बुधवार, 6 मई 2026

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन

         

With Joslin Almeida


With dear Ashok Juriani


                                        

Carbon ke Doston ke sang

              कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन 

 गर खुदा मुझ से कहे कुछ मांग ऐ बन्दे मेरे, में खुदा से दुआ करूँगा के मुझे यूनाइटेड कार्बन कंपनी के (१९८०-१९८७ ) (PERIOD ) में लौटा दे। चाहे कुछ क्षणों के लिए। वो मस्ती वो तरंग वो बे फ़िक्री ज़िन्दगी में कही देखने को नहीं मिली। उन जैसे प्यारे प्यारे दोस्त फिर ज़िन्दगी में कभी नहीं मिले। कंपनी से घर लौटने बाद भी कंपनी में दिल अटका रहता था। ठाणे बेलापुर रोड पर स्टैण्डर्ड कंपनी के पड़ोस में कंपनी थी। अब कंपनी के नज़दीक से गुज़रता हु तो चटयल मैदान दिखयी पड़ता है, दिल पर एक ठेस लगती है । खलंडरा अशोक जुरिआनी , बातूनी प्रदीप खूबचंदानी , दिल रुबा प्रकाश खंबायते , सीरियस  जोसलिन अलमेडा , दिल फेक हशमत , खुश मिज़ाज रागिब शैख़ ,रंगीला पागड़ ,सुधाकर ,टंडेल ,लक्षमण साबले मेरे खानदान के फर्द (PART ) हिस्सा महसूस होते थे। हम सब एक ही DECADE १९५०/१९६० की पैदायश थे। सब की सोच एक, मिज़ाज एक और हम सब की शादियां भी इसी दौर (PERIOD ) में हुयी। 

      ड्यूटी ख़त्म होने पर हम सब की ऑंखें काजल  (CARBON BLACK )से काली होजाती थी। लोगों को लगता अजीब शौक हम लोगों ने पाल रखा है। BALCK POWDER से हम पूरी तरह अट जाते थे। नाक ,कान ,थूक में काला मादा (MATERIAL ) निकलता था। ड्यूटी ख़त्म होने के पश्चात् सब एक हमाम में नंगे हो कर LIFEBOUY साबुन से नहाते थे। 

    नाईट शिफ्ट में आधे से ज़ियाद समय प्रदीप के साथ LAB में गुज़रता। MIXER मशीन जहा कार्बन ब्लैक को पानी के साथ मिला कर PALLET बनायीं जाती थी। की ड्यूटी HORRIBLE होती थी। MIXER TRIP  होजाता उसे CLEAN करना नाक में दम कर देता था। लेकिन हम सब मिल कर उसे चालू करते क्लीन करते। खाना भी साथ मिलकर कैन्टीन में खाते । केसकर ,रोहरा हमारे BOSS थे बड़े TYPICAL थे भूलते नहीं भूलते। अब दोनों दुनिया से रुखसत हो चुके हैं। 

    LONG ऑफ में अक्सर साथ मिल कर PARTY करते,सिनेमा देखते ,कही घूमने निकल जाते । एक के बाद एक  हम सब की शादियां हुयी। सब साथ मिल कर शरीक (ATTEND ) करते। किसी के घर मौत होती सब मिल कर जाते दुःख में शरीक होते दिलासा देते। उन दिनों में बहुत हँसता ,बे वजे क़हक़हे लगाया करता था। हम सब एक दिन किसी दोस्त के DADDY की मौत पर MOURNING /CONDOLENCE  के लिए निकले। प्रदीप हाथ जोड़ कर कहने लगा "शैख़ भाई ग़म के घर में प्लीज हंसना मत हम सब का कचरा हो जाएंगा  "

  फिर एक साल हम सब पर ग़म के बादल छाए रहे। कंपनी STRIKE पर थी। लेकिन कभी भी हमारे रिश्तो में दराड (CRACK ) नहीं आयी। वो दिन भी दस्तूर की ऑफिस में ठहाके लगा कर गुज़ारे । किसी ने भी अपने ग़म परेशानी की दास्तान नहीं सुनाई। 

    कल प्रदीप के जन्म दीन पर उसे मुबारकबाद पेश की तो पुराने दिनो की यादें फिल्म के फ़्लैश बैक की तरह ज़हन पर,ताज़ा हो गयी। अशोक जुरिआनी को याद करके आँख से आंसू जारी होगये। 

       आयी किसी की याद तो आंसू निकल पड़े 

         आंसू किसी की याद के कितने क़रीब (नज़दीक ) थे 

किसी ने क्या खूब कहा है 

दिन जो पखेड़ु होते पिंजरे में मैं रख लेता पालता उनको जतन से 

मोती के दाने देता ,सींने से रहता लगाए 

याद न जाये बीते दिनों की जाके न आये जो दिन दिल क्यों बुलाये उन्हें 

दिल क्यों बुलाये 

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