हमेशा नाकाम ही होते क्यूंकि में और गोरे  मामू चीटिंग में मास्टर थे। हम दोनों की जानिब से वो जुमले बाज़ी होती चुनी भाई को जान छुड़ाना मुश्किल होजाता।
  गोरे मामू के साथ फिल्म देखते वक़्त उन को बच्चों की तरह जज़्बात के धारे  में बहते देखा। emotional scenes में वो आंसू बहाते ,कॉमेडी और fighting scene में जब वो ताली बजा कर दाद देते तो सारा हाल  तालियों से गूँज उठता।
जीते है शान से
मरहूम की पैदाइश नवापुर में हुवी थी। सार्वजनिक मराठी स्कूल से ११ तक पढ़ाई की। ,जोगेश्वरी के, उस ज़माने के मशहूर कॉलेज इस्माइल युसूफ से  inter  पास किया। भोपाल यूनिवर्सिटी से उर्दू में B.A की Degree हासिल की। शायद खानदान में वे पहले डिग्री मिलाने  वाले  शख्स थे. LL.B( law ) में भी admission  लिया था, लेकिन कारोबारी मसरूफियत की बिना पर complete न कर सके। उन की syllabus की किताबें मैं बड़े शौक से पढ़ता ,उमराव  जान अदा ,बांगे दरा ,दीवाने ग़ालिब।  उन के पास किताबों का खज़ाना था। मुझे पढ़ते देखते तो खुश होते। 
     मिट्टी  को सोना बनाना कोई उन से सीख सकता था। जो कारोबार किया आन ,बान ,शान से किया लकड़ों का कारोबार किया पूरे जंगल खरीद लिया करते थे। टट्टे वैगन भर के अहमदाबाद को रवाना करते। मछ्ली का कारोबार ,मानो एक छोटी मोटी industry चला रहे थे। उकाई dam की मछलियां कलकत्ता को भेजी जाती थी। जब तक मछली के टोकरे ट्रैन में लोड नहीं होजाते थे, ट्रैन भड़भूँजा स्टेशन पर रुकी रहती। उसी ज़माने में (१९७४ -१९७७) मरहूम बॉम्बे से कलकत्ता प्लेन से सफर किया करते थे।
बिछड़े सभी बारी बारी
1978 में अपनी पहली रफ़ीक़े हयात जिन का नाम रफ़ीक़ा ही था ,की मौत पर में ने उनेह टूटते देखा। लेकिन वसीम ,ज़की ,मोहसिन ,फरहत जहाँ की खातिर अपने आप को संभाला,एक नयी ज़िन्दगी की शुरवात की ,दोबारा अपना घर बसाया। दूसरी बार वसीम उर्फ़ बुल्या की नागहानी मौत ने उन्हें एक गहरे सदमे से दोचार किया।
मुझे सहल हो गयी मज़िले व हवा के रुख भी बदल गए
दूसरी सवानेह हयात (बीवी) फहीमुन्निसा ने भी उन का साथ खुलूस ,अपनाइयत ,बराबरी से दिया। उन के ग़म अपने दामन में समेट  लिए। मरहूम माशाअल्लाह कसीर उल औलाद थे। उनोह्ने  ने अल्लाह के रसूल की उस हदीस पर अमल किया,  आप ने फ़रमाया था " में उम्मत के उन लोगों पर फख्र करुंगा  जिन की औलाद ज़्यादा होंगी"।
नशीमान पर नशीमान इस तरह तामीर करता जा
अपने पसंद की चीज़ मुं मांगे दामों पर खरीद लिया करते थे। डॉक्टर वासिफ मुझे बता रहे थे सोनगढ़ में जो पारसी का बंगला उन्होने खरीदा था उस की कीमत इतनी ज़ियादा लगायी थी, के मालिके माकान ने एक पल की हिचकिचाहट के सौदा तय कर लिया था।  उस बंगले का नक़्श आज भी मेरे ज़हन में जूँ की तूँ मौजूद है। छोटे से टीले पर चार कमरों पे मुश्तमिल ,आंगन फूलों की खुशबु से महकता ,सीताफल ,अमरुद ,आम के फलों से लदे पेड़ ,पॉलिटरी भी थी ,Servant quarters अलग से बने थे। आंगन में झूले पर बैठ कर आदमी एक और दुनिया में पहुँच जाता था। गोरे  मामू को दाद दिए बिना नहीं रह सकता ,गोरी मुमानी  ने उसी  खुशअसलूबी से उस बंगले की देख रेख  भी करती थी।
मौत का एक दिन मुअय्यन है
 आखरी वक़्त तक मरहूम भड़भूँजे की दुकान करते रहे। खुशनसीब रहे, आप को हज नसीब हुवा ।  मौत भी पायी तो ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के शहर अजमेर  में। सोनगढ़ के क़ब्रस्तान में आराम फरमा रहे है।
रहे नाम अल्लाह का।

मंगलवार, 23 अक्टूबर 2018

wo kare baat to har lafz se khusbu aaye



وہ کرے بات تو ہر لفظ سے خوشبو آئے
ایسی بولی وہی بولے جسے اردو آئے
اس سے مراد وہ شخص ہیں جن سے 20  سال کے طویل عرصے سے میری  پہچان ہے- میرا اشارہ ڈاکٹر فاروق الزماں کی جانب ہے-ان سے ملاقات تو  ہمارے سگے بھائی  جناب مرحوم صادق احمد نے کروائی تھی – لیکن دیکھتے دیکھتے یہ پہچان گہرے تعلقات میں بدل گئی-ان 20 سالوں میں، میں نے ان سے کئی  معاملات  کئے ،ان  کے ساتھ سفر بھی کیا ،ہم نے کئی مشاعرے ادبی پروگرامس  میں ساتھ ساتھ شرکت کی ،مرکز فلاح کی میٹنگوں میں ،کئی شادیوں میں  بھی ساتھ رہے ہیں-ان 20 سالوں میں انہيں قریب سے دیکھنے کا موقعہ ملا -اس دوران میں نے ان کے کردار کے ہر پہلو کا جائزہ لیا -ان کے خلوص،ان کا وقار،ان کی سنجیدگی،ان کے خیالات میں ہر جگہ میانہ روی پائی -گو وہ ایک شعلہ بیان مقرر نہیں،ان کا لہجہ دھیما ہوتا ہے،ان کی تقریر نصیحت آمیز اور حقائق پر مبنی ہوتی ہے-انہيں ڈاکٹریٹ کا اعزاز ملا ،ان کا عجز و انکسار بڑھا،عمر کے ساتھ ساتھ گہرے مطالعہ کی بنا پر ان کی معلومات میں اضافہ ہوا،متا نت سنجیدگی میں بھی اضافہ ہوا- میں یقین کے ساتھ کہہ سکتا ہوں کہ، آج کے انحطاط پزیر دور میں ان جیسے کردار کے لوگ لونگ الائچی کی طرح عنقا ہوتے جا رہے میں-
انصاف تو یہ ہوتا کے ڈاکٹر فاروق الزماں تعلیم کے شعبہ سے جڑے ہوتے ،قوم کا بہت فائدہ ہوتا-انہوں نے تجارت کا پیشہ اپنایا-لیکن انہوں نے جو بھی کیا ایمانداری سے کیا اس کا حق ادا کیا-کئی سال plywoodکا کاروبار کرتے رہے- اور اب کئی سالوں سے  کنسٹر کشن میں مٹیریل سپلائے پیشہ سے وابستہ ہے-ان کے پاس جو  disciplineجو planning  جو dedication ہے بہت کم لوگوں میں پایا جاتا ہے-شاید کسی شاعر نے ایسے ہی لوگوں کےتعلق سے کہا ہے
ع ان سے ضرور ملنا سلیقے  کے لوگ ہیں
 قرآن  سے ثبوت ملتا  ہے کے "پاکیزہ مردوں کے لئے پاکیزہ عورتیں ہیں"-ڈاکٹر صاحب اور ان کی اہلیہ  مرحومہ عائشہ دونوں ماشااللہ نجیب الطرفین خاندان سے ہیں-ڈاکٹر صاحب کے والد ڈاکٹر مقصود عالم  بحیثیت ڈاکٹر میڈکل کے پیشے سے وابستہ ہیں –رکنی  بہار مدرسہ بورڈ میں ممبر رہے میں-ان کے نانا کے تعلق سے قصے سنے ہیں ،ہندوستان سے لے کر موجودہ بنگلہ دیش تک ان کے معتقدین کا سلسلہ قائم تھا-ڈاکڑ صاحب کے سسر محترم پروفیسر ظفر حبیب کئی کتابوں کے مصنف ہیں-
ع  وہ گھر بھی کوئی گھر ہے جہاں لڑکیاں نہ ہو
ڈاکٹر  فاروق الزماں صاحب نے جس وقت وطن مالوف  سےحجرت کی تھی  شفق گود میں ہوا کرتی تھی-پھر یکے بعد دیگرے صدف،تسکین ،برزین کی پیدائش  ہوئی- غزل کا جومطلع وطن میں لکھا گیا تھا  مقطع نیرول میں  آ کر لکھا گیا-تمام بچوں میں دونوں ماں باپ کے جینس،DNA آئے ہیں-سبھی بے حد ذہین واقع ہوئی ہیں-debate ہو یا program me comparing ،sport ہو یا singing competition - سبھی نے ڈھیر سارے میڈلس جیتے ہیں-اسکول کی مانیٹرس رہی ہیں-بڑے بڑے  events میں سکول و کالج کو represent کیا ہے-اور یہ تمام activities پردے کی حدود کو قائم رکھتے ہوئےکی ہے-
رات کی جھیل میں کنکر سا کوئی پھینک گیا
دائرے درد کے بننے لگے تنہائی میں
 وطن سے ہجرت کے بعد ڈاکٹر صاحب نے نیرول میں اپنے خوابوں کا  آشیانہ تعمیر کیا--ڈاکٹر صاحب  نےگھاٹکوپر میں plywood ہول سیل کی شاپ کھول رکھی تھی-بھابھی عائشہ بھی  بہترین dress designer ہوا کرتی تھیں-بچا کچھا وقت سوشل کاموں میں صرف کیا کرتی تھیں-

ع  قسمت تو دیکھئے ٹوٹی کہاں کمند
یکم جون 2009کے دن  بھابھی  ایک  ناگہانی  حادثہ میں ،ڈاکٹر صاحب سے بچھڑ گیئں-لٹے پٹے اپنے  کارواں کے ساتھ ڈاکٹر صاحب نیرول لوٹے- ابھی برزین (سب سے چھوٹی کا )سنیر کےجی میں اڈمیشن ہوا  ہی تھا-لیکن میں ڈاکٹر صاحب کے حوصلے کو داد دیتا ہوں کہ اس سانحہ کے دن کو کبھی  بھی منحوس نہیں کہا-کئی دن تک ان کے کمپیوٹر اور موبائل کے اسکرین پر مرحومہ بھابھی کی تصویر display  میں رہی بس- جب دل کے آئنہ میں تصویر یار ہو،اور آہنی ارادے ہو ں تو  کسی سہارے کی ضروت کہا ں ہوتی ہے-انہیں یہ سوچ کر تسکین ہوگئی
بھلا کسی نے کبھی رنگ وبو کو پکڑا ہے
شفق کو قید میں رکھا ہوا کو بند کیا
ہرایک لمحہ گریزاں ہے،جیسے دشمن ہے
نہ تم ملوگی نہ میں ،ہم بھی دونوں لمحے میں
وہ جاکے جو واپس کبھی نہیں آتے
انہوں نے حال کی تاریکی میں بچوں کے روشن و تابناک مستقبل کو دیکھ لیا-اکیلے اپنے اور بھابھی کے خوابوں کی تعبیر میں جٹ گئے-مجھے یقین ہے انہیں کسی مایوس شاعر کی طرح کبھی یہ نہیں کہنا پڑیگا
ع  میں زمانے میں چند خواب چھوڑ آیا تھا