| Saeeda aapa |
सईदा आपाl
खुशबू जैसे लोग मिले
कहानी वो होती है जो हमें इस ज़माने में वापस ले जाए, उस ज़माने के किरदारों को ज़िंदा कर दे और हमें ऐसा महसूस कराए कि हम उसी ज़माने में सांस ले रहे हैं जब यह घटना घाटी थी। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो बीते हुए कल को ऐसे बताते हैं जैसे यह घटना हमारे ठीक सामने हो रही हो। अगर आप 78 साल की सईदा आपा से मिलें, तो आपको लगेगा कि वह एक थर्मस लेकर बैठी हैं जिसमें यादें जमा दी गई हैं और आपा धीरे-धीरे थर्मस खोलकर यादों की खुशबू फैला रही हैं। आपा की आवाज़ भी दमदार और गूंजती है और उनके बताने का अंदाज़ भी जादुई है।
सईदा मेरी भतीजी, चाचाज़द भाई अलीमुद्दीन की बेटी है, लेकिन मैंने हमेशा उन्हें सईदा आपा ही कहा है - उनकी ज़िंदगी भी ने सांप-सीढ़ी के खेल की तरह है । 1969 में जलगांव में उनका घर दंगाइयों ने जलाकर राख कर दिया था। आपा मुस्कुराती रहीं। वह "दंगा पीड़ित कॉलोनी" में अपने नए घर को सजाने में मसरूफ रही। अपने पति आबिद अली की मौत से वह टूट गई थीं। उन्होंने खुद को संभाला। शायस्ता परवीन शाफिता परवीन की शादी करवाई। लेकिन अल्लाह ने उनके लिए दूसरे और भी इम्तिहान रखे थे। उन्हें अपने प्यारे जवान बेटे , परवेज़ अली सैयद की मौत का सदमा सहना पड़ा। वह साँप सीढ़ी खेल में हारने वाली नहीं थीं। छायादार, घना दरख्त कभी अपनी जगह से नहीं हिलता। फिर वह उठीं और काज़िम अली को जॉब के लिए कुवैत भेज दिया। उन्होंने उसकी शादी करवाई और नुसरत जैसी सुलझी बहू घर में लाईं। काज़िम की गैरमौजूदगी में अब्दुल मोएज़ ,मिसरा और नुसरत का ख्याल रखा।
आज, अपने पोते अब्दुल मोएज़ के पहले ही अटेम्प्ट में CA एग्जाम में सफल होने पर मुझे लगा कि आपा सईदा ने एक बहुत बड़े गेम में जीत की बाउंड्री पार कर ली है। लेकिन मुझे यकीन है कि आगे भी, इस साँप सीढ़ी के खेल में, वह ऐसे ही हमेशा कामयाब होती रहेंगी इंशाल्लाह । आपा तुम अपनी जीत दर्ज कराती रहोगी। सईदा मैं तुम्हारी लंबी उम्र की दुआ करता हूँ। क्योंकि तुम ही वो अकेली जो हमारे ख़ानदान को जानती हो ,जो हमारे रिश्ते,जो उलझे हुए धागों की गठरी जैसे हैं ,सुलझा सकती हो। आपा सईदा रिश्तों को पहचानने में माहिर हैं।
अगर आप साहबान भी किसी रिश्ते में कोई कड़ी (MISSING LINK )जोड़ना चाहते हैं या जलगांव का इतिहास जानना चाहते हैं, तो आपको जलगांव में सईदा आपा से ज़रूर मिलना चाहिए।
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