खुशबु जैसे लोग मिले
ऐ ज़ौक़ किसी हमदमे देरीना का मिलना
बेहतर है मुलाक़ातें मसीहा व खिदर से
नवापुर में हारिस सय्यद के निकाह /वलीमे में जनाब ताजुद्दीन शैख़ साहब से अरसे बाद फिजिकल मुलाक़ात हुयी। उनसे मेरी पहली मुलाक़ात १९८० /१९८२ में हुयी थी जब एयर फाॅर्स में उनकी पोस्टिंग थाना में थी। मुझे उनोहने ने अपनी कैंटीन से साइकिल दिलवाई थी। शायद उस ज़माने में ३०० रूपये कीमत थी।
फिर ताजुद्दीन शैख़ हिंदुस्तान साहब की एयर फ़ोर्स के दूर दूर मक़ामात में पोस्टिंग होती रही। एयर फ़ोर्स सर्विस पूरी करने के बाद वह दुबई कई साल बड़ी कंपनी में सिक्योरिटी चीफ के ओहदे पर सर्विस देते रहे। हिंदुस्तान लौटने के बाद वो हिंदुस्तान के सभी टोल नाकों पर अपनी पर्सोनेल कम्पनी के लिए सर्विस देते रहे। और अब माशाल्लाह नासिक में क़याम पज़ीर है। कुछ अरसा (टाइम ) अपने फ़रज़न्द के पास हॉलैंड में भी गुज़ारा।
तमाम रिश्तेदारी ग्रुप्स में भी रोज़ाना उनके अच्छे अच्छे मेसेजेस दिखाई पड़ते हैं। मुझ गाहे गाहे मोबाइल पर कांटेक्ट में भी रहते हैं। अल्लाह उनेह सेहत के साथ लम्बी उम्र अता करे अमीन।
जहाँ रहे वो खैरियत के साथ रहे
उठाये हाथ तो ये एक दुआ याद आयी
ताजुद्दीन शैख़ के साथ शादी की महफ़िल में
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