रविवार, 15 मार्च 2026

for programe

 अकबर इलाहबादी ने क़ौम को झंझोड़ेने नींद से उठाने के लिए जो शायरी लिखी थी आज भी वह इतनी ही relevent है। 

हुए इस क़दर मोह्ज़ीब (civilised ) कभी घर का मुँह न देखा 

कटी उम्र होटलों में मरे इस्पेताल जा कर 

अकबर ने कहा सुन लो यारों अल्लाह नहीं तो कुछ भी नहीं 

यारों ने कहा ये क़ौल ग़लत तन्खाव (salary ) नहीं तो कुछ भी नहीं 

पहुंचे होटल में तो तो फिर ईद की परवाह न रही 

केक को चख के सीववयों का मज़ा भूल गए 

हम ऐसी सब किताबों को कबीले ज़ब्ती समझते हैं 

के जिन को पढ़ के बेटे बाप को खब्ती समझते हैं 

पैदा हुवा वकील तो शैतान ने कहा 

लो आज हम भी साहेबे औलाद हो गए 

फलसफी (philosper ) को बहस में खुदा मिलता नहीं 

डोर उलझा रहा है और सिरा मिलता नहीं 

उन्हें शौक़ -ऐ -इबादत भी है और गाने की आदत भी 

निकलती हैं दुवाएं उनके मुँह से ठुमरियाँ हो कर 



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